Commentary: पुलवामा, पठानकोठ, उरी आतंकी हमलों और विंग कमांडर अभिनंदन की हालत का ज़िम्मेदार कौन?

जम्मु-कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी को पैरा-मिल्ट्री यानी सीआरपीएफ के जवानों पर एक बड़ा आतंकी हमला हुआ था. ठीक इसी तरह से जम्मु-कश्मीर के उरी 2016 के अंत में और पठानकोट में 2015 के अंत में भी आतंकी हमले हुए थे. हर आतंकी हमले के बाद सरकार ने ये जानकारी सार्वजनिक की है कि उसके पास हमला होने से जुड़ी खुफिया जानकारी पहले से थी. बावजूद इनके आख़िर ये हमले हुए कैसे और सरकार इन्हें रोकने में विफल क्यों रही?

देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकरा अजीत डोभाल आख़िर पहले मिलने वाली ऐसी ख़ुफिया जानकारियों का करते क्या हैं और ऐसा क्यों होता है कि ऐसी जानकारी रहने के बावजूद पहले तो भारत के जवानों की जानें जाती हैं और फिर सर्जिकल स्ट्राइक की नौबत आती है? अगर हम इन हFमलों को ख़ुफिया जानकारी के आधार पर रोक लें तो हमें सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करनी पड़ेगी, ना ही जंग के हालात बनेंगे.

इस सबके बीच भारतीय मीडिया पर गंभीर सवाल उठते है. जो मीडिया पिछली सरकारों के समय आतंकी हमलों के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराती थी. प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री से लेकर गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग करता थी. वही, मीडिया नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल में चुप क्यों है? मीडिया ने मोदी सरकार की सुरक्षा नीति पर एक भी सवाल नहीं उठाया. अगर विषम परिस्थितियों में सीधे प्रधानमंत्री पर सवाल उठाना मुश्किल है तो कम से कम हम ऐसा चार आतंकी हमलों की पहले से जानकारी होने के बावजूद इन्हें न रोक पाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की कार्यशैली पर तो सवाल उठा ही सकते हैं.

हम ये पूछ सकते हैं कि जो व्यक्ति इतने अहम पद पर बैठकर पहले से जानकारी होने के बावजूद चार आतंकी हमले नहीं रोक पाया, क्या गारंटी है कि अगली बार जानकारी होने पर वो पांचवां हमला रोक लेगा. क्या इतने बड़े और सिलसिलेवार आतंकी हमलों के बाद भी असफल रहने वाले व्यक्ति को पद पर बने रहने का अधिकार है? क्या पांच सालों तक इस पद पर असफल रहे व्यक्ति से बेहतर विकल्प 130 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले भारत के पास मौजूद नहीं है?

वहीं, जब विपक्ष सरकार की आतंकी हमले रोकने में नाकाम रहने की बात करता है, तो मीडिया सरकार का प्रवक्ता बन जाती है और विपक्ष को आतंकवाद पर राजनीति न करने की नसीहत देता है. लेकिन यही मीडिया भारतीय वायु-सेना की पाकिस्तान में हुई एयर-स्ट्राइक का क्रेडिट सरकार को दे देती है. जैसे सेना कुछ कर ही नहीं रही. टीवी चैनलों पर स्लोगन चलता है “मोदी है तो मुमकिन है.” ये नारा प्रधानमंत्री मोदी ने दिया है जिसे टीवी चैनलों ने धड़ल्ले से चलाया. बीजेपी ने भी पाकिस्तान में एयर-स्ट्राइक का पूरा श्रेय मोदी को दिया और उसका इस्तेमाल लोकसभा चुनाव प्रचार में किया जा रहा है. यही हाल पिछले सर्जिकल स्ट्राइक के बाद हुआ था जिसका इस्तेमाल यूपी समेत 2017 के पांच राज्यों के चुनावों के दौरान किया गया.

यूपी के नतीज़ों से साफ था कि इससे बीजेपी को भारी फायदा हुआ है क्योंकि वहां बीजेपी गठबंधन को 325 सीटें मिली थीं. ऐसे में एक तरफ तो विपक्ष और सवाल उठाने वालों को ये कह कर चुप कराया जा रहा है कि सेना पर राजनीति मत हो. लेकिन यही नियम देश की एक और राजनीतिक पार्टी यानी बीजेपी, उसके नेता और नरेंद्र मोदी पर लागू नहीं होता. वो जब सेना के पराक्रम को वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें इस पर राजनीति करने से क्यों नहीं रोका जाता? अभी कर्नाटक के पूर्व सीएम रहे बीजेपी नेता येदियुरप्पा का बयान ही देख लीजिए जिनका मानना है कि अगर एयर स्ट्राइक हुई तो बीजेपी को कर्नाटक में 22 सीटों को फायदा होगा. क्या देश की सेना बीजेपी को वोट दिलाने के लिए है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि मोदी के हाथों में देश सुरक्षित है. मंगलवार सुबह हुए एयर-स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान में हंगामेदार हालात बने हुए थे. जिस दिन पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में भारत की निंदा हो रही थी, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान भारत के खिलाफ कारवाई की योजना बना रहे थे उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी राजस्थान के चुरू में एक चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे और एयर-स्ट्राइक का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे थे. वो दिल्ली के एक मंदिर में गीता का उद्घाटन करने भी गये.

बुधवार को पाकिस्तान में परमाणु हथियारों पर कंट्रोल रखने वाली राष्ट्रीय कमांड प्राधिकरण की मीटिंग हुई. पाकिस्तान की संसद का संयुक्त सत्र भारत के खिलाफ बैठा. लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री हालात पर योजना बनाने और नज़र बनाए रखने की बजाये खेलो इंडिया ऐप लांच कर रहे थे और आज जब पूरा देश भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन को वापस लाए जाने का इंतज़ार कर रहे है और इससे जुड़ी सरकारी नीति पर नज़र बनाए हुए है तो पीएम अपनी पार्टी बीजेपी के लिए अपना बूथ सबसे मज़बूत कार्यक्रम करने में व्यस्त हैं.

मोदी सरकार की अदूरदर्शिता और रणनीतिक नाकामी बुधवार को सामने आई. मंगलवार के भारतीय हमले के बाद पाकिस्तान हाई अलर्ट पर था. इस सबके बावजूद बुधवार को भारत ने पाकिस्तान की हवाई सीमा में विंग कमांडर अभिनंदन को भेज दिया. पाकिस्तान ने ना सिर्फ भारतीय विमान को गिराया, बल्कि अभिनंदन को गिरफ्तार भी कर लिया. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान अब शांति की बात कर रहे हैं.

भारतीय जहाज गिराने को पाकिस्तान न सिर्फ दुनिया में अपनी सैन्य शक्ति के रूप में प्रचारित कर रहा है, बल्कि दुनिया के सामने भारत से शांति की बात कर गेंद भारत के पाले में डाल चुका है. इमरान खान फ्रंट फुट पर आकर युद्ध जैसे हालात पर बयान दे रहे हैं, वही प्रधानमंत्री मोदी फिलहाल तो बैकफुट पर हैं और देश से ज़्यादा बीजेपी के प्रचार और आम चुनाव के अभियान में मशगूल हैं.

एक अच्छी पत्रकारिता सरकार और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से सवाल करती है, लेकिन भारतीय मीडिया पाकिस्तान में हुई एयरस्ट्राइक और उसके बाद के हालात के मामले में इस पैमाने पर खरा साबित नहीं हुआ. मीडिया सूत्रों के हवाले से पाकिस्तान में भारतीय एयर-स्ट्राइक में 300 आतंकी मारे जाने का दावा करता रहा. मीडिया ने पत्रकारिता के मूल्य सिद्धांत तथ्यों की जांच को साइड पर कर युद्दोन्माद फैलाया.

ये सवाल ज्यादातर टीवी चैनलों ने नहीं पूछा कि विदेश सचिव विजय गोखले ने मारे गए आतंकियों की संख्या क्यों नहीं बताई. न्यूज चैनलों ने अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी रॉयटर्स, विश्वसनीय न्यूज चैनल बीबीसी की बालकोट से ग्राउड रिपोर्ट को खास तवज्जो नहीं दी. जिन रिपोर्टों से साफ हो रहा है कि भारतीय एयर-स्ट्राइक में पाकिस्तान में कोई ज्यादा नुकसान नहीं हुआ, जैसे कि दावा किया जा रहा था कि पाकिस्तान के 300 आतंकी मारे गए.

हमले के बाद मीडिया ने संयम से काम नहीं लिया. टीवी चैनलों पर पाकिस्तान को नेस्तानबूद करने की बातें हुईं. भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध की बातें ऐसे की जा रही थी, जैसे युद्द बच्चों का कोई खेल हो. लेकिन सरकार की जिम्मेदारी तय करने की बात नहीं हुई. पत्रकार से शांति की बात करने की उम्मीद की जाती है, लेकिन एक भारतीय न्यूज़ चैनल के एंकर ने पाकिस्तान को तबाह करने की कोशिश में हद कर दी.

देखें उसकी बानगी

पाकिस्तानी मीडिया भी कुछ कम नहीं था. पाकिस्तानी मीडिया में युद्ध के सपोर्ट करने वाले गीत चलाए जा रहे थे. बुधवार को पाकिस्तानी मीडिया ने पत्रकारिता के सिद्धातों का कत्ल करते हुए, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए. भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों का मीडिया युद्दोन्माद फैलाने में बिजी है. दोनों ही सरकार और सत्ता से कड़े सवाल करने के बजाए अपने सेंट्रल एसी वाले ऑफिसों में बैठकर ख़ून के बदले ख़ून की मांग कर रहे हैं.

भारत के एक ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर आप एक बार सोचिएगा कि देश सरकार तो छोड़िए डोभाल से भी सवाल नहीं करता और उन लोगों को सवालों में फांसने लगा है जिनका फर्ज सवाल करना है. ऐसे में ये सोचने वाली बात है कि हम कैसे देश भक्त हैं. अगर जवानों से देश का प्यार सच्चा है तो सरकार जवाब दे कि पहले से जानकारी होने के बावजूद तीनों (पठानकोट, उरी और पुलवामा) आतंकी हमले क्यों हुए?

दो बार हुए सर्जिकल स्ट्राइक की पहले तो ज़रूरत क्यों पड़ी क्योंकि हम अगर आतंकी हमलों को रोक लेते तो सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करनी पड़ती और अगर सर्जिकल स्ट्राइक हुआ तो उसका राजनीतिक प्रचार के लिए इस्तेमाल क्यों किया गया? विंग कमांडर अभिनंदन वर्दमान पाकिस्तान के कब्ज़े में कैसे गए और इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? अगर हम सर्जिकल स्ट्राइक का नगाड़ा नहीं पीटते तो क्या अभिनंदन को पाकिस्तान गिरफ्तार कर पाता? कितने आतंकी हमलों के बाद डोभाल इस्तीफा देंगे?

एक ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर ऐसे अनगिनत सवाल करिए क्योंकि युद्ध का उन्माद राजनीतिक पार्टियां फैला रही हैं जिससे उन्हें चुनाव में फायदा होगा और बाकियों का नुकसान होगा. आप सवाल करिए. वो आपको जितने ज़ोर से देशद्रोही बुलाए आप उससे ज़ोरदार सावल करिए. सवाल उतने बदसूरत नहीं होते जितना बदसूरत युद्ध होता है.

भारतीय मीडिया

कैसे भारतीय मीडिया का 300 आतंकियों को मारे जाने का दावा ग़लत है?

भारत ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक की. इसमें भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों पर बम गिराए. भारत की तरफ से इसे असैन्य कार्रवाई कहा गया. एयर स्ट्राइक के बाद भारत सरकार की तरफ से विदेश सचिव विजय गोखले ने कहा कि भारत ने बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग कैंपों को निशाना बनाया था.

भारतीय मीडिया

उन्होंने भारत की इस कार्रवाई को असैन्य कार्रवाई (Non-Military Pre-Emptive action) बताते हुए कहा कि इसमें केवल आतंकियों को निशाना बनाया गया था. इसका मतलब यह हुआ कि भारत ने अपने ऊपर संभावित खतरे को टालने के लिए असैन्य कार्रवाई की है. उन्होंने इसमें हुए नुकसान या यह किस जगह पर की गई, इस बारे में जानकारी नहीं दी. यानी सरकार की तरफ से इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है कि इस हमले में कितने आतंकी मारे गए हैं.

पुलवामा हमले के बाद की बताई जा रही पीएम मोदी और नीतीश कुमार की इस फोटो का सच क्या है?

एयर स्ट्राइक की खबर आने के बाद भारतीय मीडिया ने इससे जुड़ी खबरें और वीडियो दिखाने शुरू कर दिए. कई चैनलों ने वायुसेना की इस कार्रवाई में 200-300 आतंकियों के खात्मे की बात की तो कई 300-400 आतंकियों के मारे जाने की बात कर रहे थे. सब अपने-अपने सूत्रों के हवाले से खबर चला रहे थे. टीवी चैनल के अलावा कई न्यूज पोर्टल ने ऐसी खबरें चलाई। यह सब बिना आधिकारिक जानकारी के चल रहा था. किसी ने भी यह दावा नहीं किया कि उनकी खबर सच है.

युद्ध की जुबान बोल रहा भारतीय मीडिया

मीडिया का काम हमेशा से अपने पाठकों और दर्शकों तक सही जानकारी पहुंचाने का रहा है. युद्ध, युद्ध जैसी स्थिति, दो देशों के बीच तनाव आदि की स्थिति में यह जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है. ऐसी स्थिति में मीडिया को संयम बरतते हुए आधिकारिक जानकारी को ही लोगों तक पहुंचाना चाहिए, लेकिन भारतीय मीडिया आजकल संयम को दूर रखकर युद्ध की जुबान बोल रहा है.

कैसे भारतीय मीडिया द्वारा किया जा रहा 300 आतंकियों के मरने का दावा झूठ है?

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान को अपनी कार्रवाई में संभलने का भी मौका नहीं दिया और उनकी जमीन पर बम डालकर सकुशल वापस लौट आई. भारतीय वायुसेना के मिराज विमानों ने इतनी तेजी से इस काम को अंजाम दिया कि पाकिस्तान को सोचने तक का भी समय नहीं मिला. यह बात भी सब जानते हैं कि ऐसी कार्रवाई में हुए नुकसान का आकलन नहीं किया जाता. दूसरे देश में जाकर नुकसान का पता लगाना मुमकिन नहीं होता है और पाकिस्तान कभी इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि उसके यहां नुकसान हुआ है.

अब डिजिटल न्यूज मीडिया पर भी संकट के बादल, बजफीड और हफपोस्ट करेंगी कर्मचारियो की छंटनी

ऐसी स्थिति में भारतीय मीडिया को क्या करना चाहिए? क्या मीडिया को भावना में बहकर गलत तथ्य लोगों के सामने रखने चाहिए या मीडिया को आधिकारिक बयान का इंतजार कर लोगों तक सही बात पहुंचानी चाहिए? अफसोस अधिकतर मीडिया ने TRP के लिए गलत तथ्य लोगों के सामने पेश किए.

भारतीय मीडिया से उलट है पश्चिमी मीडिया के दावे

हालांकि कई मीडिया हाउस ऐसे भी थे, जिन्होंने सरकार के आधिकारिक बयान का इंतजार किया. भारत के द हिंदू जैसे अख़बारों और पश्चिमी जगत के न्यूयॉर्क टाइम्स और द गार्डियन ने भी आतंकियों की मौत से जुड़ा कोई आंकड़ा नहीं दिया. बीबीसी ने भी स्थानीय लोगों से बातचीत की थी. इन लोगों ने भी उतने आतंकियों के मरने का दावा नहीं किया, जितना अधिकतर भारतीय मीडिया कर रहा है. इस घटना की ना तो कोई तस्वीर है, न वीडियो, न सरकार ने कुछ बोला है और न ही किसी मीडिया मे किसी पुख़्ता सूत्र का हवाला दिया है.

एयर स्ट्राइक के बाद भारत सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी. इस बैठक में वायुसेना की कार्रवाई का ब्यौरा दिया गया था. इस बैठक में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुला शामिल थे. उन्होंने कहा कि इस बैठक में TMC के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने आतंकियों के मरने से जुड़ा सवाल पूछा था. इसके जवाब में बताया गया कि सरकार के पास इस बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं है. उमर अब्दुला ने इसके बाद कहा कि जो लोग सूत्रों के हवाले से 300 से ज्यादा आतंकियों के मरने की खबर लिख रहे हैं, उसमें कोई तथ्य नहीं है. देखिये, उनका ट्वीट-

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी ऐसी ही कुछ बात कही. उन्होंने कहा कि मीडिया में बिना पुख्ता जानकारी या सबूत के 300 आतंकियों के मारे जाने की खबरें चल रही हैं. पाकिस्तानी चैनल जीरो नुकसान की बात कर रह हैं. टीवी पर वॉर गेम खेला जा रहा है. TRP के लिए गंभीर मुद्दे को खींचा जा रहा है. देखिये यह ट्वीट-

मीडिया के लिए सवाल

भारतीय वायुसेना और सरकार ने अपना काम कर दिया था. पाकिस्तान को पता चलने से पहले उनकी धरती पर बम फेंक दिए गए थे. 1971 के बाद पहली बार नियंत्रण रेखा से पार जाकर भारतीय वायुसेना के विमान अपने मिशन को अंजाम देकर सकुशल वापस लौट आए थे. मीडिया को ऐसी स्थिति में लोगों को सच बताना चाहिए, लेकिन मीडिया ने फैक्ट चेक किए बिना 300 आतंकियों के मरने की खबरें चला दी. ऐसी स्थिति में जब दोनों देश के बीच तनाव चरम सीमा पर है, मीडिया का ऐसा रवैया लोगों के बीच युद्ध का माहौल बना रहा है.

जंग खुद एक मसला है, जंग क्या मसलों का हल देगी

सरकार भी खुद मान रही है कि युद्ध किसी स्थिति का समाधान नहीं है. यह सच भी है कि युद्ध किसी भी स्थिति में समाधान नहीं है. मीडिया को ऐसे समय में फैक्ट चेक पर जोर देना चाहिए. मीडिया को संयम रखकर तथ्यों को सामने रखना चाहिए ताकि लोगों तक सही सूचना पहुंचे. दो देशों के बीच यह तनाव को मीडिया को TRP के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

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अमित मालवीय

अमित मालवीय ने पीएम मोदी को बताया ‘राष्ट्रपति’, कुंभ में पीएम की यात्रा को लेकर किया गलत दावा

प्रधानमंत्री मोदी 24 फरवरी को प्रयागराज में चल रहे कुंभ मेले में पहुंचे. उन्होंने यहां संगम घाट पर पूजा की और स्नान भी किया. इसके अलावा पीएम मोदी ने यहां सफाई कर्मचारियों के पैर भी धोए. प्रधानमंत्री मोदी ने कुंभ में डुबकी लगाते हुए का वीडियो भी ट्विटर पर शेयर किया और लिखा कि कुंभ में स्नान करने का मौका मिला है. 130 करोड़ भारतीयों के कल्याण की प्रार्थना की. देखिये उनका ट्वीट.

प्रधानमंत्री मोदी के कुंभ दौरे के बाद बीजेपी आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने एक ट्वीट किया. इसमें उन्होंने पीएम मोदी की दो फोटो शेयर करते हुए लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी पहले ‘हेड ऑफ स्टेट’ है जिन्होंने कुंभ में स्नान किया है. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को ‘हेड ऑफ स्टेट’ यानी राष्ट्रध्यक्ष बताया है. इसके अलावा उन्होंने लिखा पीएम मोदी कुंभ जाने वाले प्रधानमंत्री हैं. उनका ट्वीट नीचे देख सकते हैं.

अमित मालवीय ने अपने 26 शब्दों वाले ट्वीट में दो गलत दावे किए हैं. हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब मालवीय ने गलत दावों वाला ट्वीट किया है. खैर, इस ट्वीट में उन्होंने पीएम मोदी को ‘हेड ऑफ स्टेट’ यानी राष्ट्राध्यक्ष बताया है और दूसरा कि पीएम मोदी कुंभ जाने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं. आइये उनके इन दावों की सच्चाई जानते हैं.

क्या है अमित मालवीय के दावों की सच्चाई

पहला दावा- मालवीय ने पीएम मोदी को ‘हेड ऑफ स्टेट’ बताया है, लेकिन यह गलत है. पीएम मोदी सरकार के मुखिया हैं, देश के नहीं. भारत के हेड ऑफ स्टेट राष्ट्रपति होते हैं. यानी मालवीय ने अपने ट्वीट में प्रधानमंत्री मोदी को राष्ट्रपति बता दिया.

उनका दूसरा दावा है कि नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जो कुंभ गए हैं. मालवीय का यह दावा भी गलत है. नरेंद्र मोदी से पहले जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी कुंभ जा चुके हैं. ऑल्टन्यूज ने कामा मैकलिन की किताब के हवाले से बताया है कि पंडित नेहरू ने 1954 के कुंभ मेले का दौरा किया था. उन्होंने लिखा है कि उत्तर प्रदेश सरकार के क्षेत्राधिकार में आने वाले कुंभ मेले के बंदोबस्त पर खुद नेहरू ने नजर रखी थी.

अमित मालवीय

Photo Credit- Altnews

नेहरू के अलावा इंदिरा गांधी ने भी कुंभ का दौरा किया था. इस दौरे पर उनके साथ एनडी तिवारी भी मौजूद थे. इंडियन एक्सप्रेस पर उनकी यह फोटो भी छपी है. यह फोटो आप नीचे देख सकते हैं.

अमित मालवीय

Image Credit- Indian Express

मालवीय के ट्वीट की पड़ताल करने पर पता चलता है कि उन्होंने पीएम मोदी की तारीफ में दो झूठ बोल दिये हैं. हालांकि जैसा हमने आपको पहले बताया कि यह पहली बार नहीं है जब अमित मालवीय ने झूठ बोला है.

सोशल मीडिया पर चल रही फेक न्यूज को लेकर हमारी अपील

सोशल मीडिया पर इन दिनों जमकर फेक न्यूज शेयर की जा रही है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जाएंगे, वैसे-वैसे फेक न्यूज बढ़ती जाएगी. एक जागरूक नागरिक होने के नाते आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप फेक न्यूज को फैलने से रोके. इसके लिए अगर आपके पास कोई भी न्यूज आती है तो उस पर आंख मूंदकर भरोसा ना करें. सोशल मीडिया बेवफा है इसलिए इस पर आई हर खबर को सच ना माने. किसी भी खबर पर भरोसा करने या शेयर करने से पहले उसे दूसरे सोर्स से वेरिफाई जरूर करें. फेक न्यूज समाज में नफरत और झूठ फैला रही है. यह हमारे समाज और देश के लिए खतरनाक है. इससे खुद भी बचें और अपने जानने वालों को भी बचाएं.

अगर आपके पास ऐसी कोई फेक न्यूज आती है जिसकी आप सच्चाई जानना चाहते हैं तो हमें कमेंट बॉक्स में बताएं. हम उस खबर की सच्चाई आपके सामने रखने की कोशिश करेंगे.

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पीएम मोदी और नीतीश कुमार

पुलवामा हमले के बाद की बताई जा रही पीएम मोदी और नीतीश कुमार की इस फोटो का सच क्या है?

पुलवामा हमले के बाद से हमले से जुड़े कई फोटो शेयर की जा रही हैं. इनमें से कई फोटो हमले से जुड़ी हैं तो कई पुरानी फोटो को हमले की या हमले के बाद की बताकर शेयर की जा रही है. पीएम मोदी और नीतीश कुमार की एक फोटो शेयर हो रही है. दावा किया जा रहा है कि यह फोटो 17 फरवरी को पीएम मोदी के बिहार दौरे के दौरान की है. बता दें 14 तारीख को हुए पुलवामा दौरे के बाद मोदी 17 फरवरी को बिहार गए थे. यह फोटो देखिये, उसके बाद इसकी पड़ताल करते हैं.

पीएम मोदी और नीतीश कुमार

 

खबर लिखे जाने तक इस ट्वीट को लगभग 880 बार रिट्वीट किया जा चुका था. इसके कैप्शन में लिखा है, ‘गमगीन माहौल में ऐसी हंसी!सचमुच में नेताओं को जानना मुश्किल है आमजनों के लिए!’

कांग्रेस ने भी लगाई पीएम मोदी और नीतीश कुमार की यह फोटो

यूथ कांग्रेस ने भी अपने ट्वीट में इस फोटो का इस्तेमाल किया है. यह ट्वीट आप नीचे देख सकते हैं.

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ट्विटर पर वायरल होती इस तस्वीर की पड़ताल करने के लिए हमने इसके बारे में खोजबीन की. इसके लिए हमने गूगल रिवर्स सर्च इमेज का इस्तेमाल करते हुए इस फोटो को सर्च किया. हमारी पड़ताल में इंडियन एक्सप्रेस का एक लिंक मिला. इसे खोलने पर जो खबर दिखी, वो 26 जुलाई, 2015 को पब्लिश हुई थी. इस खबर में इस फोटो का इस्तेमाल किया गया था. यानी प्रधानमंत्री मोदी और नीतीश कुमार की जिस फोटो को पुलवामा हमले के बाद की बताई जा रही है वो आज से कई साल पहले की फोटो है. इस खबर का स्क्रीनशॉट हमने नीचे दिया है.

पीएम मोदी और नीतीश कुमार

हमारी पड़ताल में पता चला है कि पीएम मोदी और नीतीश कुमार की जिस फोटो को पुलवामा हमले के बाद की बताई जा रही है वो आज से कई साल पहले की फोटो है. इसलिए हम आपसे फोटो के साथ किए गलत दावे पर भरोसा ना करने की अपील करते हैं.

हमारी अपील

पूरा देश में इस समय गम और गुस्से का माहौल है. इस कायराना हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया है. कुछ लोग इस माहौल का गलत फायदा उठाकर नफरत फैलाने की कोशिश में लगे हैं. सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं जो इस हमले से जुड़े हुए नहीं है, लेकिन उन्हें यहां का बताया जा रहा है. ऐसे नाजुक मौके पर हम आपसे फेक न्यूज, फेक वीडियो और फेक फोटो से सावधान रहने की अपील करते हैं.

अगर आपके पास ऐसा कोई वीडियो, न्यूज या फोटो आती है, जिस पर आपको शक है तो आप हमें कमेंट बॉक्स में बता सकते हैं. हम उसका सच आपके सामने रखने की कोशिश करेंगे.

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रवीश

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जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद सोशल मीडिया पर ट्रोल्स का हमला जारी है. सोशल मीडिया पर हमले का शिकार पत्रकार हो रहे हैं. हमने हमारी पहले की स्टोरी में बताया है कि बरखा दत्त और अभिसार शर्मा समेत कई पत्रकारों को धमकियां और गालियां दी जा रही हैं. इन पत्रकारों में रवीश कुमार का नाम भी शामिल है. ये पत्रकार अपना काम करते हुए सरकार से अकसर सवाल पूछते हैं और इसी वजह से उन्हें सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है.

रवीश

रवीश कुमार

इसी कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का नाम भी शामिल है. रवीश अकसर ट्रोल्स के निशाने पर रहते हैं. अकसर उन्हें मारने तक की धमकी दी जाती रही है. उन्होंने अपनी किताब में इस बारे में विस्तार से लिखा है. पुलवामा हमले के बाद अब एक बार फिर रवीश को गालियां और धमकियां दी जा रही हैं. रवीश ने फेसबुक पर इसे लेकर एक लंबा पोस्ट लिखा है.

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इसमें उन्होंने लिखा है, ‘इन गालियों से मुझे देने वाले की सोच की प्रक्रिया का पता चलता है। माताओं और बहनों के जननांगों के नाम दी जाने वाली गालियों से साफ़ पता चलता है कि उन्हें औरतों से कितनी नफ़रत है। इतनी नफ़रत है कि नाराज़ मुझसे हैं और ग़ुस्सा माँ बहनों के नाम पर निकलता है। कभी किसी महिला ने गाली नहीं दी। गाली देने वाले सभी मर्द होते हैं। ये और बात है कि गाली देने वाले ये मर्द जिस नेता और राजनीति का समर्थन करते हैं उसी नेता और दल को लाखों की संख्या में महिलाएँ भी सपोर्ट करती हैं। पता नहीं उस खेमे की महिला नेताओं और समर्थकों की इन गालियों पर क्या राय होती होगी।’ उनका यह पोस्ट नीचे देख सकते हैं.

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Posted by Ravish Kumar on Monday, February 18, 2019

इसके अलावा भी रवीश ने कई स्क्रीनशॉट शेयर किए हैं. इसमें उनके नंबर पर दी जा रही गालियों वाले मैसेज भरे दिख रहे हैं. नीचे देखिये ऐसी कुछ पोस्ट-

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Posted by Ravish Kumar on Sunday, February 17, 2019

पत्रकारों को पहले भी किया गया है ट्रोल

यह पहला मौका नहीं है जब पत्रकारों को इस तरह निशाना बनाया जा रहा है. इससे पहले भी कई बार राजनैतिक पार्टियों की आईटी सेल पत्रकारों और दूसरे लोगों को निशाना बनाने के लिए इस तरह के काम करती रही है. इनका मकसद लोगों का ध्यान असली समस्या से ध्यान हटाकर दूसरी बातों की तरफ मोड़ना है.

ट्रोल्स के निशाने पर पत्रकार अभिसार शर्मा, दी जा रही हत्या की धमकियां

हम आपसे अपील करते हैं कि सोशल मीडिया जैसे कम्यूनिकेशन के सशक्त मंच को गालियों का अड्डा मत बनने दीजिए. एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल किजिए और शालीनता से अपनी बात रखें. विचारों में भिन्नता ही लोकतंत्र की खूबसूरती है. विचारों का मुकाबला विचारों की किजिए, गालियों से नहीं.

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CRPF

शरारती तत्व फैला रहे पुलवामा के शहीदों की फेक फोटो, CRPF ने कहा- भरोसा न करें

पुलवामा में CRPF के काफिले पर हमले के बाद सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का बाजार गरम है. सोशल मीडिया पर इस हमले से जुड़ी कुछ असली और कुछ फेक तस्वीरें खूब वायरल हो रही हैं. वहीं कुछ लोग पुरानी तस्वीरों को पुलवामा हमले की बताकर शेयर कर रहे हैं. इस हमले ने देश को कभी न भुला सकने वाला जख्म दिया है, जिसके बाद देशभर में गुस्से का माहौल है. कुछ लोग इस माहौल का फायदा उठाकर नफरत फैलाने में लगे है.

CRPF

इस हमले के बाद सोशल मीडिया पर जवानों की कई फोटो शेयर हो रही हैं. इनके साथ अलग-अलग दावे किये जा रहे हैं. इन सबके बीच CRPF ने ट्वीट कर लोगों से ऐसी फोटो से सावधान रहने की अपील की है. CRPF ने अपने ट्वीट में लिखा, ‘यह नोटिस में आया है कि कुछ शरारती तत्व शहीद जवानों के अंगों की फेक फोटो शेयर कर नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. हम एकजुट है. ऐसी किसी भी फोटो को लाइक, शेयर और आगे फॉरवर्ड न करें.’ इस ट्वीट का स्क्रीनशॉट आप नीचे देख सकते हैं.

CRPF

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले में देश ने 40 सीआरपीएफ जवान खो दिए. जवानों की शहादत के बाद देश में गम का माहौल है. सरकार ने हमले के बाद कहा कि सेना को खुली छूट दी गई है. इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी.

हमारी अपील

पूरा देश में इस समय गम और गुस्से का माहौल है. इस कायराना हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया है. कुछ लोग इस माहौल का गलत फायदा उठाकर नफरत फैलाने की कोशिश में लगे हैं. सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं जो इस हमले से जुड़े हुए नहीं है, लेकिन उन्हें यहां का बताया जा रहा है. ऐसे नाजुक मौके पर हम आपसे फेक न्यूज, फेक वीडियो और फेक फोटो से सावधान रहने की अपील करते हैं.

अगर आपके पास ऐसा कोई वीडियो, न्यूज या फोटो आती है, जिस पर आपको शक है तो आप हमें कमेंट बॉक्स में बता सकते हैं. हम उसका सच आपके सामने रखने की कोशिश करेंगे.

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बरखा दत्त

बरखा दत्त को ट्रोल ने भेजी प्राइवेट पार्ट की तस्वीर, दिल्ली पुलिस में दर्ज कराई शिकायत

सोशल मीडिया पर पत्रकारों, कलाकारों या बुद्धिजीवियों को अकसर ट्रोल किया जाता है. इसके लिए बकायदा पूरे एजेंडे और प्लानिंग के साथ इन लोगों को अपनी राय रखने के लिए निशाना बनाया जाता है. पिछले कुछ समय से हम लगातार ऐसी घटनाएं देख रहे हैं जब लोगों को अपनी बात कहने के लिए निशाना बनाया जा रहा है. पुलवामा हमले के बाद अब एक बार फिर ऐसा हो रहा है. पत्रकारों को गालियां दी जा रही हैं, उन्हें अश्लील तस्वीरें भेजी जा रही है और जान से मारने की धमकी दी जा रही है. ऐसा ही बरखा दत्त के साथ हो रहा है.

बरखा दत्त

वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त को भी सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है. उन्हें गालियां और धमकियां दी जा रही हैं. इतना ही नहीं, उन्हें अश्लील फोटो भी भेजे जा रहे हैं. बरखा ने इसकी शिकायत ट्विटर और दिल्ली पुलिस से की है. उन्होंने कुछ ऐसे नंबर सार्वजनिक किए हैं, जिनसे उन्हें गालियां दी जा रही थी. आप उनके ये ट्वीट नीचे देख सकते हैं.

दिल्ली पुलिस ने बरखा की शिकायत पर कार्रवाई का आश्वासन दिया है.

यह पहला मौका नहीं है जब पत्रकारों को इस तरह निशाना बनाया जा रहा है. इससे पहले भी कई बार राजनैतिक पार्टियों की आईटी सेल पत्रकारों और दूसरे लोगों को निशाना बनाने के लिए इस तरह के काम करती रही है. इनका मकसद लोगों का ध्यान असली समस्या से ध्यान हटाकर दूसरी बातों की तरफ मोड़ना है.

ट्रोल्स के निशाने पर पत्रकार अभिसार शर्मा, दी जा रही हत्या की धमकियां

हम आपसे अपील करते हैं कि सोशल मीडिया जैसे कम्यूनिकेशन के सशक्त मंच को गालियों का अड्डा मत बनने दीजिए. एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल किजिए और शालीनता से अपनी बात रखें. विचारों में भिन्नता ही लोकतंत्र की खूबसूरती है. विचारों का मुकाबला विचारों की किजिए, गालियों से नहीं.

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अभिसार

ट्रोल्स के निशाने पर पत्रकार अभिसार शर्मा, दी जा रही हत्या की धमकियां

सोशल मीडिया पर पत्रकारों, कलाकारों या बुद्धिजीवियों को अकसर ट्रोल किया जाता है. इसके लिए बकायदा पूरे एजेंडे और प्लानिंग के साथ इन लोगों को अपनी राय रखने के लिए निशाना बनाया जाता है. पिछले कुछ समय से हम लगातार ऐसी घटनाएं देख रहे हैं जब लोगों को अपनी बात कहने के लिए निशाना बनाया जा रहा है. पुलवामा हमले के बाद अब एक बार फिर ऐसा हो रहा है. पत्रकारों को गालियां दी जा रही हैं, उन्हें जान से मारने की धमकी दी जा रही है.

अभिसार

हम अपनी खबरों में कुछ ऐसे ही मामले आपके सामने रखेंगे. सबसे पहले बात करते हैं अभिसार शर्मा की. वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा लगातार ट्रोल्स के निशाने पर रहते हैं. सरकार की कड़ी आलोचना और सवाल करने के कारण अभिसार अकसर ट्रोल किए जाते हैं. अब एक बार फिर उन्हें मां-बहन की गालियां दी जा रही हैं. अभिसार ने ट्वीट पर ऐसे कुछ मैसेज पोस्ट किए हैं जिनमें उन्हें गालियां दी गई है. अभिसार के ये पोस्ट आप नीचे देख सकते हैं.

अभिसार के साथ-साथ बरखा दत्त, रविश कुमार, प्रशांत भूषण आदि लोगों के नंबर सार्वजनिक किए गए हैं, जिसके बाद इन लोगों के पास लगातार फोन कॉल्स आ रहे हैं. अभिसार ने ये फोन करने और धमकी देने वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है.

यह पहला मौका नहीं है जब पत्रकारों को इस तरह निशाना बनाया जा रहा है. इससे पहले भी कई बार राजनैतिक पार्टियों की आईटी सेल पत्रकारों और दूसरे लोगों को निशाना बनाने के लिए इस तरह के काम करती रही है. इनका मकसद लोगों का ध्यान असली समस्या से ध्यान हटाकर दूसरी बातों की तरफ मोड़ना है.

FACT CHECK: पुलवामा हमले के बाद की बताकर शेयर की जा रही इस फोटो की सच्चाई क्या है?

हम आपसे अपील करते हैं कि सोशल मीडिया जैसे कम्यूनिकेशन के सशक्त मंच को गालियों का अड्डा मत बनने दीजिए. एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल किजिए और शालीनता से अपनी बात रखें. विचारों में भिन्नता ही लोकतंत्र की खूबसूरती है. विचारों का मुकाबला विचारों की किजिए, गालियों से नहीं.

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पुलवामा हमले

FACT CHECK: पुलवामा हमले के बाद की बताकर शेयर की जा रही इस फोटो की सच्चाई क्या है?

पुलवामा हमले में शहीद हुए जवानों को देशभर में श्रद्धांजलि दी जा रही है. सोशल मीडिया पर भी इन जवानों को श्रद्धांजलि दी जा रही है. लोग सोशल मीडिया पर इस हमले से जुड़ी कुछ तस्वीरें शेयर कर रहे हैं. इनमें से एक तस्वीर काफी वायरल हो रही है. यह तस्वीर को आप नीचे देख सकते हैं.

पुलवामा हमले

इस तस्वीर के बारे में सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि यह पुलवामा हमले में शहीद हुए जवानों का श्रद्धांजलि देते हुए दूसरे रेजीमेंट के जवानों की तस्वीर है. कई जाने-माने लोगों ने इस तस्वीर का इस्तेमाल किया है. ऐसे कुछ पोस्ट आप नीचे देख सकते हैं.

पुलवामा हमले

पुलवामा हमले

पुलवामा हमले

क्या है इस तस्वीर की सच्चाई

जिस तस्वीर को श्रद्धांजलि देते हुए जवानों की तस्वीर बताया जा रहा है वह असल में सालों पुरानी तस्वीर है. इस तस्वीर को बार-बार इस्तेमाल किया जाता रहा है. असल में यह फोटो 26 जुलाई, 2011 की है। यानी लगभग साढे सात साल पुरानी फोटो को पुलवामा हमले के बाद की बताया जा रहा है,

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यह फोटो 26 जुलाई, 2011 को अमेरिका न्यूज पोर्टल द सिएटल टाइम्स में छपी थी. यह फोटो कारगिल युद्ध के 12 साल पूरे होने के मौके पर दिल्ली के इंडिया गेट पर आयोजित कार्यक्रम की है. फोटो में दिख रहे जवान अपना पसीना पोंछ रहे हैं. इस फोटो के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए नीच स्क्रीनशॉट दिया गया है.

पुलवामा हमले

हमारी अपील

पूरा देश में इस समय गम और गुस्से का माहौल है. इस कायराना हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया है. कुछ लोग इस माहौल का गलत फायदा उठाकर नफरत फैलाने की कोशिश में लगे हैं. सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं जो इस हमले से जुड़े हुए नहीं है, लेकिन उन्हें यहां का बताया जा रहा है. ऐसे नाजुक मौके पर हम आपसे फेक न्यूज, फेक वीडियो और फेक फोटो से सावधान रहने की अपील करते हैं.

अगर आपके पास ऐसा कोई वीडियो, न्यूज या फोटो आती है, जिस पर आपको शक है तो आप हमें कमेंट बॉक्स में बता सकते हैं. हम उसका सच आपके सामने रखने की कोशिश करेंगे.

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पुलवामा हमलाः जवानों को हवाई जहाज से ले जाना चाहती थी CRPF लेकिन नहीं मिली थी इजाजत

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पुलवामा हमला – जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले में देश ने 40 सीआरपीएफ जवान खो दिए हैं. जवानों की शहादत के बाद देश में गम का माहौल है. सरकार ने हमले के बाद कहा कि सेना को खुली छूट दी गई है. इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी.

पुलवामा हमला

हमले के बाद सुरक्षा चूक की बात भी सामने आ रही है. द क्विंट पर छपी खबर के मुताबिक, सीआरपीएफ ने जवानों को जम्मू से श्रीनगर ले जाने के लिए एयर लिफ्ट (हवाई जहाज से ले जाना) की मांग की थी, लेकिन इस मांग को नहीं माना गया. बता दें कि सीआरपीएफ के 2500 जवानों वाला यह काफिला सड़कमार्ग से होता हुआ जम्मू से श्रीनगर जा रहा था. इसी दौरान रास्ते में लेथपोरा के पास काफिले पर आतंकी हमला हो गया.

पुलवामा हमले में शहीद जवानों की परिवारों की मदद के लिए यहां कर सकते हैं दान

क्विंट ने खबर में बताया है कि कुछ दिनों से बर्फबारी के कारण कई जवान जम्मू में फंस गए थे. इन्हें श्रीनगर ले जाने के लिए सीआरपीएफ ने अपने हेडक्वार्टर से एयरलिफ्ट की मांग की थी. हेडक्वार्टर ने यह मांग गृह मंत्रालय को भेज दी थी. इसके बाद इस मांग पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और ना ही सीआरपीएफ को इस मांग का जवाब दिया गया, जिसके बाद जवानों को सड़क से होते हुए जाना पड़ा.

पुलवामा हमला

एक अधिकारी ने बताया कि सड़क की बजाय हवाई जहाज से जवानों को ले जाना सबसे सुरक्षित होता है. यह न सिर्फ सस्ता रहता है बल्कि इसमें समय की भी बचत होती है.

अलर्ट के बाद भी हुआ हमला?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुरक्षा बलों के पास पहले से यह अलर्ट था कि आतंकी हमला हो सकता है. बीती आठ फरवरी यानी हमले से लगभग एक हफ्ते पहले इंटेलीजेंस ब्यूरो ने CRPF को एक लेटर लिखकर मूवमेंट के पहले इलाके को अच्छी तरह से साफ करने को कहा गया था. IB ने IED के इस्तेमाल की भी आशंका जताई थी.

सरकार ने खारिज किया दावा

मीडिया में आ रही इन रिपोर्ट्स को सरकार ने खारिज किया है. गृह मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि मीडिया में आ रही ऐसी खबरें झूठ हैं.

हमारी अपील

पूरा देश में इस समय गम और गुस्से का माहौल है. इस कायराना हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया है. कुछ लोग इस माहौल का गलत फायदा उठाकर नफरत फैलाने की कोशिश में लगे हैं. सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं जो इस हमले से जुड़े हुए नहीं है, लेकिन उन्हें यहां का बताया जा रहा है. ऐसे नाजुक मौके पर हम आपसे फेक न्यूज, फेक वीडियो और फेक फोटो से सावधान रहने की अपील करते हैं.

अगर आपके पास ऐसा कोई वीडियो, न्यूज या फोटो आती है, जिस पर आपको शक है तो आप हमें कमेंट बॉक्स में बता सकते हैं. हम उसका सच आपके सामने रखने की कोशिश करेंगे.

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