निधि राजदान

क्या भविष्य की अमित मालवीय हैं दिव्या स्पंदना, निधि राजदान पर किए गए भद्दे कमेंट से तो यही लगता है

कांग्रेस पार्टी की सोशल मीडिया सेल की प्रमुख दिव्या स्पंदना एक बार फिर अपने ट्वीट के चलते विवादों में फंसती दिख रही हैं. दिव्या ने गुरुवार को पीएम मोदी की स्टैचू ऑफ यूनिटी के साथ एक फोटो शेयर की. इस फोटो में पीएम मोदी सरदार पटेल की मूर्ति के पैर के पास खड़े हैं. इस फोटो के साथ दिव्या ने लिखा, ‘Is that bird dropping?’ इस ट्वीट को लेकर उनकी आलोचना हो रही है. इस ट्वीट को आप नीचे देख सकते हैं-

दिव्या के इस ट्वीट को लेकर कई लोगों ने सवाल उठाए थे. इसके बाद दिव्या ने एक ट्वीट और किया. इसमें उन्होंने लिखा कि मेर विचार मेरे हैं. मैं अपनी बात का स्पष्टीकरण नहीं दूंगी. नीचे देखिये यह ट्वीट-

दिव्या के इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार निधि राजदान ने सवाल उठाए. निधि ने लिखा कि आप सार्वजनिक जीवन रहते हुए आप यह पोजीशन नहीं ले सकते. आप एक राजनीतिक दल से संबंध रखते हैं इसलिए लोगों का यह जानने का हक है कि आपके कहे का मतलब क्या है?

निधि राजदान के इस ट्वीट का दिव्या ने जवाब दिया. उन्होंने लिखा, ‘Not my circus, not my monkeys.’

इसके बाद निधि ने दिव्या से सवाल पूछा कि क्या आपने भारत के वोटर्स को मंकी बुलाया है?

इसके बाद दिव्या ने निधि राजदान को जवाब देते हुए लिखा कि श्रीनगर घूमकर आइए. आपको अच्छा लगेगा.

इसके बाद निधि राजदान ने कहा काश मैं जा पाती, लेकिन मेरे पास करने को काम हैं. मुझे लगता है आपको जाना चाहिए. कश्मीर की ताजा हवा आपको अच्छी लगेगी.

क्या दिव्या ने निधि के कथित अफेयर का हवाला देकर उन्हें चुप कराने की कोशिश की?

इस बातचीत के दौरान दिव्या ने निधि से कहा कि आप श्रीनगर घूमकर आइए. इसका सीधा इशारा जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुला के साथ निधि के कथित अफेयर की ओर था. यह एक शर्मनाक ट्वीट था. इसमें देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की सोशल मीडिया हेड एक पत्रकार को कथित अफेयर की बात कहकर चुप कराने की कोशिश कर रही है. दोनों के बीच बातचीत बेहद जरूरी और प्रोफेशनल मोर्चे पर हो रही थी, लेकिन दिव्या बीच में तंज कसते हुए पर्सनल हो गई. एक तरफ जहां देशभर में #MeToo के तहत महिलाओं को आवाज उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है वहीं दिव्या कथित अफेयर को लेकर निधि पर तंज कस रही हैं.

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बीजेपी आईटी सेल की तर्ज पर कांग्रेस?

बीजेपी आईटी सेल पर लोगों पर नेताओं पर पर्सनल हमले करने के आरोप लगते आए हैं. अब यही काम कांग्रेस की सोशल मीडिया सेल कर रही है. बल्कि इस काम की शुरुआत सोशल मीडिया हेड ही कर रही है. अब कांग्रेस सत्ता में नहीं है, लेकिन पत्रकारों को चुप कराने के लिए कांग्रेस भी बीजेपी के रास्ते पर चल पड़ी है, जो इस वक्त देश पर राज कर रही है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि कांग्रेस सत्ता में आने के बाद पत्रकारों से कैसा व्यवहार करेगी? साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या कांग्रेस की दिव्या स्पंदना अब बीजेपी आईटी सेल के हेड अमित मालवीय की राह पर निकल पड़ी है? क्या दिव्या स्पंदना अगली अमित मालवीय बनने जा रही हैं?

हालांकि, इस पूरी बातचीत के दौरान निधि ने बेहद संयम बनाए रखा. उन्होंने हर सवाल का संयम के साथ जवाब दिया और दिव्या की तरह पर्सनल मामलों पर नहीं उलझी. एक पत्रकार होने के नाते निधि राजदान का फर्ज था कि वो देश की मुख्य विपक्षी पार्टी की नेता से सवाल करें. उनकी बात का मतलब पूछे. निधि ने यही किया, लेकिन दिव्या बजाय जवाब देने के कथित अफेयर की बातें करने लगीं. यह ना सिर्फ एक पत्रकार को चुप कराने की कोशिश है बल्कि अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना भी है.

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क्या आपको पता है ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ के अंदर 2 IIT, 5 IIM और 6 ISRO समाए हुए हैं!

 

क्या आपको पता है ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ के अंदर 2 IIT, 5 IIM और 6 ISRO समाए हुए हैं!

जानें स्टैचू ऑफ यूनिटी की लागत और इतनी रकम से क्या-क्या बन सकता था?

देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को समर्पित दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति स्टैचू ऑफ यूनिटी की लागत करीब 29.89 अरब रुपए हैं. गुजरात में बनी इस मूर्ति का अनावरण करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इशारों-इशारों में कांग्रेस पर पटेल की विरासत को नजरअंदाज करने का आरोप भी लगाया.

स्टैचू ऑफ यूनिटी की लागत

लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये है कि स्टैचू ऑफ यूनिटी की लागत को लेकर सरकार की आलोचना भी हो रही है. इंडिया स्पेंड के विश्लेषण के मुताबिक, इस मूर्ति को बनाने में जितनी रकम खर्च की गई है, उतने पैसों में दो आईआईटी, पांच आईआईएम और मंगल के लिए 6 नए इसरो केंद्र का निर्माण किया जा सकता है.

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रिपोर्ट के अनुसार, मूर्ति को बनाने के लिए शुरुआत में जो प्रस्ताव केंद्र सरकार को सौंपा गया था, वास्तव में मूर्ति बनाने में उसके दोगुने से अधिक का खर्च आया है.

पटेल की याद में समर्पित इस मूर्ति की ऊंचाई 182 मीटर है, जो दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति है. पटेल आजाद भारत के पहले गृह मंत्री थे और भारत के एकीकरण में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें लौह पुरुष के नाम से जाना जाता है. गुजरात के किसान इस मूर्ति निर्माण का विरोध कर रहे हैं और उनकी मुख्य नाराजगी पुनर्वास और मूर्ति के इलाके में पानी को सिंचित किए जाने को लेकर है.

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विश्लेषण के मुताबिक, इस रकम से 40,192 हेक्टेयर जमीन को सिंचित किए जाने के साथ, 162 से अधिक छोटी सिंचाई परियोजनाओं का पुनरुद्धार और 425 नए छोटे बांध बनाए जा सकते थे. जाहिर है कि इतनी रकम प्रतिमा की जगह कृषि क्षेत्र में लगाने पर गुजरात में किसानों के हालत में जमीन-आसमान का अंतर आ जाता.

जानें 2989 करोड़ रुपये में क्या कुछ बनाया जा सकता है?

  • स्टैचू ऑफ यूनिटी को बनाने में जितना खर्चा आया है, वह 2017-18 में राष्ट्रीय कृषि योजना के तहत केंद्र सरकार की तरफ से गुजरात को दी गई रकम 365 करोड़ रुपये के मुकाबले आठ गुना से भी अधिक है.
  • स्टैचू ऑफ यूनिटी की लागत में दो नए आईआईटी कैंपस का निर्माण किया जा सकता है. इंडिया स्पेंड के विश्लेषण के मुताबिक, एक आईआईटी कैंपस को बनाने की लागत 11.67 अरब रुपए है.
  • इस लागत से दो नए एम्स का निर्माण भी किया जा सकता है. विश्लेषण के मुताबिक एम्स के कैंपस की निर्माण लागत करीब 11.03 अरब रुपए है.
  • प्रति कैंपस 5.39 अरब रुपये की लागत को देखते हुए इतनी रकम में पांच नए आईआईएम कैंपस भी बनाए जा सकता हैं.

तो आपने जाना कि सरदार पटेल की प्रतिमा स्टैचू ऑफ यूनिटी पर हुए खर्चे से क्या-क्या किया जा सकता था. अगर इस रकम को शिक्षा, स्वास्थ या कृषि के क्षेत्र में लगाया जाता तो करोड़ों लोगों के जीवन में सुधार लाया जा सकता था. इसी कारण स्टैचू ऑफ यूनिटी के औचित्य और सरकार पर सवाल भी उठ रहे हैं. लेकिन सरकार का मानना है कि देश को एकसूत्र में पिरोने का काम करने वाले सरदार पटेल को यही सम्मान और महत्व देने के लिए यह जरूरी था.

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विजय गोयल

BLOG : विजय गोयल द्वारा पैसे कमाने की होड़ पर उठाये गए सवालों का जवाब

बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय गोयल ने कुछ दिन पहले एक आर्टिकल लिखा था. इस आर्टिकल में उन्होंने पैसा कमाने की होड़ पर सवाल उठाए थे. हमारे एक साथी ने विजय गोयल के इस आर्टिकल में उठाए गए सवालों का जवाब देने की कोशिश की है.

विजय गोयल

विजय गोयल का एनबीटी में पब्लिश आर्टिकल

विजय गोयल ने अपने आर्टिकल में कहा कि “ज्यादा से ज्यादा धन जुटाने की होड़ में लोगों ने अपना सुख चैन गंवा दिया है.” मैं उनकी बात से सहमत हूं. एक व्यक्ति तीन बार दिल्ली से सांसद रहा चुका है. उन्होंने केंद्र में कुशासन भरे कांग्रेस के कार्यकाल में इतना सुख-चैन गंवाया कि 4 साल में उनकी संपत्ति में करीब 10 गुना बढ़ोतरी हो गई. मैं विजय गोयल जी आपकी बात कर रहा हूं. आपने 2009 में लोकसभा चुनाव लड़ा तो निजी संपत्ति 3 करोड़ बताई थी, जब 2013 में राज्यसभा चुनाव लड़ा तो आपके घोषणा पत्र के मुताबिक, आपकी संपत्ति बढ़कर 29 करोड़ के करीब की हो गई थी. आप इतना क्यों कमा रहे हैं?

एक फीसद आबादी के पास देश की 58 फीसद संपत्ति

देश की आबादी का केवल 10 फीसद हिस्सा है जो ज्यादा से ज्यादा धन जुटाने की होड़ में सुख-चैन गंवाया है. बाकी तो बस पेट भरने के लिए सुख-चैन गंवा रहे हैं. विश्व भूखमरी सूचकांक में भारत 119 देशों में 100वें स्थान पर है. हर पांचवा बच्चा कुपोषण का शिकार है. आपने शायद बीजेपी के शासन आने के बाद आर्थिक असमानता पर रिपोर्ट पढ़नी छोड़ दी है. क्रेडिट सुईस की एक रिपोर्ट है. उसके मुताबिक देश की 1 फीसद संभ्रांत आबादी के पास देश की 58 फीसद संपत्ति है. निचले 70 फीसद भारतीयों के पास देश की केवल 7 फीसद संपत्ति है.

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ऑक्सफेम की रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में आर्जित संपत्ति का 73 फीसद हिस्सा संभ्रांत एक फीसद भारतीयों के पास गया है. शायद आप सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना के बारे में जानते होंगें. जिसके मुताबिक, 75 फीसद ग्रामीण परिवार 5 हजार रुपये से कम कमाते हैं, 90 फीसद परिवार 10 हजार से कम कमाते हैं. ऐसे में आपका ये कहना कि लोग पैसा कमाने के चक्कर में सुख चैन गंवा रहे हैं, गलत है. ज्यादातर लोग अपना पेट भरने के लिए सुख-चैन गंवा रहे है.

खुद को जिंदा रखने के लिए कमा रहे हैं ज्यादातर लोग

गोयल जी आपने कहा कि लोगों को “कमाने का क्या उदेश्य है, यह नहीं पता और उसके लिए हमने क्या साधन अपनाए हैं, वह भी हमें नहीं पता.” शायद गोयल जी आपको नहीं पता कि आपने पैसा कमाने के लिए कौन-से साधन अपनाए. आम जनता को उसकी कमाई के उदेश्य और साधनों के बारे में सब पता है. मैं मज़दूर हूं. मुझे पता है कि मेरे कमाने का उदेश्य सर्वाइवल है. खुद को जिंदा रखना.

90 फीसद भारतीय जानते हैं कि कमाने का उदेश्य स्कूल, कॉलेज और डॉक्टर की फीस का भुगतान करना है. किसान को पता है उसकी कमाई का साधन उच्च जाति वाले साहूकार का कर्ज उतारकर फसल से हुई कमाई है. मजदूर को उसकी कमाई का साधन पता है. नौकरीपेशा को पता है कि उसने दिन में ओवर टाइम कर कमाई की. सीवरकर्मी को पता है कि उसने मौत से खेलकर पैसा कमाया, जवान को पता है कि बॉर्डर पर खराब दाल खाकर सरकार से सैलरी ली, शायद गोयल जी आपको नहीं पता कि पैसा कमाने के लिए आपने कौन-से साधन अपनाए. जिस दिन आपको अपनी कमाई का साधन पता चल जाए हमें भी बता देना.

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आपने लिखा है कि “इतना कमाकर करेगा क्या आम आदमी. वास्तव में हम क्यों और किसके लिए कमा रहे हैं, यह भी हम नहीं जानते.” क्या आपके हिसाब से पैसा कमाने का अधिकार खास आदमी को ही है? क्या आम आदमी को पैसा कमाने का कोई हक नही? “पैसा कमाकर क्या करेगा आम आदमी” जैसा सवाल आप आदमी से मत पूछिए क्योंकि आम आदमी गरीब है, मध्यमवर्गीय है. वो कमा रहा है जीएसटी के भुगतान के लिए. 100 रुपये के करीब पहुंच चुके पेट्रोल और डीजल के भुगतान के लिए. शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए. ये सवाल आपको खास आदमी से पूछना चाहिए कि वो इतना पैसा क्यों कमाना चाहता है? खास आदमी, खास क्यों बना रहना चाहते हैं? आप भी खास आदमी हैं. आप इतना क्यों कमा रहे हैं?

खास आदमी खास क्यों बने रहना चाहता है?

चलो आप ही बता दीजिएगा. आप खास परिवार से आए हैं. आपके पिता चरती लाल गोयल दिल्ली विधानसभा के स्पीकर थे. उनके पैसे पर आपने एम कॉम की, एलएलबी की. आपके पिता खास आदमी होकर चले गए, आप भी क्यों राजनीति में आकर खास आदमी हो गए? आप मुझे बताइये कि खास आदमी खास क्यों बना रहना चाहता है? वो कभी आम आदमी क्यों नहीं होना चाहता?

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आपने एक और बात कही है “आम आदमी से पूछो तो वह कहता है कि मैं अपने बच्चों के लिए कमा रहा हूं, जो सरासर झूठ है.” आपने बिल्कुल सही कहा. महंगाई बहुत है. आम आदमी बच्चों के लिए कमा ही नहीं पता. आपके जैसे खास आदमी ही बच्चों के लिए कमा पाते हैं. आपका बेटा हवेली धर्मपुरा चलाता है, वो आप ही की कमाई से बनाई होगी या फिर उसने खुद की कमाई से बनाई है?

आपने आम आदमी को सलाह दी है कि “अपने और बच्चों के लिए भी एक सीमा तक ही कमाना जरूरी है. लोग कमाने में लगे हैं लेकिन उसका करेंगे क्या, ये उन्हें नहीं मालूम”( मैं तो बस इतना पूछना चाहता हूं कि आपकी सीमा क्या है? खुद की सीमा क्यों नहीं तय की. आप चौथी बार सांसद बने है, क्या आप सैलरी और सुविधाएं ले रहे है?)

आपको नवभारत टाइम्स में ये आर्टिकल नहीं लिखना चाहिए था क्योंकि ये हिंदी भाषी लोगों का अखबार है, जिनमें ज्यादातर मध्यमवर्गीय होते हैं, गरीब होते हैं. अकूत संपत्ति वाले लोग अंग्रेजी अखबार पढ़ते हैं. आपको टाइम्स ऑफ इंडिया टाइप अंग्रेजीदा अखबार आर्टिकल लिखना चाहिए था और धन्ना-सेठों से सवाल पूछने चाहिए थे.

आपने लिखा है कि “आजकल धन के दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ गई है.” मेरा कहना है कि आपके बेटे ने जो बिल्डिंग बनाई है जिसमें मुगल काल की कला दिखाने का दावा है क्या वो दिखावे के लिए नहीं है)

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आपने एक बेहद अच्छी बात की है कि “कई लोगों के लालच की कोई सीमा नहीं होती.” मेरा मानना है कि ये बिल्कुल सही बात है. आपके पिता दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष रहे थे, लेकिन सत्ता के लालच ने आपको ऐसा जकड़ा कि आप राजनीति में आ गए. संतान के लालच की पूर्ति के लिए आपने भी कुछ कम नहीं की. आपकी बेटी को श्रीराम कालेज ऑफ कॉमर्स में इसलिए दाखिला मिला क्योंकि आप कॉलेज की गवर्निग बॉडी के सदस्य थे. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक स्टोरी के मुताबिक, श्रीराम कालेज ऑफ कॉमर्स में 92 फीसद कट ऑफ था, लेकिन आपकी बेटी को केवल 87.55 फीसद के साथ ही दाखिला मिल गया था. सच में लोगों के लालच की कोई सीमा नहीं होती.

आपने शादी और मकान पर फजूलखर्ची की बात की है. साथ में लोगों के एक के बाद एक प्लॉट खरीदने पर सवाल उठाए है, लेकिन सवाल ये है आपके दो बच्चे हैं.. उगर उनकी शादी हुई तो क्या आपने उस पर फिजूलखर्ची की या सादगी से? आपको लोगों के प्लॉट खरीदने पर सवाल उठाने का कोई नैतिक आधार नहीं है क्योंकि आपने चुनावी घोषणा पत्र में बताया है कि आपके पास तीन घर है. दो आपकी पत्नी के नाम पर हैं.

खुद खोजिये अपने सवालों के जवाब

आपने भारत में भ्रष्टाचार पर एक टिप्पणी की है कि “समझ में नहीं आता कि जिन नेताओं, नौकरशाहों, न्यायधीशों या किन्हीं और ने कथित तौर पर अकूत संपत्ति भ्रष्टाचार करके जोड़ रखी है, वे इसे भोगेंगे कब?” इस सवाल का जबाव देने के लिए आपसे योग्य व्यक्ति कोई नहीं हैं. पहले तो आपकी पार्टी बीजेपी देश की सबसे अमीर पार्टी है. आजकल इलेक्टोरल बांड के जरिए पैसा ले रही होगी. दूसरा, आप ये सवाल माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछ सकते है. उन्होंने कहा था कि वे उदयोगपत्तियों के साथ खड़ा होने से नहीं डरते. उन्हें जरूर पता होगा कि उद्योगपत्ति क्या करते है. तीसरा, आप राज्यसभा के सदस्य हैं, जिसके 90 फीसद सदस्य करोड़पत्ति हैं. आप अपने साथी सदस्यों से पूछ सकते हैं. चौथा, आप सत्ता में हो तो आप नौकरशाहों से बेझिझक ये सवाल पूछ सकते हैं.

आपने एक बेहद चौकाने वाला दावा किया है कि जो जितना अमीर है, उसको उतनी ही बीमारियाँ हैं. इस हिसाब से तो दुनिया में सबसे ज्यादा बीमारियाँ दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति अमेज़न संस्थापक जेफ बेजोस को होनी चाहिए. भारत में सबसे ज्यादा बीमारियाँ देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी को होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है. मुकेश अंबानी की सेहत के बारे में ज्यादा जानकारी आप उनके दोस्त नरेंद्र मोदी से ले सकते हैं.

आंकड़े भी कुछ और बताते है. जनरल ऑफ अमेरिकी मेडिकल एसोसिएशन के एक शोध में सामने आया कि अमीर, गरीबों के मुकाबले ज्यादा जीते हैं. शोध में सामने आया था कि संपन्न 1 फीसद अमीर महिलाएं सबसे गरीब 1 फीसद महिलाओँ से 10 साल ज्यादा जीती हैं. पुरुषों में ये फर्क 15 साल के करीब है.

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विजय गोयल जी, आपको जबाव देते वक्त मैं भाषा की मर्यादा नहीं तोड़ना चाहता. आप जैसे इज्जतदार इंसान को ऐसी बहकी-बहकी बातें नहीं करनी चाहिए. आप संभ्रांत व्यक्ति है. अकूत संपत्ति के मालिक. इसलिए आपको आम आदमी के पैसा कमाने पर सवाल नहीं उठाना चाहिए. अगर आप आम आदमी को ज्ञान बांटना चाहते है पहले आप कुछ करके दिखाए. करोड़ो की संपत्ति और 5 घरों का त्याग कीजिए. फिर आम आदमी आपकी बात मान सकता है.

एबीपी न्यूज से विदाई

क्या एबीपी न्यूज से विदाई पर यू-टर्न ले रहे हैं पुण्य प्रसून वाजपेयी?

पिछले दिनों एबीपी न्यूज से तीन बड़े नामों की विदाई पर जमकर विवाद हुआ था. इनमें से एक नाम जाने-माने एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी का था. मोदी सरकार की आलोचनात्मक खबर करने और सरकार से जुड़ी खबरों में प्रधानमंत्री मोदी का नाम और तस्वीर इस्तेमाल करने के कारण वाजपेयी की एबीपी न्यूज से विदाई हुई थी. प्रसंग के कुछ दिन बाद ‘द वॉयर’ पर लेख लिख कर वाजपेयी ने अपनी एबीपी न्यूज से विदाई के बारे में विस्तार रूप से बताया था.

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‘द वायर’ पर लिखे अपने लेख में वाजपेयी ने बताया था कि किस तरह बीजेपी सरकार ने उनके कार्यक्रम ‘मास्टर स्ट्रोक’ को सेंसर करने की कोशिश की और एबीपी न्यूज पर दबाव बनाया. उन्होंने यह खुलासा भी किया था कि कैसे 200 लोगों की मजबूत टीम चैनलों की निगरानी करती है और कैसे चैनलों के एडिटर्स को क्या चलाना है और क्या नहीं, इसके लिए निर्देश दिया जाता है.

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लेकिन अब दिल्ली में हुए पत्रकारों के एक सम्मेलन में अपनी विदाई से संबंधित जो बातें पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कही हैं, उनसे लगता है कि वह मामले पर यू-टर्न ले रहे हैं. सम्मेलन के दौरान उनकी भाषा मामले पर उनके बदलते रुख की ओर इशारा करती  है.

एबीपी न्यूज से विदाई

दरअसल, दिल्ली कॉन्स्टिट्यूशनल क्लब में पत्रकारों पर हुए हमलों के खिलाफ 22 और 23 सितंबर को राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था. दूसरे दिन 23 सितंबर को ‘सेंसरशिप और निगरानी’ मुद्दे पर पैनल में पुण्य प्रसून वाजपेयी भी शामिल थे. जब वाजपेयी ने इन सम्मेलन में अपनी बात रखी तो ऐसा लगा कि जैसे एबीपी न्यूज में हुई घटना कभी हुई ही नहीं. अपने भाषण की शुरुआत में वाजपेयी ने कहा, “इतनी निराशा नहीं है जितनी निराशा में आप लोग यहां बैठे हुए हैं. दूसरी, स्थिति ऐसी तो बिल्कुल नहीं है कि कोई आपको काम करने से रोक रहा है. हमें तो कोई नहीं रोक पाया.”

वाजपेयी ने इसके बाद यह भी कहा कि पिछली सरकारों में भी यही स्थिति थी. उन्होंने मनमोहन सरकार के दौरान जी न्यूज पर काम करते हुए पड़ने वाले दबाव के बारे में बताया और कहा कि इस सबके बावजूद वह पत्रकारिता करने से पीछे नहीं हटे. राडिया टेप कांड के बारे में वाजपेयी ने कहा कि इसको पूरे दिन किसी भी चैनल ने नहीं दिखाया लेकिन उन्होंने अपने कार्यक्रम में इसे चलाया और भ्रष्ट पत्रकारों का नाम तक लिया.

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एबीपी न्यूज से विदाई से पहले आजतक में काम करने वाले वाजपेयी ने इसके बाद कहा, “हम लोग बहुत निराशा में इसलिए हैं क्योंकि हमें शायद काम करने से रोका जाता है. हमें रोका-वोका नहीं जाता है, हम आपको बहुत साफ बता देते हैं. काम करने से बिल्कुल नहीं रोका जाता.” अपने ऊपर पड़ने वाले दबाव के बारे में वाजपेयी ने कहा, “कोई भ्रम ना पालिए. हमारे ऊपर ना जी में कोई दबाव था, ना आजतक में कोई दबाव था, ना एबीपी न्यूज में कोई दबाव था और ना ही सहारा और एबीपी न्यूज में काम करते वक्त दबाव था.”

अपने भाषण में वाजपेयी ने कहीं भी 200 सदस्यों की उस टीम के बारे में नहीं बताया जिसका जिक्र उन्होंने ‘द वायर’ के अपने लेख में किया था. सेंसरशिप और निगरानी पर अपनी अंतिम राय रखते हुए वाजपेयी ने कहा, ‘ये निगरानी और सेंसरशिप जो है, हमें लगता है महत्वहीन है. उसका तो काम है, रोजगार कैसे पैदा होगा अगर ये चीज नहीं चलेगी तो. ये एक पूरा प्रोसेस है कि आपको इस रूप में करना पड़ेगा.’ अंत में वाजपेयी ने कहा कि या तो हम अंधे बैठे हैं या हम किसी और प्रोफेशन में काम कर रहे हैं.

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वाजपेयी की यह भाषा उनके ‘द वायर’ के लेख से उलट जाती है जिसमें उन्होंने अपनी एबीपी न्यूज से विदाई के पीछे की घटनाओं के बारे में बताया था. लेख में उन्होंने बताया था कि किस तरह उनके कार्यक्रम ‘मास्टर स्ट्रोक’ को बंद कराने की कोशिश हुई थी और उन्हें अपने कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी का नाम और चित्र इस्तेमाल करने से मना किया गया था. अभी वाजपेयी की भाषा बदली-बदली सी नजर आ रही है. इस बदलाव के पीछे कारण क्या है, यह वाजपेयी ही जानते है.

सम्मेलन का वीडियो जिसमें आप अंत के 32 मिनट में पुण्य प्रसून वाजपेयी को सुन सकते हैं.

Day 2, Session 4Surveillance And CensorshipChair: Hartosh BalSpeakers: Om Thanvi, Punya Prashoon Vajpayi, Josy Joshep, Vishwadeepak, Manoj Singh, Seema Azaad and Shivendra Singh.

Posted by MediaVigil on Sunday, September 23, 2018

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नेशनल हेराल्ड

आसान शब्दों में समझिए क्या है नेशनल हेराल्ड मामला, जिसमें फंसे हैं राहुल और सोनिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी की इनकम टैक्स असेसमेंट से जुड़ी याचिका को ठुकरा दिया है. इसके बाद नेशनल हेराल्ड मामला फिर से चर्चा में आ गया है. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि राहुल गांधी की ओर से फाइनैंशियल ईयर 2011-12 में की गई इनकम टैक्स की घोषणा के मामले की फिर से जांच की जा रहा है. आईटी डिपार्टमेेंट के मुताबिक, राहुल ने इसमें तथ्यों को छुपाया था. राहुल और सोनिया सहित कांग्रेस नेता आस्कर फर्नांडीज ने हाईकोर्ट में आईटी डिपार्टमेंट को चुनौती थी.

आइये समझते हैं यह नेशनल हेराल्ड मामला

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला जवाहर लाल नेहरू द्वारा 1938 में शुरू किए गए अखबार नेशनल हेराल्ड से जुड़ा है. कांग्रेस के मुखपत्र माने जाने वाले इस अखबार का मालिकाना हक एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) के पास था. एजेएल नेशनल हेराल्ड के अलावा हिंदी में नवजीवन और उर्दू में कौमी आवाज अखबार छापती थी.

नेशनल हेराल्ड

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1956 में एजेएल को गैर व्यावसायिक कंपनी के रूप में स्थापित किया गया और इसे कंपनी एक्ट की धारा 25 के तहत टैक्स फ्री भी कर दिया गया. साल 2008 आते-आते एजेएल पर 90 करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ गया और इसके सभी प्रकाशनों को सस्पेंड कर दिया गया.

कांग्रेस ने बनाई नई कंपनी

इसके बाद कांग्रेस ने यंग प्राइवेट लिमिटेड नामक एक नई गैर व्यावसायिक कंपनी बनाई, जिसमें सोनिया और राहुल समेत मोतीलाल वोरा, सुमन दुबे, ऑस्कर फर्नांडिस और सैम पित्रोदा को डायरेक्टर बनाया गया. इस कंपनी के 76 फीसदी शेयर सोनिया और राहुल के पास और बाकी 24 फीसदी शेयर दूसरे डायरेक्टर्स के पास थे. कांग्रेस ने इस कंपनी को 90 करोड़ रुपये का ऋण दिया. बाद में इस कंपनी ने 90 करोड़ के कर्ज वाली एजेएल का अधिग्रहण कर लिया.

नेशनल हेराल्ड

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भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 2012 में याचिका दायर इस मामले में कांग्रेस नेताओं पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया. उन्होंने याचिका में कहा कि ‘यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड’ ने सिर्फ़ 50 लाख रुपयों में 90.25 करोड़ रुपए वसूलने का उपाय निकाला जो नियमों के ख़िलाफ़ है. याचिका में आरोप है कि 50 लाख रुपए में नई कंपनी बना कर ‘एजेएल’ की 2000 करोड़ रुपए की संपत्ति को अपना बनाने की चाल चली गई.

निचली अदालत ने दिया पेश होने का समन

इसके बाद दिल्ली की एक अदालत ने इस मामले में चार गवाहों के बयान दर्ज किए और 26 जून 2014 को सोनिया और राहुल गांधी सहित सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, ऑस्कर फर्नांडिस और मोतीलाल वोरा को पेश होने का समन भेज दिया. अदालत ने इन सभी को 7 अगस्त, 2014 को अपने सामने पेश होने का निर्देश दिया.

इसके बाद कांग्रेस नेताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका लगाई, जिस पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत से जारी किए समन पर रोक लगा दी. कांग्रेस नेताओं ने अदालत में दलील दी कि ‘यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की संस्था को ‘सामजिक और दान करम’ के कार्यों के लिए बनाया गया है. नेताओं की यह भी दलील थी कि ‘एजेएल’ के शेयर स्थानांतरित करने में किसी ‘ग़ैर क़ानूनी’ प्रक्रिया को ‘अंजाम नहीं दिया गया’ बल्कि यह शेयर स्थानांतरित करने की ‘सिर्फ एक वित्तीय प्रक्रिया’ थी.

दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की स्टे की याचिका

दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेस के नेताओं की ओर से दायर स्टे की याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा कि एक सबसे पुराने राष्ट्रीय दल की साख दांव पर लगी है क्योंकि पार्टी के नेताओं के पास ही नई कंपनी के शेयर हैं. हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के लिए यह ज़रूरी कि वो मामले की बारीकी से सुनवाई करे ताकि पता चल पाये कि ‘एजेएल’ को ऋण किन सूरतों में दिया गया और फिर वो नई कंपनी ‘यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड’ को कैसे ट्रांसफ़र किया गया.

‘Urban Naxal’ वाले विवेक अग्निहोत्री का ट्विटर अकाउंट ब्लॉक, अभिनेत्री स्वरा भास्कर के लिए किया था आपत्तिजनक ट्वीट

लोगों के बीच संवाद बढ़ाने और उन्हें जोड़ने के लिए शुरु हुआ सोशल मीडिया इसके उलट ही काम करते हुए नजर आ रहा है. आए दिन सोशल मीडिया पर प्रसिद्ध लोगों को खुलेआम जान से मारने और बलात्कार करने की धमकियां दी जाती हैं. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज का आपस में भिड़ना आम होता जा रहा है. ऐसी ही एक तकरार बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर और फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री के बीच देखने को मिली. इस तकरार में विवेक ने स्वरा को लेकर एक आपत्तिजनक ट्वीट भी किया, जिसके बाद ट्विटर ने विवेक अग्निहोत्री का ट्विटर अकाउंट ब्लॉक कर दिया है.

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विवेक अग्निहोत्री का ट्विटर अकाउंट ब्लॉक

दरअसल, ये सारा विवाद केरल के विधायक पी.सी. जॉर्ज के एक नन के खिलाफ आपत्तिजनक बयान के लेकर शुरु हुआ. केरल की नन ने जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर उनके साथ 13 बार बलात्कार करने का आरोप लगाया था. इस पर निर्दलीय विधायक पी.सी. जॉर्ज ने आपत्तिजनक बयान देते हुए कहा था, ‘इसमें किसी को कोई शक नहीं है कि ये नन वेश्या है. 12 बार इसने मजे लिए और 13वीं बार यह बलात्कार हो गया? जब उससे पहली बार रेप हुआ तो उसने पहली ही बार शिकायत क्यों नहीं की?’

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जॉर्ज के इस बयान पर आपत्ति जताते हुए स्वरा भास्कर ने ट्वीट करते हुए लिखा था, ‘बेहद शर्मनाक एवं घृणित. भारत के हर धर्म और राजनीती में उपस्थित कीचड़. एकदम बकवास.’

इसके बाद स्वरा ने अन्य अभिनेत्री श्रुति सेठ का एक ट्वीट लाइक भी किया जिसमें लिखा था, ‘अगर कोई भी महिला नन, गर्लफ्रेंड और पत्नी को उसकी मर्जी के खिलाफ सेक्स करने पर मजबूर किया जाता है, तो वह रेप माना जाता है. भले ही उससे पहले उसने इसमें कितनी बार भी ‘आनंद’ लिया हो. किसी की मर्जी के खिलाफ सेक्स रेप कहलाता है.’

स्वरा के इस ट्वीट पर जवाब देते हुए विवेक अग्निहोत्री ने इसकी तुलना #MeToo कैंपेन से करते हुए लिखा, ‘तख्ती कहां हैं #मीटूप्रॉस्टिट्यूटनन।’ बाद में विवाद बढ़ने पर विवेक ने इस ट्वीट को डिलीट कर दिया. लेकिन तब तक उसके ट्वीट का स्क्रीनशॉट वायरल हो चुका था. विवेक के इस विवादित ट्वीट को आप नीचे देख सकते हैं.

विवेक अग्निहोत्री का ट्विटर अकाउंट ब्लॉक

इसी बात को लेकर स्वरा और विवेक में ट्विटर पर ही तकरार हो गई और स्वरा ने विवेक के आपत्तिजनक ट्वीट की शिकायत ट्विटर से कर दी. शिकायत के बाद ट्विटर ने कार्रवाई करते हुए विवेक अग्निहोत्री का ट्विटर अकाउंट ब्लॉक कर दिया. ट्विटर ने अपने बयान में कहा, ‘हमने उस अकाउंट का आंकलन किया जिसकी आपने शिकायत की थी. हमने इसे ट्विटर नियमों के खिलाफ पाया और उस अकाउंट को ब्लॉक कर दिया गया है.’

ट्विटर की इस कार्रवाई के लिए स्वरा ने ट्विटर को धन्यवाद भी कहा.

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मोमो चैलेंज के खतरों से निपटने के लिए बच्चों के माता-पिता को जागरूक करेगा ICSE

सोशल मीडिया खासकर WhatsApp पर तेजी से वायरल हुए खतरनाक गेम मोमो चैलेंज (MoMo) के बारे में आपने सुना ही होगा. इस गेम में पहले यूजर्स को गेम खेलने का चैलेंज दिया जाता है और इसके बाद धीरे-धीरे उसे अपने जाल में फंसा कर ब्लैकमेलिंग के जरिए गलत कार्य कराए जाते हैं. इस गेम के जरिए फिरौती मांगने और कहीं-कहीं पर आत्महत्या की खबरें भी आई थीं.

मोमो चैलेंज

‘ब्लू व्हेल’ गेम की तरह ही खतरनाक इस गेम को गंभीरता से लेते हुए पश्चिम बंगाल के ‘एसोसिएशन ऑफ हेड्स ऑफ आईसीएसई स्कूल’ ने सभी छात्रों के माता-पिता से आग्रह किया है कि वह अपने बच्चों पर नजर रखें और सावधान रहें. संगठन की पश्चिम बंगाल यूनिट के महासचिव नबरून डे ने कहा कि अभी तक तो उन्हें ऐसी कोई खबर नहीं मिली है कि किसी भी स्कूल के छात्र को मोमो चैलेंज का संदेश मिला हो. संगठन को सीआईडी और पुलिस की ओर से भी इस संबंध में कोई सलाह नहीं दी गई है.

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लेकिन इन ऑनलाइन गेम्स के खतरे को देखते हुए संगठन ने अपने सदस्य स्कूलों से कहा है कि वह मोमो और ब्लू व्हेल जैसे ऑनलाइन गेम्स के खतरों से आगाह करने के लिए बच्चों और उनके अभिभावकों के बीच जागरूकता अभियान चलाएं. डे ने कहा, ‘हम अपनी ओर से इस संबंध में पहल कर रहे हैं. इसका लक्ष्य बच्चों और उनके माता-पिता को इस तरह के ऑनलाइन गेम के खतरों से परिचित कराना है.’

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जब उनसे मोमो चैलेंज के लिए जागरूकता अभियान के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘हमने स्कूलों से प्रार्थना के दौरान छात्रों को रोजाना इसके बारे में बताने को कहा है ताकि वह इस तरह के गेम्स से खुद को अलग रख सकें.’

मोमो चैलेंज क्या है और यह कितना खतरनाक है, यह जानने के लिए आप हमारी यह पुरानी खबर पढ़ सकते हैं.

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नोटबंदी

नोटबंदी का कुल जमा- 11 हजार करोड़ का नुकसान, 100 से अधिक मौतें और बाबाजी का ठुल्लू…

नोटबंदी तो आपको याद ही होगी. कोई भूल भी कैसा सकता है, वो लंबी-लंबी लाइनें, पैसे की किल्लत और देशभर में ऊथल-पुथल. प्रधानमंत्री मोदी ने 8 नवंबर 2016 को देशभर में 500 और 1000 रूपए के नोट बंद करने का ऐलान किया था. अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री ने इसका प्रमुख लक्ष्य कालेधन को खत्म करना बताया था. साथ ही नक्सलियों और कश्मीर के आतंकियों की कमर तोड़ना भी नोटबंदी का एक अहम लक्ष्य था.

नोटबंदी

नोटबंदी के समय घबरा कर रोता बुजुर्ग

नोटबंदी कितना सफल रहा और कितना असफल, इस पर खूब बहस होती रहती है और अब भारतीय रिजर्व बैंक ने नोटबंदी को लेकर अपने कुछ आंकड़ें जारी किए हैं. इन आंकड़ों के सामने आने के बाद नोटबंदी की सफलता और सरकार द्वारा इसके निर्धारित लक्ष्यों पर सवाल उठ रहे हैं.

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रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, नोटबंदी के दौरान कुल 15.41 करोड़ रूपए के 500 और 1000 के नोट बंद हुए थे. उस समय अनुमान लगाया गया था कि करीब 3 लाख करोड़ रूपए कालाधन होने के कारण बैंक में नहीं लौटेंगे और देश को 3 लाख करोड़ रूपए का फायदा होगा. लेकिन अब रिजर्व बैंक के जारी आंकड़ें बताते हैं कि जैसा सरकार को उम्मीद थी, वैसा कुछ हुआ ही नहीं. बंद हुए 15.41 करो़ड़ रूपए में से कुल 15.32 करोड़ रूपए वापस बैंकों में आ गए. यानि केवल 10740 करोड़ रूपए ऐसे थे जो बैंक में वापस नहीं लौटे.

नोटबंदी

वहीं, नोटबंदी का कुल खर्च 21 हजार करोड़ रूपए था. यानि सरकार और प्रधानमंत्री के वादों के उलट नोटबंदी से देश को फायदा होने की बजाय उल्टा नुकसान हुआ. बात अगर नक्सली हिंसा और कश्मीर में आतंकी गतिविधियों की करें तो इन पर कोई असर नहीं आया. बल्कि कश्मीर में तो हालात और बिगड़े ही हैं.

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आंकड़ें दर्शाते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने बिना किसी पुख्ता तैयारी, रिसर्च और जानकारी के नोटबंदी की थी जिससे ना केवल देश को आर्थिक नुकसान हुआ, बल्कि 100 से ज्यादा लोगों को जान भी गंवानी पड़ी. नोटबंदी के समय प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश के लिए लोग कुछ दिन की तकलीफ सह लें. अगर कुछ बदलाव नहीं होता तो 50 दिन के बाद देश जिस चौराहे पर कहेगा, वह उस चौराहे पर खड़े होकर कोई भी सजा मंजूर करेंगे. सजा तो नहीं, लेकिन क्या ये आंकड़ें आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी देश से माफी मांगेगे?

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केरल में बाढ़

Opinion : केरल में बाढ़, मोदी सरकार की मदद और उसका झूठा गुणगान करता मीडिया

केरल पिछले 100 वर्षों में सबसे भीषण बाढ़ से प्रभावित है. राज्य आपदा प्रबंधन के मुताबिक,  केरल में बाढ़ से अब तक 357 लोग मारे जा चुके हैं. 3.14 लाख लोगों को राहत कैंपों में रखा गया है, लेकिन मोदी सरकार ने राज्य को कोई बड़ी आर्थिक मदद नहीं दी, न ही आपदा प्रबंधन के कार्यों के लिए बड़े कदम उठाए.

केरल में बाढ़

मीडिया कर रहा गुणगान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाढ़ग्रस्त केरल का दौरा किया. राज्य के मुख्यमंत्री पिन्नाराई विजयन ने मोदी को 19512 करोड़ रुपये का नुकसान होने की जानकारी दी. पीएम मोदी ने इस बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा नहीं घोषित किया है, ना ही मोदी ने बाढ़ पीढ़ितों की मदद के लिए अपना खजाना पूरी तरह से खोला. उन्होंने पहले जारी किए गए 100 करोड़ रुपये के अलावा अतिरिक्त 500 करोड़ रुपये जारी करने की घोषणा की है. क्या 19512 करोड़ रुपये की भरपाई 600 करोड़ के साथ हो सकती है? सबसे बेशर्मी की बात हैं कि हिंदी समाचार चैनल न्यूज24 मामले पर मोदी सरकार का चीयरलीडर हो गया है. चैनल ने 500 करोड़ की मदद को मोदी का बड़ा दिल बताया है. संपादक महोदय से सवाल है कि 19 हजार करोड़ के नुकसान के लिए 500 करोड़ रुपया देना कैसे बड़ा दिल हो गया?

जिस देश ने प्रधानमंत्री के प्रचार पर 4800 करोड़ रुपये खर्च कर दिए हो, उनकी विदेश यात्राओं पर 1484 करोड़ खर्च किए हो, वहीं शिवाजी के बुत पर 3600 करोड़, पटेल के बुत पर 3000 करोड़, कुंभ मेले पर 5000 करोड़ खर्च करने की तैयारी हो, क्या उस देश के प्रधानमंत्री को इस भीषण आपदा के मौके पर ज्यादा राशि नहीं जारी करनी चाहिए थी?

इन तरीक़ों से आप कर सकते हैं बारिश और बाढ़ से तबाह हो रहे केरल की मदद

मोदी सरकार केरल में बाढ़ के बाद राहत कार्यों में भी बेरुखी दिखा रही है. केरल के एक विधायक साजी चेरीयन टीवी पर राहत कार्यों के लेकर रो पड़े थे. उन्होंने कहा, “ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हमें हेलीकॉप्टर देने को कहो. नहीं तो हमारे 50 हजार लोग मर जाएगें. हम पिछले चार दिन से नेवी की मांग कर रहे हैं. अभी तक कोई मदद नहीं मिली. एयरलिफिटिंग एकमात्र हल है.”

इंडियन एक्सप्रेस ने अपुष्ट खबर के आधार पर नेवी द्वारा विधायक के क्षेत्र में 10 बोट भेजे हैं, लेकिन मांग के मुताबिक हेलीकॉप्टर भेजने की कोई खबर इंटरनेट पर नहीं मिली. सवाल ये भी उठता हैं कि 50 हजार लोगों की जानें जब खतरे में थी, तो नेवी ने बोटस देने में इतनी देरी क्यों की? ये इस बात को भी दिखाता हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में 50 हजार जानों की कीमत कितनी कम आंकी गई है?

अटल बिहारी वाजपेयी के बचपन की फोटो के नाम पर शेयर हो रही है चार्ली चैपलिन की फोटो

अपने विधानसभा क्षेत्र में राहत कार्यों के लिए बोटस हासिल करने के लिए एक विधायक को टीवी पर रोना पड़ा, इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारे देश का सिस्टम इतना कमजोर है. ये भारत है, जिसके दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का हम दम भरते हैं, लेकिन केरल के लोगों की जानों की किसी को परवाह नहीं है. मीडिया चीयरलीडर बनने में इतना मस्त है कि उसे पब्लिक इंट्रेस्ट की जगह नेता के इंट्रेस्ट का ज्यादा ध्यान है.

(लेखक मीडिया छात्र हैं. यह आर्टिकल लेखक के निजी विचार हैं.)

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भयंकर बहस है इस बात पर कि किसी के मरने के बाद क्या लिखा जाना चाहिए. एक तबक़ा है जिसका मानना है कि ज़हर लिख दो और दूसरा तबक़ा है जिसे लगता है कि सब अच्छा अच्छा लिखा जाना चाहिए, वहीं एक बीच वाला तबक़ा है जिसे लगता है कि अच्छा ना लिखें ना सही, लेकिन किसी के मरने के बाद बुरा तो नहीं ही लिखना चाहिए.

अटल बिहारी वाजपेयी के निधन

मेरे ज्ञान पर आधारित किसी बात पर किसी को भरोसा नहीं होगा और होना भी क्यूँ चाहिए इसलिए हम महान लोगों को कोट करेंगे. भारत में अभी की हिंदी पत्रकारिता रवीश कुमार और पुन्य प्रसून तक सीमित हैं. दोनों ही जीवित है और अभी के माहौल में उनको कोट करना ठीक भी नहीं है. ऊपर से जो लिखना है उसपर हिंदी में किसी ने तसल्लीबख्श तरीक़े से अपनी राय नहीं रखी है. और तो और द वायर के एक वीडियो में विनोद दुआ जिनको कोट कर रहे थे वो भी हिंदी जगत से नहीं हैं. ये लिखने के बाद लगा है कि इस माहौल में तो द वायर को भी कोट नहीं किया जाना चाहिए था.

ख़ैर, तो दुआ जिनको कोट करे रहे थे उनका नाम ख़ुशवंत सिंह है. हमको लगता है कि उनसे लंबा जर्नलिज़्म शायद कुलदीप नैयर ही कर पाएँगे, अगर 3-4 साल और जी गए तो. नैयर भी अंग्रेज़ी में ही पत्रकारिता करते आए हैं. इससे ये भी साफ़ है कि अच्छी (कोट करने लायक) पत्रकारिता अंग्रेज़ी में ही सँभव है.

एक बार फिर से ख़ैर, तो दुआ ने ख़ुशवंत सिंह को कोट करते हुए कहा कि ख़ुशवंत सिंह का कहना था कि किसी के मरने के बाद जो शोक संदेश हम लिख/लिखवा रहे होते हैं वो आख़िरी दस्तावेज़ होता है. ख़ुशवंत सिंह ने ये भी कहा था कि किसी के मरने के बाद भारत में जिस हद तक उसके बारे में अच्छा-अच्छा झूठ बोला जाता है वैसा दुनिया में कहीं नहीं बोला जाता. इसकी वजह से उनका मानना था कि किसी की मौत का आख़िरी दस्तावेज़ ना तो पूरी तरह से अच्छा और ना ही पूरी तरह से बुरा हो सकता है. सिंह का तो यहाँ तक मानना था कि अगर किसी ने ऐसा काम किया है कि उसकी मौत के बाद उसका “मज़ाक़” बनाया जा सके तो बनाया जाना चाहिए.

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ख़ुशवंत सिंह के बाद एक और दिग्गज एडिटर विनोद मेहता का देहांत हुआ. उनकी मौत के बाद उनको आख़िरी एडिटर तक कहा गया. उनकी दो किताबों लखनऊ वॉय और एडिटर अनप्लग्ड में उन्होंने कई जगह पर सिंह को कोट किया है और उनके हवाले से बातें कही हैं. यही नहीं, उन्होंने ख़ुद को ख़ुशवंत सिंह ‘स्कूल ऑफ़ थॉट’ का बताया है. स्कूल ऑफ़ थॉट का मतलब किसी ख़ास व्यक्ति या कई खास व्यक्तियों के विचार या विचारों के संग्रह से है. सिंह का हवाला देते हुए उन्होंने कहा है कि भारत में किसी की मौत के बाद उसे देवता बना दिया जाता है. अगर ऐसा नहीं भी किया जाए तो कोई बहुत नुक़सान नहीं है.

तो ख़ुशवंत शोक संदेश के बार में जो राय रखते थे उसका हवाला विनोद मेहता से लेकर विनोद दुआ तक ने दिया है. द वायर वाली वीडियो में उन्होंने पहले वाजपेयी के राजनीतिक जीवन की वो बातें बताई हैं जिन्हें लेकर लोगों को उनसे शिकायतें या कहें कि गंभीर शियाकतें रही हैं. वहीं, उसके बाद उन्होंने वो बातें भी बताई है जिनकी वजह से उन्हें राजनेता माना जाता है. उनके अलावा गुहा जैसे इतिहासकार से लेकर मोदी पर किताब लिखने वाले निलंजन मुखोपाध्याय तक ने उनके बारे ना तो सब अच्छा लिखा है और ना ही सब बुरा. कोई भी पूरी तरह से अच्छा या पूरी तरह से बुरा कैसे हो सकता? चाहे वो ज़िंदा हो या मर गया हो?

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एक बार फिर से विनोद दुआ के हवाले से जिन्होंने ख़ुशवंत सिंह का हवाला दिया है- अगर हम किसी का आख़िरी दस्तावेज़ लिख रहें हैं, उसके लिए शोक संदेश लिख रहे हैं तो अच्छाई सा बुराई की ऐसी भी अति मत करें मरे हुए आदमी को सफ़ाई देने के लिए फिर से पैदा होना पड़े.

(लेखक नामी मीडिया हाउस से जुड़े हैं और करंट अफेयर्स पर पैनी निगाह रखते हैं)

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