दिल्ली में सिग्नेचर ब्रिज

आम आदमी पार्टी ने सिग्नेचर ब्रिज के नाम पर शेयर की नीदरलैंड के ब्रिज की फोटो

दिल्ली में सिग्नेचर ब्रिज (Signature Bridge) का काम पूरा हो गया है. 2004 में मंजूर हुआ यह यह ब्रिज लगभग 14 साल बाद बनकर तैयार हुआ है. इस ब्रिज को दिल्ली में 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार किया जाना था, लेकिन यह अब जाकर तैयार हुआ है. इस ब्रिज के उद्घाटन से पहले आम आदमी पार्टी के ट्विटर हैंडल से इस ब्रिज की बताकर कई फोटो शेयर की गई, लेकिन क्या ये सारी फोटो दिल्ली के सिग्नेचर ब्रिज की है? इसकी हम पड़ताल करेंगे, लेकिन पहले देखिये यह ट्वीट-

दिल्ली के सिग्नेचर ब्रिज

आप के ट्विटर हैंडल से पोस्ट की गई फोटो

इस ट्वीट में तीन फोटो दिए गए हैं. इसमें से पहला फोटो सिग्नेचर ब्रिज (Signature Bridge) का नही हैं.

दिल्ली में सिग्नेचर ब्रिज

इस फोटो को जब इंटरनेट पर सर्च किया गया तो पता चला कि यह फोटो नीदरलैंड के रोटरडैम शहर में बने Erasmus Bridge की फोटो है. इसकी फोटो आप नीचे देख सकते हैं-

दिल्ली में सिग्नेचर ब्रिज

रोटरडैम में बना ब्रिज

रोटरडैम में यह ब्रिज Meuse नदी पर बना है. इसकी कुल लंबाई 800 मीटर है. यह रोटरडैम साउथ को सिटी सैंटर से जोड़ता है. इससे जुड़ी और जानकारियों और फोटो देखने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. इसके अलावा इस ब्रिज का वीडियो भी यूट्यूब पर मौजूद है. इस वीडियो को आप नीचे देख सकते हैं. आम आदमी पार्टी ने जिस फोटो को ट्वीट किया है, वह फोटो वीडियो में 25 सेकंड पर दिखेगी.

इस पड़ताल से जाहिर है कि दिल्ली में सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी ने सिग्नेचर ब्रिज के नाम पर नीदरलैंड में बने ब्रिज की फोटो शेयर की है. हालांकि बाकी फोटो दिल्ली में सिग्नेचर ब्रिज की है.

क्या है सिग्नेचर ब्रिज (Signature Bridge)

यह ब्रिज दिल्ली के वज़ीराबाद से गाज़ियाबाद की ओर जाने वाले लोगों के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा. अभी तक लगने वाले ट्रैफिक जाम से लोगों को राहत मिलेगी. 2004 में जब इस ब्रिज का प्रस्ताव आया था, तब इसकी लागत सिर्फ 464 करोड़ रुपये थी, जो बाद में लगातार बढ़ती चली गई. केजरीवाल सरकार ने इसके लिए 2017 में 100 करोड़ रुपये आवंटित किए थे और इसे मार्च 2018 तक बन तैयार होना था. लेकिन तकनीकी व दूसरे कारणों से इसमे समय लग गया.

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डोनाल्ड ट्रंप के झूठ

राष्ट्रपति बनने के बाद अपने भाषणों में 6420 बार झूठ बोल चुके हैं डोनाल्ड ट्रंप

दुनियाभर में नेताओं के अपने भाषणों में गलत तथ्यों को पेश करने और झूठ बोलने का सिलसिला बढ़ रहा है. पीएम मोदी अपने भाषणों में कई बार झूठे दावे कर चुके हैं साथ ही कई गलत तथ्य भी पेश किये हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति भी इस मामले में पीछे नहीं है. अब डोनाल्ड ट्रंप के भाषणों का एक अध्ययन सामने आया है. इसके मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति काल में 6420 झूठे या भ्रामक दावे किए हैं.

डोनाल्ड ट्रंप के झूठ

डोनाल्ड ट्रंप रैली को संबोधित करते हुए

द वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद पहले 9 महीनों में 1318 झूठे या भ्रामक दावे किए यानी औसतन 5 झूठे दावे रोजाना. मध्यावधि चुनाव आने के समय में ट्रंप के भाषणों में झूठ की डोज बढ़ती गई और उन्होंने 1419 झूठे दावे किए यानी औसतन 30 झूठे दावे रोज.

डोनाल्ड ट्रंप के झूठ

बीते 30 अक्टूबर को ट्रंप को राष्ट्रपति बने हुए 649 दिन हुए थे. इन 649 दिनों में ट्रंप ने 6420 झूठे दावे किए. रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप अपनी हर रैली में 35 से 45 संदिग्ध दावे करते हैं और लोकल मीडिया को इंटरव्यू देते वक्त भी इन्हीं दावों को दोहराते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने सितंबर में 599 झूठे या भ्रामक दावे किए, जबकि अक्टूबर में लगभग दोगुनी होकर 1104 हो गई.

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वाशिंगटन पोस्ट की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रंप सबसे ज्यादा झूठे दावे अपनी रैलियों में करते हैं. ट्रंप ने अपनी रैलियों में 120 बार यह कहा है कि उन्होंने अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी टैक्स कटौती की है. 80 बार यह कहा है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था अब तक के सबसे अच्छे दौर में है. वहीं 74 बार यह झूठ बोला है कि सीमा पर दीवार बननी शुरू हो गई है. इसके अलावा लगभग 25 बार यह बोला है कि सुप्रीम कोर्ट के लिए नामित ब्रेट कावानॉग येल यूनिवर्सिटी में पहले नंबर पर थे, लेकिन असल बात यह है कि येल यूनिवर्सिटी रैंकिंग जारी नहीं करती है.

ये वाशिंगटन पोस्ट की पूरी रिपोर्ट का एक छोटा हिस्सा हमने आपके सामने हिंदी में पेश किया है. यह पूरी रिपोर्ट आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं.

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नेहरू सरदार पटेल की अंतिम यात्रा

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पीएम मोदी ने 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की मूर्ति ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ का उद्घाटन किया था. उद्घाटन के मौके पर उन्होंने सरदार पटेल को लेकर कई बातें कहीं. इसी दौरान सोशल मीडिया पर एक दावा वायरल हो रहा है कि पीएम मोदी ने कहा था कि पंडित नेहरू सरदार पटेल की अंतिम यात्रा में नहीं गए थे. आजतक के पत्रकार नवीन कुमार ने भी इसे दावे वाला एक ट्वीट किया है. उनका यह ट्वीट आप नीचे देख सकते हैं.

अकेले नवीन ने यह दावा नहीं किया है. सोशल मीडिया पर यह पोस्ट वायरल हो रहा है. कई लोगों ने इससे जुड़ी पोस्ट की है, लेकिन क्या यह पंडित नेहरू सच में पटेल की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुए थे? साथ ही क्या प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी बात कही थी कि नेहरू सरदार पटेल की अंतिम यात्रा में नहीं गए. आइये सिलेसिलेवार तरीके से इन दोनों दावों की पड़ताल करते हैं.

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क्या नेहरू पटेल की अंतिम यात्रा में नहीं गए थे?

जैसा दावा किया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी ने कहा कि नेहरू पटेल की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुए थे, पूरी तरह से झूठ है. हिंदी न्यूज पोर्टल सत्याग्रह की एक रिपोर्ट

के मुताबिक, तत्कालीन पीएम नेहरू पटेल की अंतिम यात्रा में शामिल हुए थे. इससे जुड़ा एक वीडियो भी उपलब्ध है. इसमें सरदार पटेल की शवयात्रा में जवाहरलाल नेहरू को साफ़ देखा जा सकता है. यह वीडियो आप नीचे देख सकते हैं-

क्या पीएम मोदी ने कहा था कि जवाहर लाल नेहरू सरदार पटेल की अंतिम यात्रा में नहीं गए थे

यह दावा एक हद तक सही है और एक हद तक झूठ भी. दरअसल, नरेंद्र मोदी ने यह बात एक इंटरव्यू में कही थी, लेकिन उस समय वो प्रधानमंत्री नहीं थे. उन्होंने यह इंटरव्यू 2013 में दिया था. उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. तो ऐसे में पीएम मोदी ने यह बात नहीं कही, लेकिन नरेंद्र मोदी ने गुजरात के सीएम रहते हुए यह बयान दिया था.

सच

हमारी पड़ताल में पोस्ट में किए गए दोनों दावे झूठ साबित होते हैं. हालांकि एक दावा आंशिक रूप से सही है.

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क्या है सरदार पटेल की प्रतिमा ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ के पास बैठे गरीब और भूखे लोगों का सच?

स्टैचू ऑफ यूनिटी

क्या है सरदार पटेल की प्रतिमा ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ के पास बैठे गरीब और भूखे लोगों का सच?

देश को एकसूत्र में पिरोने में अहम भूमिका निभाने वाले देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा के बारे में तो आपने सुना ही होगा. इस प्रतिमा को ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ के नाम से जाना जाएगा. 182 मीटर ऊंचाई वाली ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है. 31 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका अनावरण करेंगे.

लेकिन यह प्रतिमा अपने अनावरण से पहले ही विवादों में है और विरोधी इस बनाने में हुए ‘अनावश्यक’ खर्च को लेकर सवाल उठा रहे हैं. इसी से संबंधित एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें सरदार पटेल की इस प्रतिमा के पास एक गरीब महिला और दो बच्चे बैठे हुए हैं. महिला चूल्हे पर रोटी बना रही है और बच्चे खाना खा रहे हैं. अगर आपने यह तस्वीर अभी तक नहीं देखी है तो अब देखिए.

स्टैचू ऑफ यूनिटी

वायरल तस्वीर

इस तस्वीर के जरिए सरदार पटेल की प्रतिमा को बनाने के औचित्य पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. इस विशालकाय और भव्य प्रतिमा के पास ही अगर भूखे और बेघर लोग बैठे हैं तो यह सरकार के पाखंड पर गंभीर सवाल खड़े करता है. सोशल मीडिया यूजर्स यह भी कह रहे हैं कि खुद सरदार पटेल ऐसा कभी नहीं चाहते.

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लेकिन जब हमने इस तस्वीर की सत्यता जांचने की कोशिश की तो इसे फोटोशॉप्ड पाया. इस वायरल तस्वीर को दो तस्वीरों को एक साथ जोड़ कर बनाया गया है. पहली तस्वीर सरदार पटेल की और दूसरी है महिला और बच्चों की तस्वीर. महिला और बच्चों वाली तस्वीर को प्रतिमा की तस्वीर के साथ जोड़ दिया गया है. इस तस्वीर को पहले भी कई वेबसाइट्स ने भूख और गरीबी दिखाने के लिए सांकेतिक तस्वीर के तौर पर इस्तेमाल किया है. असल में यह तस्वीर कुछ ऐसी है.

स्टैचू ऑफ यूनिटी

असली दूसरी तस्वीर

यह तस्वीर में असल में कब और कहां की है, हमने इसकी भी पड़ताल की. हमारी पड़ताल में सामने आया कि यह तस्वीर अहमदाबाद की है. इस तस्वीर को समाचार एजेंसी रॉयटर्स के लिए अमित दवे ने खींचा था. रॉयटर्स की वेबसाइट पर आप इस तस्वीर की पूरी जानकारी देख सकते हैं.

स्टैचू ऑफ यूनिटी

इससे यह दावा कि यह सरदार पटेल के स्टैचू ऑफ यूनिटी के पास की तस्वीर है, झूठा साबित होता है. बता दें कि सरदार पटेल की यह प्रतिमा बनाने के लिए आदिवासियों की जमीन का अधिग्रहण किया गया है. इसके विरोध में गुजरात के कई आदिवासी संगठनों ने इस प्रतिमा से संबंधित किसी भी गतिविधि का हिस्सा ना बनने का निर्णय लिया है.

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हमीरपुर

जनसत्ता ने छापी UP में दलितों पर अत्याचार की ख़बर, पुलिस ने कहा दो साल पुराना है मामला, जानें- क्या है मामला

इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी न्यूज पोर्टल जनसत्ता.कॉम ने यूपी के हमीरपुर की एक खबर पब्लिश की है. जनसत्ता की इस खबर के मुताबिक, हमीरपुर के गदहा गांव में 10 दिनों तक दलितों के घर से निकलने पर रोक लगा दी है. इसकी वजह गांव में होने वाला अखंड रामायण पाठ है. जनसत्ता ने इस खबर में न्यूज 18 को अपनी खबर का सोर्स बताया है. जनसत्ता की यह खबर आप यहां क्लिक कर देख सकते हैं. नीचे इस खबर के स्क्रीनशॉट दिए गए हैं. यह खबर 29 अक्टूबर को पब्लिश की गई है.

 

हमीरपुर

जनसत्ता पर 29 अक्टूबर को पब्लिश खबर की हेडलाइन

 

जनसत्ता पर पब्लिश खबर की बॉडी

जनसत्ता ने इस खबर को ट्वीट भी किया. इस ट्वीट को रिट्वीट करते हुए मशहूर कवि कुमार विश्वास ने यूपी पुलिस से इस घटना पर संज्ञान लेने की अपील की.

https://twitter.com/DrKumarVishwas/status/1056864951636295681

पुलिस ने कहा- दो साल पुरानी खबर

इसके जवाब में यूपी पुलिस ने लिखा, ‘अवगत कराना है कि उक्त प्रकरण 02 वर्ष पूर्व का है जिसमें पुलिस द्वारा आवश्यक कार्यवाही की जा चुकी है। प्रकरण को बडा-चढ़ा कर प्रकाशित किया गया था। वर्तमान में इस प्रकार की कोई स्थिति नही है।’ आप यह ट्वीट नीचे देख सकते हैं.

जनसत्ता के अलावा इनखबर.कॉम ने भी हमीरपुर की इस खबर को पब्लिश किया है. इस खबर को आप यहां क्लिक कर देख सकते हैं. नीचे इस खबर का स्क्रीनशॉट दिया गया है.

हमीरपुर

इनखबर पर पब्लिश खबर का स्क्रीनशॉट

क्या जनसत्ता और इनखबर ने पुरानी खबर को फिर से छापा?

पुलिस के जवाब से पता चलता है कि यह मामला 2 साल पुराना है और इसकी जांच हो गई है. हमने इस पुराने मामले की जांच के लिए इंटरनेट पर सर्च किया. इस दौरान हमें टाइम्स ऑफ इंडिया और एनबीटी पर पब्लिश खबर दिखी. इन दोनों पोर्टल पर हमीरपुर की बिल्कुल यही खबर 23 अगस्त 2017 को पब्लिश हुई थी. इनके स्क्रीनशॉट आप नीचे देख सकते हैं-

हमीरपुर

टाइम्स ऑफ इंडिया पर पब्लिश खबर

 

हमीरपुर

एनबीटी पर पब्लिश खबर

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जनसत्ता खबर छापने से पहले उसके तथ्यों की जांच नहीं करता है. यह पत्रकारिता के बुनियादी नियम हैं जिनका ध्यान रखा जाना चाहिए. जनसत्ता और इनखबर जैसे पोर्टल ऐसे संवेदनशील खबरों को लापरवाही के साथ पब्लिश कर रहे हैं. ऐसी खबरों से इन न्यूज पोर्ट्ल की क्रेडिबिलिटी तो खत्म होती ही है साथ ही समाज में द्वेष बढ़ने की आशंका रहती है. जनसत्ता जैसे बड़े ब्रांड से ऐसी गलती की उम्मीद नहीं रहती है. जरूरत है कि जनसत्ता और इनखबर भविष्य में किसी भी खबर को छापने से पहले उसके बारे में तथ्यों की पड़ताल जरूर करेंगे.

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अपनी नन्हीं बेटी के साथ ड्यूटी करती महिला पुलिसकर्मी की वायरल फोटो को सच

सोशल मीडिया पर बहुत झूठ फैला है. यहां पर रोजाना हजारों फेक न्यूज, फेक फोटो और वीडियो वायरल होती रहती है. हम इन फेक न्यूज, फोटो और वीडियो की सच्चाई लगातार आपके सामने रखते आ रहे हैं. अब हम एक नई सीरीज शुरू कर रहे हैं. हम इस सीरीज में आपको उन वायरल फोटो की सच्चाई बताएंगे, जो थोड़े-थोड़े समय बाद वायरल होती रहती है. अगर आपके पास भी ऐसी कोई फोटो या वीडियो हो तो आप हमें भेज सकते हैं. हम उसकी सच्चाई भी आपको बताएंगे. आज हम आपको अपनी बेटी के साथ ड्यूटी कर रही पुलिसकर्मी की वायरल फोटो की सच्चाई बताने जा रहे हैं.

नन्हीं बेटी के साथ ड्यूटी करती महिला पुलिसकर्मी

यूपी पुलिस पिछले कई दिनों से चर्चा में है. मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह यूपी पुलिस की चर्चा हो रही है. हालांकि, इन चर्चाओं में यूपी पुलिस से जुड़े विवाद ही मुख्य रूप से छाए रहे हैं. अब यूपी पुलिस की एक ऐसी फोटो वायरल है जिसकी वजह से यूपी पुलिस की तारीफ हो रही है. पहले बेटी के साथ ड्यूटी करती महिला पुलिसकर्मी की यह फोटो देखिये उसके बाद इससे जुड़ी दूसरी बातें-

बेटी के साथ ड्यूटी करती महिला पुलिसकर्मी

सोशल मीडिया पर वायरल फोटो

यह फोटो झांसी कोतवाली में तैनात सिपाही अर्चना और उनकी बेटी अनिका की है. अर्चना झांसी में रहती हैं जबकि उनके सास-ससुर कानपुर में. अर्चना की बड़ी बेटी कानपुर में उन्हीं के पास रहकर पढ़ रही हैं. वहीं छोटी बेटी होने पर अर्चना ने छुट्टी ली थी. अब उनकी छुट्टियां पूरी हो चुकी हैं और उन्होंने ड्यूटी करना शुरू कर दिया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अर्चना ने बताया कि छोटी बेटी को घर पर नहीं छोड़ा जा सकता, इसलिए वो बेटी को लेकर थाने आ जाती है और अपनी ड्यूटी करती है.

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अर्चना को अपनी बेटी की इस तरह परवरिश करते देख पुलिस वाले भी अर्चना की सराहना कर रहे हैं. यूपी पुलिस डीआईजी ने भी अर्चना को ईनाम देने की घोषणा की है. सोशल मीडिया पर भी अर्चना की तारीफ हो रही है.

नि:शब्द

Posted by Sheetal P Singh on Friday, October 26, 2018

https://twitter.com/navsekera/status/1056036428474388480

बता दें कि सोशल मीडिया पर अकसर फोटो और वीडियो वायरल होते रहते हैं. कई बार ये असली होते हैं तो कई बार नकली. इस लिए सोशल मीडिया पर आने वाले हर फोटो, पोस्ट और वीडियो को सच ना मानें. ये झूठ भी हो सकते हैं क्योंकि सोशल मीडिया बेवफा है.

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क्या बीजेपी के चंदे वाले ट्वीट में पैन नंबर छुपाना भूल गए पीएम नरेंद्र मोदी?

कुछ दिन पहले 23 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी बीजेपी को दिए ऑनलाइन चंदे की रसीद ट्वीट की थी. पीएम मोदी ने यह चंदा नरेंद्र मोदी एप के जरिए दिया था. रसीद में प्रधानमंत्री की निजी जानकारियां (ईमेल और मोबाइल नंबर) को धुंधला किया हुआ था, ताकि वह सार्वजनिक ना हो. मोदी ने अपने ट्वीट में लोगों से एप के जरिए चंदा देकर सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता का संदेश देने की बात कही थी.

प्रधानमंत्री के ट्वीट के बाद कई लोगों ने प्रधानमंत्री को निशाने बनाते हुए कहा था कि उन्होंने अपना पैन नंबर तो धुंधला किया ही नहीं और यह सार्वजनिक हो गया. इनमें सबसे नाम था प्रमुख था ‘Elliot Alderson’ के छद्म नाम से ट्विटर अकाउंट चलाने वाले फ्रांसीसी हैकर का. इलियट ने ट्वीट करते हुए कहा प्रधानमंत्री को कहा कि वह पैन नंबर धुंधला करना तो भूल ही गए.

तो क्या सचमुच प्रधानमंत्री मोदी का पैन नंबर सचुमच सार्वजनिक हो गया है?
आपको बता दें कि इलियट का यह दावा गलत है. जो पैन नंबर सार्वजनिक हुआ है वह प्रधानमंत्री मोदी का नहीं है, बल्कि उनकी पार्टी बीजेपी का है. गूगल सर्च करने पर आपको आसानी से दिखा सकता है कि रसीद में दिख रहा पैन नंबर बीजेपी का है. चुनाव आयोग की वेबसाइट पर भी बीजेपी का पैन नंबर ‘AAABB0157F’ है.

इसके अलावा बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी पार्टी को दिए अपने चंदे की रसीद ट्वीट की थी जिसमें यही पैन नंबर दर्ज है. जाहिर सी बात है कि दो व्यक्तियों का एक ही पैन नंबर नहीं हो सकता. अमित शाह औऱ मोदी की चंदे की रसीद पर दर्ज पैन नंबर बीजेपी का है.

इनकम टैक्स आय़ोग द्वारा पैन नंबर निर्धारित करने के लिए जो फॉरमेट प्रयोग किया जाता है, उसके हिसाब से भी ये ‘AAABB0157F’ पैन नंबर मोदी का नहीं हो सकता. दरअसल, पैन कार्ड के चौथे अक्षर से यह पता चल जाता है कि वह पैन नंबर किसी व्यक्ति का है या संस्था का. अगर किसी पैन कार्ड का चौथा अक्षर B है तो वह किसी संस्था का पैन नंबर है और अगर चौथा अक्षर P है तो यह किसी व्यक्ति का पैन नंबर है. जिस पैन नंबर को पीएम मोदी का होने का दावा किया जा रहा है, उसका चौथा अक्षर B है यानि ये किसी संस्था का नंबर है.

इसके अलावा पैन कार्ड का पांचवां अक्षर कार्ड होल्डर के आखिरी नाम का पहला अक्षर होता है. यानि अगर ‘AAABB0157F’ मोदी का पैन नंबर होता तो इसमें पांचवां अक्षर M होना चाहिए था, B नहीं.

ऐसे में हमारी जांच में प्रधानमंत्री मोदी का पैन नंबर ‘AAABB0157F’ होने का दावा गलत पाया गया है. दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी का पैन नंबर पहले से ही सार्वजनिक है क्योंकि जो व्यक्ति चुनाव लड़ता है उसे अपना पैन नंबर सार्वजनिक करना ही होता है. प्रधानमंत्री मोदी का पैन नंबर ‘AHHPM8993N’ है.

हमारी जांच में फ्रांसीसी हैकर का प्रधानमंत्री मोदी के पैन नंबर से संबंधित दावा गलत पाया गया है. ‘AAABB0157F’ प्रधानमंत्री मोदी नहीं बल्कि बीजेपी का पैन नंबर है.

पीएम मोदी की मेकअप आर्टिस्ट

क्या पीएम मोदी ने 15 लाख रुपये हर महीने सैलरी वाली मेकअप आर्टिस्ट रखी है?

पीएम नरेंद्र मोदी के स्टाइल को काफी तारीफ होती है. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हो रही है जिसमें दावा किया गया है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने 15 लाख रुपये महीने की सैलरी पर मेकअप आर्टिस्ट रखी है. सोशल मीडिया पर इससे जुड़ी कई पोस्ट शेयर हो रही है. हम इस दावे की पड़ताल करेंगे, लेकिन उससे पहले देखिये वायरल हो रही फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट-

पीएम मोदी की मेकअप आर्टिस्ट

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही पोस्ट

फेसबुक के अलावा ट्विटर पर ऐसी कई पोस्ट वायरल हो रही हैं. इन्हें आप नीचे देख सकते हैं.

पीएम मोदी की मेकअप आर्टिस्ट से जुड़े दावे की पड़ताल

शेयर हो रही पोस्ट में एक महिला पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे का मेजरमेंट कर रही हैं. इस महिला के हाथ में बॉक्स है. इस बॉक्स को ध्यान पर देखने पर इसमें बना Madame Tussauds का लोगो नजर आता है. इसका मतलब यह है कि इस फोटो का मैडम तुसाद (Madame Tussauds) से जरूर कोई संबंध होगा. बता दें कि मैडम तुसाद एक वैक्स म्यूजियम है जहां मशहूर हस्तियों के मोम के पुतले बनाए जाते हैं.

पीएम मोदी की मेकअप आर्टिस्ट

मैडम तुसाद का लोगो

जो लोग खबरों से वास्ता रखते हैं उन्हें पता होगा कि पीएम मोदी का भी स्टैच्यू मैडम तुसाद म्यूजियम में लगाया गया था. पीएम मोदी का यह स्टैच्यू अप्रैल 2016 में लगाया गया था. इसके लिए मैडम तुसाद म्यूजियम के कर्मचारियों ने पीएम मोदी का मेजरमेंट किया था. इसके लिए पीएम मोदी के चेहरे, उनके हावभाव और उनकी बॉडी को अच्छी तरह से जांचा परखा जाता है. यह फोटो तभी की है जब पीएम मोदी के चेहरे का मैजरमेंट किया जा रहा था. पीएम मोदी के पास खड़ी महिला उनकी मेकअप आर्टिस्ट ना होकर मैडम तुसाद म्युजियम की कर्मचारी है. इससे जुड़ा एक वीडियो आप नीचे देख सकते हैं-

सच

हमारी पड़ताल में पता चला कि फेसबुक और ट्विटर पर शेयर हो रहा दावा झूठ है. पीएम मोदी ने 15 लाख रुपये की सैलरी वाली कोई मेकअप आर्टिस्ट नहीं रखी है. जिस फोटो के आसरे ऐसा दावा किया जा रहा है उसकी सच्चाई हम आपको ऊपर बता चुके हैं.

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हमारी अपील

सोशल मीडिया पर पीएम मोदी की मेकअप आर्टिस्ट से जुड़ी पोस्ट फेक है. हम आपसे अपील करते हैं कि इस तरह की फेक पोस्ट, फेक न्यूज, फेक इमेज और वीडियो पर भरोसा ना करें. ना ही इन्हें शेयर या फॉरवर्ड करें. सोशल मीडिया पर बहुत झूठ फैला है. इस झूठ से बचकर रहने की जरूरत है.

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क्या जर्मनी में सरकारी कार्यक्रमों में मांस पर बैन है?

FACT CHECK : इस बात में कितनी सच्चाई है कि जर्मनी में सरकारी कार्यक्रमों में मांस पर बैन है?

क्या जर्मनी में सरकारी कार्यक्रमों में मांस पर बैन है? सोशल मीडिया पर एक न्यूज वायरल हो रही है जिसमें कहा गया है कि जर्मनी ने अपने सार्वजनिक कार्यक्रमों में मांस परोसने पर रोक लगा दी है. आरबीआई के पार्ट टाइम डायरेक्टर और अपने ट्वीट्स से सुर्खियों में रहने वाले एस गुरुमूर्ति ने भी इस खबर को शेयर किया है. उन्होंने लिखा कि यह जरूर मोदी के जरिए आरएसएस की अंतरराष्ट्रीय साजिश है. लिबरल और सेक्युलर लोगों को अब जर्मनी लिबरल जर्मनी को निशाना बनाना चाहिए. देखिये उनका यह ट्वीट-

क्या जर्मनी में सरकारी कार्यक्रमों में मांस पर बैन है?

जब हमने एस गुरुमूर्ति के इस ट्वीट में दी गई न्यूज की पड़ताल की तो इसकी सच्चाई सामने आई. हमारी पड़ताल में पता चला कि यह सही बात है कि जर्मनी ने अपने सरकारी समारोह में मांस परोसने पर रोक लगा दी है. हमने जब इसके लिए गूगल किया तो हमें हफिंगटन पोस्ट की एक खबर मिली. यह खबर 23 फरवरी 2017 को पब्लिश हुई थी. इसका मतलब कि जर्मनी में सरकारी कार्यक्रमों में मांस पर प्रतिबंध फरवरी 2017 में लगाया गया था.

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सरकारी कार्यक्रमों में मांस पर लगे बैन के बाद जानवरों के लिए काम करने वाली संस्था पेटा (पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स) ने भारत सरकार से भी सरकारी कार्यक्रमों में मांस पर बैन लगाने की मांग की थी. हालांकि भारत में ऐसा कोई बैन नहीं लगा है.

सच

हमारी पड़ताल में जर्मनी में सरकारी कार्यक्रमों में मांस पर बैन लगाने की खबर सच साबित होती है. जर्मनी में पिछले साल यह बैन लग चुका है. अब एक बार फिर सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल हो रही है.

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क्या नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था, RSS और हिंदू महासभा गद्दार हैं?

क्या नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था, RSS और हिंदू महासभा गद्दार हैं? 

पिछले कुछ सालों में देश में एक चलन बढ़ा है, देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले महान नेताओं को लेकर अधूरी जानकारी के आधार पर नए सत्य गढ़ना. इस चलन को ‘Post Truth’ का नाम दिया गया है और यह इस समय पूरे विश्व में इस चलन का बोलबाला है. नेहरू से लेकर सरदार पटेल और भगत सिंह से लेकर स्वामी विवेकानंद इसके शिकार हो चुके हैं.

भारत के आजादी संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस इसी लिस्ट का एक हिस्सा हैं. अक्सर सुभाष चंद्र बोस के सहारे भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी पर निशाना साधा जाता है. जी न्यूज के एंकर सुधीर चौधरी की एक ऐसी ही कोशिश का पर्दाफाश हम अपनी पिछली पोस्ट में कर चुके हैं. आप नीचे ये खबर पढ़ सकते हैं.

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अब नेताजी बोस के बारे में ऐसा ही कुछ दावा विपरीत विचारधारा वालों की ओर से किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर वायरल एक तस्वीर में नेताजी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा के बारे में विचार बताए गए हैं. इसके तस्वीर पर लिखे हुए कि माने तो बोस ने कहा था कि RSS और हिंदू महासभा गद्दार हैं. तस्वीर पर लिखा हुआ है, ‘आरएसएस और हिंदू महासभा वाले इस देश में सबसे बड़े गद्दार हैं. ये हमेशा इस देश को तोड़कर विदेशी ताकतों को फायदा पहुंचाना चाहते हैं.’ नीचे नेताजी बोस के नाम के साथ 1938 भी लिखा हुआ है, जिसका मतलब है कि उन्होंने यह बयान 1938 में दिया था.

RSS और हिंदू महासभा गद्दार

वायरल तस्वीर

इस तस्वीर को ‘वायरल इन इंडिया’ नामक पेज से शेयर किया गया है. जब हमने इस दावे की पड़ताल की तो हमें ऐसा कोई भी दस्तावेज, लेख या सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि नेताजी ने कहा हो कि RSS और हिंदू महासभा गद्दार हैं. नेताजी के लेखों और भाषणों में आरएसएस का जिक्र ना के बराबर होता था. लेकिन हिंदू महासभा के बारे में उनके कुछ विचार जरूर सार्वजनिक हैं.

हिंदू महासभा की तुलना वह अक्सर मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग से करते थे. इन दोनों संगठनों के सांप्रदायिक विचारों के कारण उन्होंने 1938-39 में कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते ‘दोहरी सदस्यता‘ रद्द कर दी थी. इसका मतलब ये था कि कोई भी व्यक्ति हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग का सदस्य होते हुए कांग्रेस का सदस्य नहीं बन सकता था. कांग्रेस के संविधान में यह बात जोड़ दी गई कि हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे सांप्रदायिक संगठनों का कोई भी सदस्य कांग्रेस का सदस्य नहीं बन सकता.

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इसके अलावा अन्य मौकों पर भी उन्होंने हिंदू महासभा और इसके नेताओं की सांप्रदायिक विचारों की आलोचना की थी. 1940 के कलकत्ता नगर निगम चुनावों में जब हिंदू महासभा ने कांग्रेस से किया चुनावी समझौता तोड़ा तो उन्होंने कहा था कि हिंदू महासभा का लक्ष्य कॉपरेशन को अंग्रेजों के हाथों में जाने से रोकने की बजाय कांग्रेस को तोड़ना है.

अपने विदेशी प्रवास के दौरान नेताजी ने हिंदू महासभा पर और भी तीखा हमला किया था. 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने अंग्रजों को भारत से बाहर भगाने के लक्ष्य के साथ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का ऐलान किया था. लेकिन हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने इस आंदोलन का विरोध करते हुए अंग्रजों का साथ दिया था. यह अपील करने वालों में वीर सावरकर भी शामिल थे.

इस बात के लिए दोनों संगठनों की तीखी आलोचना करते हुए जर्मनी में आजाद हिंद रेडियो के 31 अगस्त 1942 के प्रसारण में बोस ने कहा था, ‘मैं मोहम्मद अली जिन्ना, मिस्टर सावरकर और अन्य नेताओं जो अभी तक ये सोचते हैं कि अंग्रेजों से समझौता हो सकता है, को यह एहसास करने का अनुरोध करता हूं कि कल की दुनिया में कोई भी ब्रिटिश साम्राज्य नहीं रहेगा. उन सभी व्यक्तियों, समूहों और संगठनों को कल के भारत में एक सम्मानीय स्थान मिलेगा जो आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेते हैं. ब्रिटिश राज के समर्थक आजाद भारत में विलुप्त हो जाएंगे.’

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हिंदू महासभा के बारे में सुभाष चंद्र बोस के इन सभी विचारों से पता चलता है कि वह इस संगठन को सांप्रदायिक मानते थे और इसके सांप्रदायिक विचारों से सहमत नहीं थे. हालांकि कुछ मौकों पर उन्होंने हिंदू महासभा के नेताओं की तारीफ भी की, लेकिन अधिकांश मौकों पर वह पूरे संगठन और उसकी विचारधारा के घोर विरोधी नजर आए.

लेकिन हमें कही भी ऐसा सबूत या दस्तावेज नहीं मिला जिससे साबित हो सके कि उन्होंने कहा था कि RSS और हिंदू महासभा गद्दार हैं. नेताजी बोस एक कूटनीति और राजनीति को समझने वाले व्यक्ति थे और वह अपने कट्टर विरोधियों के खिलाफ भी ऐसी कठोर भाषा का इस्तेमाल करेंगे, इसमें गहरा संदेह है. हमारी जांच में सुभाष चंद्र बोस के हवाले से ‘RSS और हिंदू महासभा गद्दार है’ का दावा करने वाली तस्वीर को फर्जी पाया गया है.

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