भारतीय मीडिया

कैसे भारतीय मीडिया का 300 आतंकियों को मारे जाने का दावा ग़लत है?

भारत ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक की. इसमें भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों पर बम गिराए. भारत की तरफ से इसे असैन्य कार्रवाई कहा गया. एयर स्ट्राइक के बाद भारत सरकार की तरफ से विदेश सचिव विजय गोखले ने कहा कि भारत ने बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग कैंपों को निशाना बनाया था.

भारतीय मीडिया

उन्होंने भारत की इस कार्रवाई को असैन्य कार्रवाई (Non-Military Pre-Emptive action) बताते हुए कहा कि इसमें केवल आतंकियों को निशाना बनाया गया था. इसका मतलब यह हुआ कि भारत ने अपने ऊपर संभावित खतरे को टालने के लिए असैन्य कार्रवाई की है. उन्होंने इसमें हुए नुकसान या यह किस जगह पर की गई, इस बारे में जानकारी नहीं दी. यानी सरकार की तरफ से इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है कि इस हमले में कितने आतंकी मारे गए हैं.

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एयर स्ट्राइक की खबर आने के बाद भारतीय मीडिया ने इससे जुड़ी खबरें और वीडियो दिखाने शुरू कर दिए. कई चैनलों ने वायुसेना की इस कार्रवाई में 200-300 आतंकियों के खात्मे की बात की तो कई 300-400 आतंकियों के मारे जाने की बात कर रहे थे. सब अपने-अपने सूत्रों के हवाले से खबर चला रहे थे. टीवी चैनल के अलावा कई न्यूज पोर्टल ने ऐसी खबरें चलाई। यह सब बिना आधिकारिक जानकारी के चल रहा था. किसी ने भी यह दावा नहीं किया कि उनकी खबर सच है.

युद्ध की जुबान बोल रहा भारतीय मीडिया

मीडिया का काम हमेशा से अपने पाठकों और दर्शकों तक सही जानकारी पहुंचाने का रहा है. युद्ध, युद्ध जैसी स्थिति, दो देशों के बीच तनाव आदि की स्थिति में यह जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है. ऐसी स्थिति में मीडिया को संयम बरतते हुए आधिकारिक जानकारी को ही लोगों तक पहुंचाना चाहिए, लेकिन भारतीय मीडिया आजकल संयम को दूर रखकर युद्ध की जुबान बोल रहा है.

कैसे भारतीय मीडिया द्वारा किया जा रहा 300 आतंकियों के मरने का दावा झूठ है?

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान को अपनी कार्रवाई में संभलने का भी मौका नहीं दिया और उनकी जमीन पर बम डालकर सकुशल वापस लौट आई. भारतीय वायुसेना के मिराज विमानों ने इतनी तेजी से इस काम को अंजाम दिया कि पाकिस्तान को सोचने तक का भी समय नहीं मिला. यह बात भी सब जानते हैं कि ऐसी कार्रवाई में हुए नुकसान का आकलन नहीं किया जाता. दूसरे देश में जाकर नुकसान का पता लगाना मुमकिन नहीं होता है और पाकिस्तान कभी इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि उसके यहां नुकसान हुआ है.

अब डिजिटल न्यूज मीडिया पर भी संकट के बादल, बजफीड और हफपोस्ट करेंगी कर्मचारियो की छंटनी

ऐसी स्थिति में भारतीय मीडिया को क्या करना चाहिए? क्या मीडिया को भावना में बहकर गलत तथ्य लोगों के सामने रखने चाहिए या मीडिया को आधिकारिक बयान का इंतजार कर लोगों तक सही बात पहुंचानी चाहिए? अफसोस अधिकतर मीडिया ने TRP के लिए गलत तथ्य लोगों के सामने पेश किए.

भारतीय मीडिया से उलट है पश्चिमी मीडिया के दावे

हालांकि कई मीडिया हाउस ऐसे भी थे, जिन्होंने सरकार के आधिकारिक बयान का इंतजार किया. भारत के द हिंदू जैसे अख़बारों और पश्चिमी जगत के न्यूयॉर्क टाइम्स और द गार्डियन ने भी आतंकियों की मौत से जुड़ा कोई आंकड़ा नहीं दिया. बीबीसी ने भी स्थानीय लोगों से बातचीत की थी. इन लोगों ने भी उतने आतंकियों के मरने का दावा नहीं किया, जितना अधिकतर भारतीय मीडिया कर रहा है. इस घटना की ना तो कोई तस्वीर है, न वीडियो, न सरकार ने कुछ बोला है और न ही किसी मीडिया मे किसी पुख़्ता सूत्र का हवाला दिया है.

एयर स्ट्राइक के बाद भारत सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी. इस बैठक में वायुसेना की कार्रवाई का ब्यौरा दिया गया था. इस बैठक में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुला शामिल थे. उन्होंने कहा कि इस बैठक में TMC के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने आतंकियों के मरने से जुड़ा सवाल पूछा था. इसके जवाब में बताया गया कि सरकार के पास इस बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं है. उमर अब्दुला ने इसके बाद कहा कि जो लोग सूत्रों के हवाले से 300 से ज्यादा आतंकियों के मरने की खबर लिख रहे हैं, उसमें कोई तथ्य नहीं है. देखिये, उनका ट्वीट-

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी ऐसी ही कुछ बात कही. उन्होंने कहा कि मीडिया में बिना पुख्ता जानकारी या सबूत के 300 आतंकियों के मारे जाने की खबरें चल रही हैं. पाकिस्तानी चैनल जीरो नुकसान की बात कर रह हैं. टीवी पर वॉर गेम खेला जा रहा है. TRP के लिए गंभीर मुद्दे को खींचा जा रहा है. देखिये यह ट्वीट-

मीडिया के लिए सवाल

भारतीय वायुसेना और सरकार ने अपना काम कर दिया था. पाकिस्तान को पता चलने से पहले उनकी धरती पर बम फेंक दिए गए थे. 1971 के बाद पहली बार नियंत्रण रेखा से पार जाकर भारतीय वायुसेना के विमान अपने मिशन को अंजाम देकर सकुशल वापस लौट आए थे. मीडिया को ऐसी स्थिति में लोगों को सच बताना चाहिए, लेकिन मीडिया ने फैक्ट चेक किए बिना 300 आतंकियों के मरने की खबरें चला दी. ऐसी स्थिति में जब दोनों देश के बीच तनाव चरम सीमा पर है, मीडिया का ऐसा रवैया लोगों के बीच युद्ध का माहौल बना रहा है.

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सरकार भी खुद मान रही है कि युद्ध किसी स्थिति का समाधान नहीं है. यह सच भी है कि युद्ध किसी भी स्थिति में समाधान नहीं है. मीडिया को ऐसे समय में फैक्ट चेक पर जोर देना चाहिए. मीडिया को संयम रखकर तथ्यों को सामने रखना चाहिए ताकि लोगों तक सही सूचना पहुंचे. दो देशों के बीच यह तनाव को मीडिया को TRP के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

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बरखा दत्त

बरखा दत्त को ट्रोल ने भेजी प्राइवेट पार्ट की तस्वीर, दिल्ली पुलिस में दर्ज कराई शिकायत

सोशल मीडिया पर पत्रकारों, कलाकारों या बुद्धिजीवियों को अकसर ट्रोल किया जाता है. इसके लिए बकायदा पूरे एजेंडे और प्लानिंग के साथ इन लोगों को अपनी राय रखने के लिए निशाना बनाया जाता है. पिछले कुछ समय से हम लगातार ऐसी घटनाएं देख रहे हैं जब लोगों को अपनी बात कहने के लिए निशाना बनाया जा रहा है. पुलवामा हमले के बाद अब एक बार फिर ऐसा हो रहा है. पत्रकारों को गालियां दी जा रही हैं, उन्हें अश्लील तस्वीरें भेजी जा रही है और जान से मारने की धमकी दी जा रही है. ऐसा ही बरखा दत्त के साथ हो रहा है.

बरखा दत्त

वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त को भी सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है. उन्हें गालियां और धमकियां दी जा रही हैं. इतना ही नहीं, उन्हें अश्लील फोटो भी भेजे जा रहे हैं. बरखा ने इसकी शिकायत ट्विटर और दिल्ली पुलिस से की है. उन्होंने कुछ ऐसे नंबर सार्वजनिक किए हैं, जिनसे उन्हें गालियां दी जा रही थी. आप उनके ये ट्वीट नीचे देख सकते हैं.

दिल्ली पुलिस ने बरखा की शिकायत पर कार्रवाई का आश्वासन दिया है.

यह पहला मौका नहीं है जब पत्रकारों को इस तरह निशाना बनाया जा रहा है. इससे पहले भी कई बार राजनैतिक पार्टियों की आईटी सेल पत्रकारों और दूसरे लोगों को निशाना बनाने के लिए इस तरह के काम करती रही है. इनका मकसद लोगों का ध्यान असली समस्या से ध्यान हटाकर दूसरी बातों की तरफ मोड़ना है.

ट्रोल्स के निशाने पर पत्रकार अभिसार शर्मा, दी जा रही हत्या की धमकियां

हम आपसे अपील करते हैं कि सोशल मीडिया जैसे कम्यूनिकेशन के सशक्त मंच को गालियों का अड्डा मत बनने दीजिए. एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल किजिए और शालीनता से अपनी बात रखें. विचारों में भिन्नता ही लोकतंत्र की खूबसूरती है. विचारों का मुकाबला विचारों की किजिए, गालियों से नहीं.

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अभिसार

ट्रोल्स के निशाने पर पत्रकार अभिसार शर्मा, दी जा रही हत्या की धमकियां

सोशल मीडिया पर पत्रकारों, कलाकारों या बुद्धिजीवियों को अकसर ट्रोल किया जाता है. इसके लिए बकायदा पूरे एजेंडे और प्लानिंग के साथ इन लोगों को अपनी राय रखने के लिए निशाना बनाया जाता है. पिछले कुछ समय से हम लगातार ऐसी घटनाएं देख रहे हैं जब लोगों को अपनी बात कहने के लिए निशाना बनाया जा रहा है. पुलवामा हमले के बाद अब एक बार फिर ऐसा हो रहा है. पत्रकारों को गालियां दी जा रही हैं, उन्हें जान से मारने की धमकी दी जा रही है.

अभिसार

हम अपनी खबरों में कुछ ऐसे ही मामले आपके सामने रखेंगे. सबसे पहले बात करते हैं अभिसार शर्मा की. वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा लगातार ट्रोल्स के निशाने पर रहते हैं. सरकार की कड़ी आलोचना और सवाल करने के कारण अभिसार अकसर ट्रोल किए जाते हैं. अब एक बार फिर उन्हें मां-बहन की गालियां दी जा रही हैं. अभिसार ने ट्वीट पर ऐसे कुछ मैसेज पोस्ट किए हैं जिनमें उन्हें गालियां दी गई है. अभिसार के ये पोस्ट आप नीचे देख सकते हैं.

अभिसार के साथ-साथ बरखा दत्त, रविश कुमार, प्रशांत भूषण आदि लोगों के नंबर सार्वजनिक किए गए हैं, जिसके बाद इन लोगों के पास लगातार फोन कॉल्स आ रहे हैं. अभिसार ने ये फोन करने और धमकी देने वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है.

यह पहला मौका नहीं है जब पत्रकारों को इस तरह निशाना बनाया जा रहा है. इससे पहले भी कई बार राजनैतिक पार्टियों की आईटी सेल पत्रकारों और दूसरे लोगों को निशाना बनाने के लिए इस तरह के काम करती रही है. इनका मकसद लोगों का ध्यान असली समस्या से ध्यान हटाकर दूसरी बातों की तरफ मोड़ना है.

FACT CHECK: पुलवामा हमले के बाद की बताकर शेयर की जा रही इस फोटो की सच्चाई क्या है?

हम आपसे अपील करते हैं कि सोशल मीडिया जैसे कम्यूनिकेशन के सशक्त मंच को गालियों का अड्डा मत बनने दीजिए. एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल किजिए और शालीनता से अपनी बात रखें. विचारों में भिन्नता ही लोकतंत्र की खूबसूरती है. विचारों का मुकाबला विचारों की किजिए, गालियों से नहीं.

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फेक न्यूज के फेर में फंसा इंडिया टीवी, शो में दिखाई पीएम मोदी की फर्जी तस्वीर

फेक न्यूज के फेर में सिर्फ आम लोग ही नहीं बल्कि मेनस्ट्रीम मीडिया भी आ जाता है. हमने इसके पहले भी कई उदाहरण देखे हैं और आगे भी देखते रहेंगे. जी न्यूज के सुधीर चौधरी और आजतक की श्वेता सिंह ने दो हजार रुपये के नोट में नैनो जीपीएस चिप बताई थी, तो आजतक की अंजना ओम कश्यप ने फेक ट्वीट के आधार पर अपना पूरा शो किया था. ये कुछेक उदाहरण हैं जो मीडिया में फैक्ट चेकिंग की कमी को दिखाते हैं. इस कड़ी में ताजा मामला इंडिया टीवी का है.

इंडिया टीवी

फेक न्यूज की पोल खोलने वाली Altnews के मुताबिक, इंडिया टीवी ने प्रधानमंत्री मोदी पर दिखाए अपने कार्यक्रम में पीएम मोदी की फेक तस्वीर इस्तेमाल की थी. इंडिया टीवी ने अपने कार्यक्रम में वह फोटो दिखाई, जिसमें एक शख्स झाड़ू निकाल रहा है. यह फोटो 2014 से पीएम मोदी की पुरानी फोटो बताकर शेयर की जाती रही है. इंडिया टीवी ने भी इस फोटो को सही बताकर अपने वीडियो में शामिल कर लिया.

इंडिया टीवी

Photo Credit- Altnews

इंडिया टीवी ने हटाया वीडियो

इंडिया टीवी ने यह शो 23 जनवरी को ऑन एयर किया था. हालांकि, अब इस शो के वीडियो को यूट्यूब से हटा लिया गया है, लेकिन एक बार फिर मेनस्ट्रीम मीडिया में फैक्ट चेकिंग की कमी सबसे सामने उजागर हो गई.

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हमने इस फोटो की पहले भी पड़ताल की थी. जब हमने इंटरनेट पर इस फोटो के बारे में सर्च किया तो इसकी सच्चाई सामने आ गई. हमें पता चला कि यह फोटो नकली है. इस फोटो में दिखने वाला व्यक्ति पीएम मोदी नहीं है. इस फोटो की सच्चाई एक आरटीआई के माध्यम से सामने आई. अहमदाबाद के एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने आरटीआई दायर कर पूछा था कि क्या इस फोटो में दिख रहा व्यक्ति पीएम मोदी है? इसके जवाब में बताया गया कि यह फोटो नकली है और इसमें दिख रहा व्यक्ति पीएम मोदी नहीं है. यह आरटीआई आप यहां क्लिक कर देख सकते हैं. हमारी इस पूरी स्टोरी को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं.

वायरल फोटो की पड़ताल सीरीज : झाड़ू लगाते पीएम मोदी की इस फोटो की सच्चाई क्या है?

सोशल मीडिया पर चल रही फेक न्यूज को लेकर हमारी अपील

सोशल मीडिया पर इन दिनों जमकर फेक न्यूज शेयर की जा रही है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जाएंगे, वैसे-वैसे फेक न्यूज बढ़ती जाएगी. एक जागरूक नागरिक होने के नाते आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप फेक न्यूज को फैलने से रोके. इसके लिए अगर आपके पास कोई भी न्यूज आती है तो उस पर आंख मूंदकर भरोसा ना करें. सोशल मीडिया बेवफा है इसलिए इस पर आई हर खबर को सच ना माने. किसी भी खबर पर भरोसा करने या शेयर करने से पहले उसे दूसरे सोर्स से वेरिफाई जरूर करें. फेक न्यूज समाज में नफरत और झूठ फैला रही है. यह हमारे समाज और देश के लिए खतरनाक है. इससे खुद भी बचें और अपने जानने वालों को भी बचाएं.

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अब डिजिटल न्यूज मीडिया पर भी संकट के बादल, बजफीड और हफपोस्ट करेंगी कर्मचारियो की छंटनी

अखबार और टीवी न्यूज इंडस्ट्री में लोगों की नौकरियां जाने का दौर चल ही रहा है कि अब डिजिटल मीडिया में भी यही हाल शुरू हो गया है. वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बजफीड (BuzzFeed) ने अपने 15 प्रतिशत स्टाफ को कम करने का फैसला किया है. बजफीड को अपने लिस्टिकल आर्टिकल्स और सीरीयस न्यूज के साथ-साथ क्विज के चलते अच्छी पहचान मिली थी.

बजफीड

रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यूयॉर्क स्थित बजफीड के इस फैसले से लगभग 215 लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा. बता दें बजफीड ने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके पर्सनल वकील माइकल कोहेन के बारे में विवादित रिपोर्ट छापी थी. कंपनी ने लोगों ने बताया कि छंटनी की योजना महीनों से तैयार हो रही है और इसका कोहेन की रिपोर्ट से कोई संबंध नहीं है.

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न्यूजपेपर और टीवी चैनल जैसे परंपरागत मीडिया संस्थान पहले से डिजिटल मीडिया आने के कारण मुश्किलों का सामना कर रहे थे. इसकी बड़ी वजह उनको मिलने वाले विज्ञापनों का डिजिटल मीडिया के हिस्से में चला जाना रहा है. हालांकि पिछले कुछ समय से डिजिटल कंपनियों को भी इसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है. गूगल और फेसबुक के नए नियमों के कारण इन कंपनियों को विज्ञापन मॉडल समझने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

बजफीड के अलावा वाइस (Vice) ने भी नई हायरिंग पर रोक लगा रखी है. इसके अलावा कंपनी इस साल अपनी वर्कफोर्स में 10-15 फीसदी की कटौती करेगी. वहीं हफपोस्ट, AOL और याहू के स्वामित्व वाली कंपनी वेरिजोन मीडिया ग्रुप भी अपने 7 प्रतिशत कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाएगी.

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इनके अलावा Refinery29, वॉक्स मीडिया और माइक (Mic) पर की भी हालत खराब है. वॉक्स ने पिछले साल 50 कर्मचारियों को पिंक स्लिप थमाई थी. वहीं Refinery29 ने पिछले साल अक्टूबर में 40 कर्मचारियों को नौकरी से निकाला था. अखबार और टीवी जैसे परंपरागत मीडिया संस्थानों में यह समस्या कई सालों से चली आ रही है. विशेषज्ञ मान रहे हैं कि न्यूज इंडस्ट्री इस समय मुश्किलों से जूझ रहे है और इसे अपने आप को बचाए रखने के लिए नया बिजनेस मॉडल देखना होगा.

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राजनीतिक विज्ञापनों

फेसबुक ने कहा, आने वाले चुनावों के लिए राजनीतिक विज्ञापनों के नियम कड़े होंगे

फेसबुक ने बुधवार को कहा कि वह भारत जैसे देशों में जहां आम चुनाव होने वाले हैं राजनीतिक विज्ञापनों के लिये नियम कड़े करेगा. कंपनी ने कहा है कि अमेरिका, ब्रिटेन और ब्राजील में राजनीतिक विज्ञापनों में पारदर्शिता लाने के उसके प्रयास पहले से ही चल रहे हैं. भारत में अप्रैल-मई के आसपास चुनाव हो सकते हैं.

फेसबुक ने राजनीतिक मामलों में एक के बाद एक गड़बड़ियां और घोटाले सामने आने के बाद नियमों में सख्ती की बात की है.

फेसबुक ने अपनी एक पोस्ट में कहा, ‘इस साल दुनिया भर में कई जगह आम चुनावों की तैयारियां चल रही हैं. हम बाहरी हस्तक्षेप को रोकने पर लगातार ध्यान दे रहे हैं. हमारे प्लेटफार्म पर जो भी विज्ञापन होगा उसमें लोगों को अधिक सूचना दी जाएगी.’ कंपनी ने कहा है कि वह भारत में एक विज्ञापन लाइब्रेरी शुरू करेगी और आम चुनावों से पहले विज्ञापनों की पुष्टि का नियम लागू कर देगी.

राजनीतिक विज्ञापनों

सांकेतिक तस्वीर

फेसबुक का कहना है कि अमेरिका, ब्रिटेन और ब्राजील में राजनीतिक विज्ञापन देने वालों को विज्ञापन जारी होने से पहले अपनी पूरी पहचान और स्थान के बारे में जानकारी देना अनिवार्य है. कंपनी ने कहा कि नाइजीरिया और उक्रेन में कोई भी विदेशी चुनावी विज्ञापन स्वीकार नहीं किया जाएगा.

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बता दें कि फेसबुक ने पिछले साल इस बात को स्वीकार किया था कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए काम करने वाले राजनीतिक क्षेत्र की कंपनी केंब्रिज एनालिटिका ने उसके लाखों उपयोगकर्ताओं से जुड़ी जानकारी को चुरा लिया था. ब्रिटेन में ब्रेक्जिट की आलोचना करने वाले लोगों का भी कहना है कि कैंब्रिज एनालिटिका ने चुराये गए इन आंकड़ों को इस्तेमाल यूरोपीय संघ को छोड़ने के लिए मतदान करवाने के लिए किया.

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न्यूजपैक

स्थानीय समाचार प्रकाशकों के लिए गूगल बना रहा नया पब्लिशिंग प्लेटफॉर्म ‘न्यूजपैक’

गूगल छोटे मीडिया संस्थानों की मदद करने के लिए एक नया पब्लिशिंग प्लेटफॉर्म ‘न्यूजपैक’ लाने की तैयारी कर रहा है. इस प्लेटफॉर्म से उन मीडिया संस्थानों को सहायता मिलेगी जो डिजिटल क्षेत्र में जाने में चुनौतियां झेल रहे हैं. इसके लिए गूगल न्यूज इनीशिएटिव ने दुनिया की 30 फीसदी वेबसाइट के केंद्र वेब डेवलपमेंट कंपनी ऑटोमेटिक एंड वर्डप्रैस.कॉम के साथ साझेदारी की है. न्यूजपैक बनाने के लिए गूगल ने 12 लाख डॉलर का निवेश किया है.

न्यूजपैक

कंपनी ने जानकारी देते हुए बताया कि न्यूजपैक एक तेज, सुरक्षित, सस्ता प्रकाशन तंत्र है जो छोटे मीडिया संस्थानों की जरूरतों के अनुसार बनाया गया है। यह प्लेटफॉर्म मीडिया संस्थानों के लिए इसी साल उपलब्ध हो जाएगा.

गूगल सर्च के प्रोडक्ट मैनेजमेंट डायरेक्टर जिम अलब्रेट ने कहा कि समाचार पत्रों को कर्मियों की संख्या में कटौती करनी पड़ी और कवरेज घटाना पड़ा. साथ ही उन्होंने कहा कि नया डिजिटल पब्लिकेशन शुरू करने का प्रयास करने वाले संवाददाताओं को तकनीकी और व्यापारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि पत्रकारों को लेख लिखने चाहिए और उनके समुदायों को कवर करना चाहिए, उन्हें वेबसाइटों की डिजायनिंग, CMS बनाने या वाणिज्यिक तंत्र तैयार करने की चिंता नहीं करनी चाहिए.

गूगल को आपके बारे में पता हैं ये बातें

– गूगल को इस बात की जानकारी है कि आप अपना ज्यादातर समय कहां गुजारते हैं. अगर आपके फोन में लोकेशन ऑन है तो गूगल को इस बात का भी पता है कि आप कहां-कहां जाते हैं, वहां कितने समय रूकते हैं, किस समय वापस आते हैं.
– गूगल को सब पता है कि आपने क्या-क्या सर्च किया है और सर्च करने के बाद क्या-क्या डिलीट किया है.
– गूगल ने आपके लिए एक एडवरटाइजमेंट प्रोफाइल भी बना रखा है. इसके जरिए गूगल आपकी उम्र, लोकेशन, लिंग, शौक, करियर, रिलेशनशिप स्टेट्स और वजन के आधार पर आपको विज्ञापन दिखाती है.

जानिये, सोशल मीडिया पर फेक न्यूज और अफवाह रोकने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है

– गूगल को यह भी पता है कि आपके डिवाइस में कौन-कौन सी ऐप हैं. आप उन ऐप्स को कब इस्तेमाल करते हैं. आप उन ऐप के जरिए किन-किन लोगों से बात करते हैं.
– आपने यूट्यूब पर जो भी देखा है उसका पूरा रिकॉर्ड गूगल के पास है. आपके देखे गए वीडियो के आधार पर गूगल पता लगा सकती है कि आप क्या करते हैं, आपकी विचारधारा क्या है, आप क्या करने की योजना बना रहे हैं आदि-आदि.
– गूगल के पास आपके द्वारा भेजा गया हर ईमेल का रिकॉर्ड है. इसके अलावा कंपनी को यह भी पता है कि आपने अपने स्मार्टफोन में कौन-कौन सी ऐप्स डाउनलोड की, गूगल की कौन-कौन से विज्ञापनों को देखा आदि.

क्या सुधीर चौधरी का यह दावा सही है कि सुभाष चंद्र बोस भारत के पहले प्रधानमंत्री थे?

– गूगल के पास आपका सारा वो डाटा है जो आप गूगल पर जाकर डिलीट करते हैं. वो डाटा बेशक एक बार आपके डिवाइस से डिलीट हो जाए, लेकिन गूगल के पास उसका सारा रिकॉर्ड रहेगा. साथ ही गूगल इस पूरे डाटा को डाउनलोड करने का ऑप्शन देती है. यह डाटा आप google.com/takeout से ले सकते हैं.

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जी हिंदुस्तान

‘जी हिंदुस्तान’ के विवादित विज्ञापन पर अंजना बोलीं, जरा अदब से नाम लीजिए!

जी मीडिया समूह का चैनल ‘जी हिंदुस्तान’ बिना एंकर का न्यूज शो लाने जा रहा है. भारतीय टीवी न्यूज में इस नए प्रयोग के लिए जी हिंदुस्तान ने प्रचार का तरीका भी नया निकाला है. चैनल देशभर के प्रसिद्ध न्यूज एकर्स का नाम इस्तेमाल करके अपने कार्यक्रम का प्रचार कर रहा है. लेकिन जी हिंदुस्तान के प्रचार का यह तरीका उसके खिलाफ जाता दिख रहा है.

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जी हिंदुस्तान

चैनल अभी तक रवीश कुमार, अर्नब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, अंजना ओम कश्यप और रजत शर्मा आदि बड़े नामों का इस्तेमाल कर चुका है. बाकी पत्रकार तो चुप रहे लेकिन जी हिंदुस्तान को जबाव देने में अंजना ओम कश्यप पीछे नहीं हटी. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ पर आए चैनल के विज्ञापन पर अंजना ने ट्वीट करते हुए कहा, ‘नाम जरा अदब से लीजिए.’

जिस विज्ञापन को लेकर अंजना ओम कश्यप ने जबाव दिया है उसमें लिखा हुआ है-
अर्नब की डिबेट अब कौन सुनेगा?
अंजना की जरूरत थी सिर्फ कल तक!
इंडिया में रजत की अदालत अब बंद!

‘जी हिंदुस्तान’ के विज्ञापन में रजत शर्मा के नाम के इस्तेमाल पर रोक

बाकी किसी एंकर ने तो ‘जी’ के विज्ञापन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन रजत शर्मा ने दिल्ली हाईकोर्ट में विज्ञापन में अपना नाम इस्तेमाल किए जाने के खिलाफ याचिका दायर की थी. याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने जी मीडिया को ऐसे कोई भी विज्ञापन जारी करने से मना किया है जिसमें रजत शर्मा का नाम शामिल हो.

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प्रिंट मीडिया

प्रिंट मीडिया में सरकारी विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी से उद्योग को होगा फायदा- रिपोर्ट

हाल ही में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अखबारों को जारी किए जाने वाले विज्ञापनों की दर में 25 प्रतिशत बढ़ोतरी का ऐलान किया था. अखबारों को यह विज्ञापन ब्यूरो ऑफ आउटरीच एंड कम्यूनिकेशन द्वारा दिया जाता है। नई दरें तत्काल प्रभाव से लागू हो गई हैं और यह तीन साल के लिये वैध रहेंगी। इससे पहले 2013 में दरों में इजाफा हुआ था। वर्ष 2010 की तुलना में उस समय 19 प्रतिशत की वृद्धि की गयी थी.

प्रिंट मीडिया

अब एक रिसर्च में पता चला है कि प्रिंट मीडिया के लिये सरकारी विज्ञापन की दरें बढ़ने से इस उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। केयर रेटिंग्स ने यह बात कही है. सरकार के इस कदम से प्रिंट मीडिया उद्योग की आय बढ़ेगी। प्रिंट उद्योग का आकार वित्त वर्ष 2017-18 में करीब 31,800 करोड़ रुपये था.

एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस फैसले से भारतीय प्रिंट मीडिया में काम कर रही कंपनियों को लाभ होने की उम्मीद है. दिसंबर 2017 के बाद से कर कटने के बाद इनके परिचालन आय और मुनाफे में गिरावट देखी जा रही है. वित्त वर्ष 2018-19 की पहली छमाही में कंपनियों के राजस्व में गिरावट आई. इसकी वजह त्योहारी सीजन तीसरी तिमाही में होना, वाहन, शिक्षा और खुदरा उद्योगों का विज्ञापन पर कम खर्च, अखबारी कागज (न्यूज प्रिंट) की कीमतों में वृद्धि और रुपये में गिरावट रही.

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केयर रेटिंग्स ने कहा कि इस कदम से सरकार द्वारा मिलने वाले विज्ञापनों की दरें बढ़ेंगी, जो कमर्शियल विज्ञापनों की दरों की तुलना में पहले काफी कम करीब 10 प्रतिशत है. एजेंसी ने कहा कि दैनिक अखबारों का करीब 70 प्रतिशत राजस्व विज्ञापनों से आता है. सरकार के विज्ञापन दरों को बढ़ाने से अखबारों की परिचालन आय में वृद्धि होगी. खासकर क्षेत्रीय और छोटे अखबारों को काफी मदद मिलेगी, जो कि काफी हद तक विज्ञापनों को निर्भर रहते हैं.

हमारी अपील

हमारी आपसे अपील है कि सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही फेक न्यूज के झांसे में ना आए. सोशल मीडिया बेवफा है इसलिए इस पर आई हर खबर को सच ना माने. किसी भी खबर पर भरोसा करने या शेयर करने से पहले उसे दूसरे सोर्स से वेरिफाई जरूर करें. फेक न्यूज समाज में नफरत और झूठ फैला रही है. यह हमारे समाज और देश के लिए खतरनाक है. इससे खुद भी बचाएं और अपने जानने वालों को भी बचाएं.

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पीएम मोदी का इंटरव्यू

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प्रधानमंत्री मोदी ने 1 जनवरी को समाचार एजेंसी ANI को एक विस्तृत इंटरव्यू दिया था. लगभग 95 मिनट के इस इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मोदी ने कई सवालों के जवाब दिये. इनमें नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, महागठबंधन, राम मंदिर, इसी साल होने वाले लोकसभा चुनाव आदि से जुड़े सवाल शामिल थे.

पीएम मोदी का इंटरव्यू

प्रधानमंत्री मोदी ने काफी लंबे समय बाद किसी मीडिया संस्थान को इंटरव्यू दिया था. हालांकि, इससे पहले वे जी टीवी, टाइम्स नाउ, जागरण आदि मीडिया घरानों को इंटरव्यू दे चुके थे, लेकिन ये सारे मीडिया घराने भाजपा और केंद्र सरकार के प्रति झुकाव रखने वाले हैं.

स्क्रिप्टेड बता रहे हैं पीएम मोदी की इंटरव्यू

ANI को दिए इंटरव्यू को भी कुछ लोग स्क्रिप्टेड इंटरव्यू बता रहे हैं. कहा जा रहा है कि इसमें प्रधानमंत्री मोदी से कई जरूरी सवाल नहीं पूछे गए. 2 जनवरी को लोकसभा में राफेल पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने भी इस इंटरव्यू का जिक्र करते हुए इसे ‘स्टेजेड इंटरव्यू’ यानी पहले से तैयार किया हुआ इंटरव्यू बताया. यह पूरा इंटरव्यू आप नीचे देख सकते हैं.

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इसी बीच ट्वीटर पर इंटरव्यू के दौरान का वीडियो सामने आया है. इसमें प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस से जुड़े एक सवाल का जवाब दे रहे हैं. इसमें एक जगह प्रधानमंत्री मोदी बोलते-बोलते रूकते हैं इसी दौरान कोई ‘सोच’ बोलकर उनकी मदद करता है। प्रधानमंत्री ‘सोच’ शब्द सुनते ही अपनी बात फिर चालू करते हैं और अपना बयान पूरा करते हैं. नीचे दिए गए वीडियो में 1.16 मिनट पर यह सुना जा सकता है.

इस वाकये के सामने आने के बाद ऑल्टन्यूज के फाउंडर प्रतीक सिन्हा ने सवाल उठाया कि क्या ऐसा अपने-आप हो गया. उनका इशारा इंटरव्यू के स्क्रिप्टेड होने से है.

https://twitter.com/arvindgj/status/1080168295360327681

वहीं कुछ लोग इस इंटरव्यू की तारीफ कर रहे हैं. उनके मुताबिक, इस इंटरव्यू में सभी जरूरी सवालों को शामिल किया गया था. प्रतीक के दावे के विपरित लोगों का कहना है कि इंटरव्यू में आमतौर पर ऐसा होता है. जब भी दो लोग आपस में बात करते हैं तो दूसरे व्यक्ति को पता चल जाता है कि सामने वाला क्या बोलने वाला है. ऐसे में इस बात को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए.

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