विदेशी मीडिया ने सबरीमाला के महिला विरोधियों को बताया ‘मोदी के गुंडे’, भाषा पर उठे सवाल

देश में इन दिनों सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को मामला गर्माया हुआ है. सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिन पहले मंदिर में हर उम्र की महिला की एंट्री का फैसला दिया था. इस फैसले के बाद भी मंदिर में अभी तक महिलाओं की एंट्री नहीं हो सकी है. स्थानीय लोग और कई हिंदू संगठन मंदिर में महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहे हैं. इस मामले ने मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरी. इंटरनेशनल मीडिया ने भी इस मामले को कवर किया है.

मोदी के गुंडे

द ऑस्ट्रेलियन पोर्टल पर छपी खबर का स्क्रीनशॉट

ऑस्ट्रेलियन न्यूज पोर्टल https://www.theaustralian.com.au/ ने इस मामले पर खबर छापी है. पोर्टल ने अपनी इस खबर की हेडिंग ‘Modi’s ‘goons’ block women from HIndu temple’ है. हिंदी में इसका अनुवाद करे तो यह ‘मोदी के ‘गुंडों’ ने महिलाओं को हिंदू मंदिर में जाने से रोका’ होता है. इस हेडलाइन को लेकर अब सवाल उठाए जा रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र रंजन ने फेसबुक पर पोस्ट कर पूछा कि क्या विदेशी अखबारों को ऐसी हेडिंग छापनी चाहिए. देखिये उनकी यह पोस्ट-

क्या विदेशी अखबारों को ऐसी हेडिंग छापनी चाहिए? खबर का लिंक कमेंट बॉक्स में है।

Posted by Satyendra Ranjan on Saturday, October 20, 2018

क्या है सबरीमाला मंदिर विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर को सभी उम्र की महिलाओं के लिए खोलने के आदेश दिए थे. इस मंदिर के कपाट खुल चुके हैं, लेकिन अभी तक किसी महिला का मंदिर में प्रवेश नहीं हो पाया है. पिछले लगभग एक सप्ताह से मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर तनाव बना हुआ है. कई हिंदू संगठन मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध कर रहे हैं. इस तनाव को देखते हुए भारी सुरक्षा बल तैनात किया गया है.

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भारी सुरक्षा के बीच पुलिस हेलमेट पहनाकर दो महिलाओं को मंदिर की तरफ ले जा रही थी. उन्हें रोकने के लिए प्रदर्शनकारी नारेबाजी और हंगामा कर रहे थे. भारी विरोध के बाद दोनों महिलाओं को आधे रास्ते से वापस लौटा दिया गया, महिलाएं मंदिर के करीब पहुंच गई थीं. इनमें एक पत्रकार एस कविता और सामाजिक कार्यकर्ता रेहाना फातिमा शामिल थीं. बता दें कि विदेशी अखबारों के रिपोर्टर को भी मंदिर में एंट्री से रोका गया था. उनके साथ प्रदर्शनकारियों ने बदतमीजी भी की थी.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू करवाना सरकार की जिम्मेदारी है. अगर राज्य ऐसे किसी आदेश को लागू नहीं करवा पा रहा है तो केंद्र पर यह जिम्मेदारी होती है. अगर दोनों मिलकर भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू नहीं करवा पाते हैं तो सरकारों पर सवाल खड़े होंगे ही. साथ ही इससे देश की छवि को भी धक्का पहुंचता है.

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