Commentary: पुलवामा, पठानकोठ, उरी आतंकी हमलों और विंग कमांडर अभिनंदन की हालत का ज़िम्मेदार कौन?

जम्मु-कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी को पैरा-मिल्ट्री यानी सीआरपीएफ के जवानों पर एक बड़ा आतंकी हमला हुआ था. ठीक इसी तरह से जम्मु-कश्मीर के उरी 2016 के अंत में और पठानकोट में 2015 के अंत में भी आतंकी हमले हुए थे. हर आतंकी हमले के बाद सरकार ने ये जानकारी सार्वजनिक की है कि उसके पास हमला होने से जुड़ी खुफिया जानकारी पहले से थी. बावजूद इनके आख़िर ये हमले हुए कैसे और सरकार इन्हें रोकने में विफल क्यों रही?

देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकरा अजीत डोभाल आख़िर पहले मिलने वाली ऐसी ख़ुफिया जानकारियों का करते क्या हैं और ऐसा क्यों होता है कि ऐसी जानकारी रहने के बावजूद पहले तो भारत के जवानों की जानें जाती हैं और फिर सर्जिकल स्ट्राइक की नौबत आती है? अगर हम इन हFमलों को ख़ुफिया जानकारी के आधार पर रोक लें तो हमें सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करनी पड़ेगी, ना ही जंग के हालात बनेंगे.

इस सबके बीच भारतीय मीडिया पर गंभीर सवाल उठते है. जो मीडिया पिछली सरकारों के समय आतंकी हमलों के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराती थी. प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री से लेकर गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग करता थी. वही, मीडिया नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल में चुप क्यों है? मीडिया ने मोदी सरकार की सुरक्षा नीति पर एक भी सवाल नहीं उठाया. अगर विषम परिस्थितियों में सीधे प्रधानमंत्री पर सवाल उठाना मुश्किल है तो कम से कम हम ऐसा चार आतंकी हमलों की पहले से जानकारी होने के बावजूद इन्हें न रोक पाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की कार्यशैली पर तो सवाल उठा ही सकते हैं.

हम ये पूछ सकते हैं कि जो व्यक्ति इतने अहम पद पर बैठकर पहले से जानकारी होने के बावजूद चार आतंकी हमले नहीं रोक पाया, क्या गारंटी है कि अगली बार जानकारी होने पर वो पांचवां हमला रोक लेगा. क्या इतने बड़े और सिलसिलेवार आतंकी हमलों के बाद भी असफल रहने वाले व्यक्ति को पद पर बने रहने का अधिकार है? क्या पांच सालों तक इस पद पर असफल रहे व्यक्ति से बेहतर विकल्प 130 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले भारत के पास मौजूद नहीं है?

वहीं, जब विपक्ष सरकार की आतंकी हमले रोकने में नाकाम रहने की बात करता है, तो मीडिया सरकार का प्रवक्ता बन जाती है और विपक्ष को आतंकवाद पर राजनीति न करने की नसीहत देता है. लेकिन यही मीडिया भारतीय वायु-सेना की पाकिस्तान में हुई एयर-स्ट्राइक का क्रेडिट सरकार को दे देती है. जैसे सेना कुछ कर ही नहीं रही. टीवी चैनलों पर स्लोगन चलता है “मोदी है तो मुमकिन है.” ये नारा प्रधानमंत्री मोदी ने दिया है जिसे टीवी चैनलों ने धड़ल्ले से चलाया. बीजेपी ने भी पाकिस्तान में एयर-स्ट्राइक का पूरा श्रेय मोदी को दिया और उसका इस्तेमाल लोकसभा चुनाव प्रचार में किया जा रहा है. यही हाल पिछले सर्जिकल स्ट्राइक के बाद हुआ था जिसका इस्तेमाल यूपी समेत 2017 के पांच राज्यों के चुनावों के दौरान किया गया.

यूपी के नतीज़ों से साफ था कि इससे बीजेपी को भारी फायदा हुआ है क्योंकि वहां बीजेपी गठबंधन को 325 सीटें मिली थीं. ऐसे में एक तरफ तो विपक्ष और सवाल उठाने वालों को ये कह कर चुप कराया जा रहा है कि सेना पर राजनीति मत हो. लेकिन यही नियम देश की एक और राजनीतिक पार्टी यानी बीजेपी, उसके नेता और नरेंद्र मोदी पर लागू नहीं होता. वो जब सेना के पराक्रम को वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें इस पर राजनीति करने से क्यों नहीं रोका जाता? अभी कर्नाटक के पूर्व सीएम रहे बीजेपी नेता येदियुरप्पा का बयान ही देख लीजिए जिनका मानना है कि अगर एयर स्ट्राइक हुई तो बीजेपी को कर्नाटक में 22 सीटों को फायदा होगा. क्या देश की सेना बीजेपी को वोट दिलाने के लिए है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि मोदी के हाथों में देश सुरक्षित है. मंगलवार सुबह हुए एयर-स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान में हंगामेदार हालात बने हुए थे. जिस दिन पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में भारत की निंदा हो रही थी, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान भारत के खिलाफ कारवाई की योजना बना रहे थे उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी राजस्थान के चुरू में एक चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे और एयर-स्ट्राइक का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे थे. वो दिल्ली के एक मंदिर में गीता का उद्घाटन करने भी गये.

बुधवार को पाकिस्तान में परमाणु हथियारों पर कंट्रोल रखने वाली राष्ट्रीय कमांड प्राधिकरण की मीटिंग हुई. पाकिस्तान की संसद का संयुक्त सत्र भारत के खिलाफ बैठा. लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री हालात पर योजना बनाने और नज़र बनाए रखने की बजाये खेलो इंडिया ऐप लांच कर रहे थे और आज जब पूरा देश भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन को वापस लाए जाने का इंतज़ार कर रहे है और इससे जुड़ी सरकारी नीति पर नज़र बनाए हुए है तो पीएम अपनी पार्टी बीजेपी के लिए अपना बूथ सबसे मज़बूत कार्यक्रम करने में व्यस्त हैं.

मोदी सरकार की अदूरदर्शिता और रणनीतिक नाकामी बुधवार को सामने आई. मंगलवार के भारतीय हमले के बाद पाकिस्तान हाई अलर्ट पर था. इस सबके बावजूद बुधवार को भारत ने पाकिस्तान की हवाई सीमा में विंग कमांडर अभिनंदन को भेज दिया. पाकिस्तान ने ना सिर्फ भारतीय विमान को गिराया, बल्कि अभिनंदन को गिरफ्तार भी कर लिया. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान अब शांति की बात कर रहे हैं.

भारतीय जहाज गिराने को पाकिस्तान न सिर्फ दुनिया में अपनी सैन्य शक्ति के रूप में प्रचारित कर रहा है, बल्कि दुनिया के सामने भारत से शांति की बात कर गेंद भारत के पाले में डाल चुका है. इमरान खान फ्रंट फुट पर आकर युद्ध जैसे हालात पर बयान दे रहे हैं, वही प्रधानमंत्री मोदी फिलहाल तो बैकफुट पर हैं और देश से ज़्यादा बीजेपी के प्रचार और आम चुनाव के अभियान में मशगूल हैं.

एक अच्छी पत्रकारिता सरकार और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से सवाल करती है, लेकिन भारतीय मीडिया पाकिस्तान में हुई एयरस्ट्राइक और उसके बाद के हालात के मामले में इस पैमाने पर खरा साबित नहीं हुआ. मीडिया सूत्रों के हवाले से पाकिस्तान में भारतीय एयर-स्ट्राइक में 300 आतंकी मारे जाने का दावा करता रहा. मीडिया ने पत्रकारिता के मूल्य सिद्धांत तथ्यों की जांच को साइड पर कर युद्दोन्माद फैलाया.

ये सवाल ज्यादातर टीवी चैनलों ने नहीं पूछा कि विदेश सचिव विजय गोखले ने मारे गए आतंकियों की संख्या क्यों नहीं बताई. न्यूज चैनलों ने अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी रॉयटर्स, विश्वसनीय न्यूज चैनल बीबीसी की बालकोट से ग्राउड रिपोर्ट को खास तवज्जो नहीं दी. जिन रिपोर्टों से साफ हो रहा है कि भारतीय एयर-स्ट्राइक में पाकिस्तान में कोई ज्यादा नुकसान नहीं हुआ, जैसे कि दावा किया जा रहा था कि पाकिस्तान के 300 आतंकी मारे गए.

हमले के बाद मीडिया ने संयम से काम नहीं लिया. टीवी चैनलों पर पाकिस्तान को नेस्तानबूद करने की बातें हुईं. भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध की बातें ऐसे की जा रही थी, जैसे युद्द बच्चों का कोई खेल हो. लेकिन सरकार की जिम्मेदारी तय करने की बात नहीं हुई. पत्रकार से शांति की बात करने की उम्मीद की जाती है, लेकिन एक भारतीय न्यूज़ चैनल के एंकर ने पाकिस्तान को तबाह करने की कोशिश में हद कर दी.

देखें उसकी बानगी

पाकिस्तानी मीडिया भी कुछ कम नहीं था. पाकिस्तानी मीडिया में युद्ध के सपोर्ट करने वाले गीत चलाए जा रहे थे. बुधवार को पाकिस्तानी मीडिया ने पत्रकारिता के सिद्धातों का कत्ल करते हुए, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए. भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों का मीडिया युद्दोन्माद फैलाने में बिजी है. दोनों ही सरकार और सत्ता से कड़े सवाल करने के बजाए अपने सेंट्रल एसी वाले ऑफिसों में बैठकर ख़ून के बदले ख़ून की मांग कर रहे हैं.

भारत के एक ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर आप एक बार सोचिएगा कि देश सरकार तो छोड़िए डोभाल से भी सवाल नहीं करता और उन लोगों को सवालों में फांसने लगा है जिनका फर्ज सवाल करना है. ऐसे में ये सोचने वाली बात है कि हम कैसे देश भक्त हैं. अगर जवानों से देश का प्यार सच्चा है तो सरकार जवाब दे कि पहले से जानकारी होने के बावजूद तीनों (पठानकोट, उरी और पुलवामा) आतंकी हमले क्यों हुए?

दो बार हुए सर्जिकल स्ट्राइक की पहले तो ज़रूरत क्यों पड़ी क्योंकि हम अगर आतंकी हमलों को रोक लेते तो सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करनी पड़ती और अगर सर्जिकल स्ट्राइक हुआ तो उसका राजनीतिक प्रचार के लिए इस्तेमाल क्यों किया गया? विंग कमांडर अभिनंदन वर्दमान पाकिस्तान के कब्ज़े में कैसे गए और इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? अगर हम सर्जिकल स्ट्राइक का नगाड़ा नहीं पीटते तो क्या अभिनंदन को पाकिस्तान गिरफ्तार कर पाता? कितने आतंकी हमलों के बाद डोभाल इस्तीफा देंगे?

एक ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर ऐसे अनगिनत सवाल करिए क्योंकि युद्ध का उन्माद राजनीतिक पार्टियां फैला रही हैं जिससे उन्हें चुनाव में फायदा होगा और बाकियों का नुकसान होगा. आप सवाल करिए. वो आपको जितने ज़ोर से देशद्रोही बुलाए आप उससे ज़ोरदार सावल करिए. सवाल उतने बदसूरत नहीं होते जितना बदसूरत युद्ध होता है.

नक्सलियों के हमले में कैमरामैन की मौत- युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे और सावधानियां

क्या हैं युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे और किन सावधानियों की है जरूरत?

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हमले में दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू की मौत हो गई है. इस हमने में दो पुलिसकर्मी भी शहीद हो गए. दूरदर्शन ने छत्तीसगढ़ में चुनाव की कवरेज के लिए एक कैमरा टीम तैनात की थी. इस टीम में कैमरामैन अच्युतानंद साहू, रिपोर्टर धीरज कुमार और सहायक मोरमुक्त शर्मा शामिल थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमला उस वक्त हुआ जब दिल्ली दूरदर्शन की एक टीम जंगल के भीतर सुरक्षा बलों के साथ उनकी गतिविधियों का कवरेज करने के लिए पहुंची थी. नक्सलियों ने इस इलाके में चुनाव बहिष्कार की अपील की है. वे पत्रकारों समेत तमाम राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को अपना निशाना बना रहे हैं.

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युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे

सूचना एवं प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने इस घटना पर दुख जताया है. उन्होंने कहा कि हम उन सभी मी़डियाकर्मियों को सलाम करते हैं जो ऐसी खतरनाक परिस्थिति में भी वहां कवरेज के लिए गए. उनकी बहादुरी को हमारा सलाम है.

प्रसार भारती ने इस हमले की निंदा की है और मृतकों के प्रति संवेदना जाहिर की है.

इस घटना के बाद युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं. साथ ही ऐसे क्षेत्रों में पत्रकारों का क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, इस पर नये सिरे से सोचने की जरूरत है. युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे क्या हैं और  इस दौरान क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, इसे लेकर वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने एक लेख लिखा है. उनका लेख गांव कनेक्शन पर पब्लिश हुआ है. जोशी अपने लेख में लिखते हैं-

‘किसी मीडियाकर्मी का बस्तर के अंदरूनी इलाकों में पुलिस और सुरक्षा बलों के आसपास होना आत्मघाती ही कहा जाएगा. मीडिया की गाड़ी भी किसी पुलिस थाने के आगे दिखना पत्रकार के लिये ख़तरा है. चूंकि माओवादियों के मुख़बिरों का नेटवर्क इतना घना है कि आपकी गाड़ी का नंबर उनके पास पहुंचते देर नहीं लगती. एम्बुश लगाना और बारूदी सुरंग का इस्तेमाल नक्सलियों का प्रमुख हथियार है और ग़लतफ़हमी में आप उनका निशाना बन सकते हैं. नक्सल इलाके में काम करने का मूल मंत्र यही है कि पुलिस और माओवादियों से बराबर और उचित दूरी बना कर रखी जाए.

2013 के विधानसभा चुनावों में पूरा दंतेवाड़ा करीब 1 लाख से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक बलों से भरा हुआ था. यह वही साल है जब मई में कांग्रेस के चुनाव प्रचार काफिले में माओवादियों ने जीरम घाटी में हमला किया था और 30 से अधिक कांग्रेस नेता मारे गए थे. इन नेताओं में महेंद्र करमा भी शामिल थे. बीजापुर के सारकेगुड़ा इलाके में चुनाव प्रचार कवर करते वक्त हमने प्रत्याशी की गाड़ी से काफी दूरी बनाकर रखी हुई थी.’

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शंभूलाल को लोकसभा टिकट

कैमरे पर हत्या करने वाले शंभूलाल को लोकसभा टिकट भारतीय राजनीति का भूत और भविष्य दोनों दर्शाता है…!

पिछले साल दिसंबर में राजस्थान के राजसमंद में लव जिहाद का एक भीभत्स मामला सामने आया था. मामले में आरोपी शंभूलाल रैगर ने एक बंगाली मजदूर मोहम्मद अफ्राज़ुल को पहले कुल्हाड़ी से जिंदा काटा और फिर जला दिया था. शंभूलाल ने भगवा झंडे के साथ पूरी घटना का एक वीडियो भी बनाया था. अब इस रूह कांप देने वाली घटना को अंजाम देने वाले शंभूलाल को लोकसभा टिकट मिलने वाला है. शंभूलाल एक हिंदूवादी संगठन उत्तर प्रदेश नवनिर्माण सेना की टिकट पर 2019 लोकसभा चुनाव लड़ने जा रहा है.

शंभूलाल को लोकसभा टिकट

यह खबर सामने आने के बाद भारतीय राजनीति के अपराधीकरण पर एक बार फिर से बहस तेज हो रही है. शंभूलाल को लोकसभा टिकट मिलना इस गंभीर बीमारी पर एक बार फिर से सवाल खड़े करता है. राजनीति में अपराधियों की इतनी आसानी से हो सकने वाली घुसपैठ का ही नतीजा है कि हमारी राजनीति आज डर, अपराध और पैसे का गढ़ बन कर रह गई है, जिसमें आम आदमी के लिए कोई जगह नजर नहीं आती.

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शंभू को टिकट देने वाले निवनिर्माण सेना के अध्यक्ष का मामले पर बयान भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी को उजागर करता है. अध्यक्ष अमित जानी ने अपने बयान में कहा, ‘अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और राजा भैया पर इससे भी ज्यादा गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं. जब शहाबुद्दीन जैसे लोग चुनाव लड़ सकते हैं तो शंभूलाल भी लड़ सकता है.’

अमित का यह बयान हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी खामी की ओर इशारा करता है. वह खामी है राजनीति, अपराधियों और पैसे वालों का गठजोड़. राजनीतिक सुधार की ओर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (ADR) के 2014 के बाद हुए सर्वे के अनुसार, देश की लोकसभा में मौजूद सांसदों में से 34 फीसदी पर अपराधिक मामले दर्ज हैं. यानि कि देश की संसद में तकरीबन एक-तिहाई सांसद ऐसे हैं जिन पर किसी ना किसी मामले में केस चल रहा है. यह अब तक की सारी लोकसभाओं में सबसे अधिक है.

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इसके अलावा इस बार की लोकसभा में 82 फीसदी सांसद करोड़पति हैं. ये आंकड़ा भी अब तक की लोकसभाओं में सबसे अधिक है. इसके अलावा एडीआर के एक और सर्वे के अनुसार देशभर में 33 फीसदी सांसदों और विधायकों पर अपराधिक मामले दर्ज हैं. एडीआर के अनुसार एक अपराधिक छवि वाले उम्मीदवार के जीतने की संभावना बेदाग छवि वाले नेता के मुकाबले लगभग दोगुनी है.

ये सारे आंकड़े दर्शाते हैं क्यों हमारी राजनीति में अच्छे लोगों की कमी होती जा रही है और क्यों यह आम लोगों के दुख-दर्द से दूर और अनजान हो चुकी है. जब देश की लोकसभा में मौजूद सांसदों में 34 फीसदी पर अपराधिक मामले दर्ज हो और 82 फीसदी करोड़पति हो, तो उनका गरीबों से कटना कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

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राजनीतिक पार्टियां जहां ‘मसल पॉवर’ और जमीन पर इन नेताओं की पकड़ के कारण इन्हें टिकट देती हैं, वहीं लोग कानून से इतर राजनीतिक संरक्षण और सुरक्षा के लिए इन्हें वोट देते हैं. 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के राज के साथ शुरु हुआ भारतीय राजनीति के अपराधिकरण का यह दौर समय के साथ बढ़ता ही गया और आज आलम ये है कि चुनाव लड़ने के लिए अघोषित रूप से यह एक योग्यता बन चुकी है.

ऐसे में शंभूलाल को लोकसभा टिकट मिलने पर बुरा तो लगता है लेकिन चौंकाता नहीं है. यह हमारी राजनीति की वो भयानक तस्वीर है जो समय-समय पर हमारे सामने आती रहती है. शंभूलाल तो इस तस्वीर का मात्र एक हिस्सा भर है, पूरी तस्वीर तो और भी डरावनी है.

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ये ‘सम्मान’ हत्यारा है साहब! देश में कब थमेंगी झूठे सम्मान के नाम पर होने वाली हत्याएं?

देश की राजधानी दिल्ली में अंकित सक्सेना की हत्या से देश में ऑनर किलिंग यानी झूठी शान की खातिर होने वाले कत्लों पर चर्चा छिड़ गई है.

2014 के बाद से ऑनर किलिंग के मामले काफी बढ़े हैं. 2014 के मुकाबले 2015 में ऑनर किलिंग के मामले 800 प्रतिशत ज्यादा हुए. 800 प्रतिशत यानि 8 गुना ज्यादा. केंद्रीय ग्रह राज्य मंत्री हंसराज आहिर ने संसद को बताया भी था कि देश में 2015 में ऑनर किलिंग के 251 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2014 में ये आंकड़ा महज 28 था. उन्होनें लोकसभा को बताया कि 2014 से 2016 के बीच झूठी शान की खातिर देश में 288 हत्याएं हुईं.

झूठी शान की खातिर कत्लों की संख्या के हिसाब से राज्यों की सूची भी चौकाने वाली है. इस सूची में यूपी 148 हत्याओं के साथ पहले नंबर पर रहा. भाजपा शासित मध्यप्रदेश 39 हत्याओं के साथ दूसरे स्थान पर है. ज्ञात हो कि जनसंख्या के मामले में मध्य प्रदेश देश का 5वां सबसे बड़ा राज्य है.

प्रधानमंत्री के ग्रह राज्य गुजरात में भी झूठी शान की खातिर 30 हत्याएं हुईं और यह ऑनर किलिंग की लिस्ट मे तीसरे स्थान पर रहा. जनसंख्या के हिसाब से गुजरात देश का 9वां सबसे बड़ा राज्य है. गुजरात में ऑनर किलिंग का यह आंकड़ा चौंकाने वाला भी हो सकता है क्योंकि गुजरात को देश में मॉडल के रुप में पेश किया जाता है. आश्चर्य वाली बात हैं कि खाप पंचायतों के लिए बदनाम हरियाणा में इस दौरान केवल 6 हत्याएं हुई.

झूठी शान की खातिर होने वाली हत्याएं यानि ऑनर किलिंग (हॉरर किलिंग) में धर्म और जाति एकमात्र फैक्टर नहीं है. कई मामलों में देखा गया है कि समान जाति में प्रेम और शादी करने पर भी युवा प्रेमी समाज की मानसिकता के प्रतीक ऑनर किलिंग का शिकार हुए हैं.

ऐस कत्लों के पीछे एक सोच महिलाओं और लड़कियों को कैद रखने और उनकी आजादी पर रोक लगाने की भी होती है. हमारे समाज में लड़कियों को अपने फैसले लेने से पहले परिजनों और पुरुष अभिभावकों से मंजूरी लेना जरूरी माना जाता है. अगर ऐसे में कोई लड़की अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुनती है, तो उसकी यह आजादी रूढ़िवादी परिजनों के झूठे ‘सम्मान’ और अहंकार को ठेस पहुंचाती है. इसी सोच से प्रभावित होकर वह ऑनर किलिंग जैसी समाज पर कलंक लगाने वाली घटनाओं को अंजाम देते हैं. घटना को अंजाम देता है.

देश में ना केवल इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है, बल्कि ऑनर किलिंग के खिलाफ एक सख्त कानून की भी बेहद जरूरत है. साथ ही दूसरे धर्म में शादी करने वाले युवाओं के लिए परिस्थितियां आसान करने और उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट में भी बदलाव की जरूरत है. हर मामले में हमसे पिछड़े हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में भी मॉडल कंदील बलोच की हत्या के बाद मजबूत एंटी-ऑनर किलिंग कानून बनाया गया है.

देश की राजधानी में अंकित की इस ऑनर किलिंग के बाद हम कह सकते है कि हमें भी अब ऑनर किलिंग के विरूद कानून की सख्त जरूरत है.

फेक न्यूज़ की शुरुआत कैसे हुई और क्या है इसके नुकसान, देखिये इस वीडियो में-

राजस्थान में युवक को कुल्हाड़ी से मारकर जलाने की घटना पर हमारा संपादकीय

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा कुछ दिन पहले भारत दौरे पर आए थे. उन्होंने भारत के धार्मिक सद्भाव की तारीफ करते हुए कहा था कि भारत भाग्यशाली है जो उसके पास हिन्दुस्तान को मातृभूमि मानने वाली इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी है. लेकिन लगता है कि ओबामा किसी ‘प्राचीन’ भारत की बात कर रहे थे. चमकते ‘न्यू इंडिया’ में ऐसा कुछ नहीं है. न्यू इंडिया में तो एक कुल्हाडी, उसको चलाती एक विचारधारा और नीचे पड़ा दम तोड़ता धार्मिक सद्भाव का प्रतीक ‘प्राचीन भारत.’

राजस्थान के राजसमंद में हुई घटना को लेकर चाहे हम कितना भी गुस्सा हो लें, रोष दिखा लें, चाहें हमें रोना आए या फिर डर लगे, बात कुल मिलाकर ये है कि इनसे कुछ होना जाना नहीं है. सवाल ये है कि इस नफरत के खेल से बाहर निकलने का रास्ता किसके पास है? सबसे बड़ा डर तो ये है कि कहीं आते-आते देर तो नहीं कर दी. पिछले दो-तीन साल से लिचिंग का यही पैटर्न चला आ रहा है. कई बार हमने नजरअंदाज किया तो कई बार इन्हें इतने बड़े देश में छोटी-मोटी घटना मानकर टाल दिया.

पहले दादरी, फिर पहूल खान, उसके बाद जुनैद खान और अब ये. लगता है कि ये सब एक एक्सपेरिमेंट चल रहा था. छोटी, फिर बड़ी, फिर उससे भी बड़ी, एक-एक करके इन घटनाओं से हमारे सहने और नजरअंदाज करने की सीमाओं का पता लगाया गया. हम चुप रहे और सहते गए, एक्सपेरिमेंट बद से बदतर और फिर भयावह होता चला गया.

राजस्थान वाले वीडियो में भी हत्यारा जो बात बोल रहा है वो कोई नई बातें नहीं हैं. लव जिहाद से लेकर हिन्दू धर्म की रक्षा और पाकिस्तान से फंडिग, ये बातें कई बार कई मंचों पर उठती रही हैं. सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो ये है कि कई बार ये बातें सरकारी मंचों और जिम्मेदार संवैधानिक और राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों से सुनने को मिली हैं. लव जिहाद पिछले कई सालों से रूलिंग पार्टी बीजेपी का मुद्दा बना हुआ है. साथ ही जिस तरीके से पूरी घटना का वीडियो बनाया गया, जिस तरीके से ध्यान रखा गया कि वीडियो में पीछे भगवा झंडा साफ दिखे, यह एक सोचा-समझा ‘संगठनात्मक’ कार्य ज्यादा लगता है. इस वीडियो और आईएसआईएस के प्रोपगैंडा वीडियो में बस झंडे भर का अंतर दिखता है.

ये बातें एक मजबूत शक पैदा करती है कि इन घटनाओं को अंजाम देने वाले किसी धर्म के ‘रक्षक’ ना होकर धार्मिक कट्टरता की राजनीति के प्यादे भर हैं. ऐसा लगता है कि जुबान तो उनकी है लेकिन बोल कोई और रहा है. इन प्यादों और सरकार में बैठे महत्वपूर्ण लोगों की बातों में कोई विशेष अंतर नजर नहीं आता है.

यही बात मौजूदा स्थिति को सबसे अलग और खतरनाक बनाती हैं. देश में धार्मिक कट्टरता का माहौल पहले भी बना है लेकिन अब से पहले कभी भी सरकार और धार्मिक कट्टरपंथियों के शब्दों में इतनी समानता नहीं रही.

अब जरूरत यही है कि हम इस बात को पहचानें कि नफरत आ कहां से रही है. ये बात जितनी जल्दी समझ जाए और जितनी जल्दी इसका निदान कर लें उतना अच्छा. वर्ना हमारे-आपके धार्मिक सद्भाव वाले भारत का ‘प्राचीन’ बनना और कुल्हाडी से हत्या करते तालिबानी ‘न्यू इंडिया’ का जन्म तो तय है.

फेक न्यूज़ की शुरुआत कैसे हुई और क्या है इसके नुकसान, देखिये इस वीडियो में-