रवीश कुमार का खुला पत्र

बुलंदशहर हिंसा में शहीद इंस्‍पेक्‍टर सुबोध कुमार सिंह के नाम रवीश कुमार का पत्र

बुलदंशहर हिंसा में यूपी पुलिस के इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह शहीद हो गए. कथित गौकशी के मामले को लेकर भड़की हिंसा में सुबोध कुमार सिंह को गोली मार दी गई। इंस्पेक्टर सुबोध की शहादत के बाद वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने उनके बेटे अभिषेक से बात की. अभिषेक ने कहा कि इस मॉब लिंचिंग कल्चर से कुछ हासिल नहीं होने वाला है. यदि हम हिंदू-मुस्लिम के नाम पर आपस में लड़ते रहे तो पाकिस्तान या चीन को कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

रवीश कुमार का खुला पत्र

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इसके बाद रवीश कुमार ने शहीद इंस्‍पेक्‍टर सुबोध कुमार सिंह के नाम एक पत्र लिखा है. यह पत्र khabar.ndtv.com पर छपा है. हम यहां इस पत्र को हूबहू पेश कर रहे हैं-

सुबोध कुमार सिंह जी,

मैं आपको एक पत्र लिख रहा हूं. मुझे मालूम है कि यह पत्र आप तक कभी नहीं पहुंचे सकेगा. लेकिन मैं चाहता हूं कि आपकी हत्या करने वाली भीड़ में शामिल लड़कों तक पहुंच जाए. उनमें से किसी एक लड़के के पास भी यह पत्र पहुंच गया तो समझूंगा कि यह पत्र आप तक पहुंच गया. जो आपके हत्यारे हैं, उन तक आपके नाम लिखा पत्र क्यों पहुंचना चाहिए? इसलिए कि उन लड़कों को सुबोध कुमार सिंह के जैसा पिता नहीं मिला. अगर आपके जैसा पिता मिला होता तो वे लड़के अभिषेक सिंह की तरह होते. वे नफ़रत को उकसाने वाली भावनाओं के तैश में आकर हत्या करने नहीं जाते. इसलिए आपके नाम पत्र लिख रहा हूं.

इस वक्त नयाबास और चिंगरावठी गांव के पिता असहाय और अकेला महसूस कर रहे होंगे. कोई पिता नहीं चाहता है कि उसके बेटे का नाम हत्या के आरोप में आए. रातों रात हत्या के आरोपी बन चुके अपने बच्चों को लेकर उन्हें कैसे-कैसे सपने आते होंगे. मैं यह सोच कर कांप जा रहा हूं. हिन्दू मुस्लिम नफ़रत की राजनीति ने उनका सबकुछ लूट लिया है. मैं अक्सर अपने भाषणों में कहता हूं. एक पहलू ख़ान की हत्या के लिए हिन्दू घरों में पचास हत्यारे पैदा किए जा रहे हैं. इसलिए पहलू ख़ान की हत्या से सहानुभूति नहीं है तो भी आप सहानुभूति रखें क्योंकि यह पचास हिन्दू बेटों के हत्यारा बनने से बचाने के लिए बहुत ज़रूरी है. अख़लाक की हत्या में शामिल भीड़ भले ही कोर्ट से बच जाएगी मगर कभी भी अपने गांव में पुलिस को आते देखेगी तो उनमें शामिल लोगों का दिल एक बार ज़रूर धड़केगा कि कहीं किसी ने बता तो नहीं दिया.

नयाबांस और चिंगरागाठी के नौजवान और उनके माता-पिता इस अपराध-बोध को नहीं संभाल पाएंगे. उन्हें तो अब हर ईंट पर अपने बेटों की उंगलियों के निशान दिखती होगी, लगता होगा कि कहीं इस ईंट के सहारे पुलिस उनके बेटे तक न पहुंच जाए. रिश्तेदारों को फोन करते होंगे कि कुछ दिन के लिए बेटे को रख लो. वकीलों से गिड़गिड़ाते होंगे. पंडितों को दान देते होंगे कि कोई मंत्र पढ़कर बचा लो. उनकी दुनिया बर्बाद हो गई है. अगर राजनीति उन्हें बचा भी लेगी तो उसकी कीमत वसूलेगी. उनसे और हत्याएं करवाएगी. इन गावों के लड़के सांप्रदायिक झोंके में आकर लंबे समय के लिए मुश्किलों में फंस गए हैं. इसलिए आपके नाम पत्र लिख रहा हूं ताकि ये पढ़ सकें.

अभिषेक से बात करते हुए मुझे साफ-साफ दिख रहा था कि वो आपसे कितना प्यार करता है. इतना कि आपको खो देने के बाद भी आपकी दी हुई तालीम को सीने से लगाए हुए हैं. मैं आपसे नहीं मिला लेकिन अब आपसे मिल रहा हूं. अभिषेक की बातों के ज़रिए मैं ही नहीं, लाखों लोग आपको देख रहे हैं. उस अच्छे पुलिस अफसर की तरह जो दिन भर सख़्त दिखने की नौकरी के बाद घर आता है तो अपने बच्चों के लिए टॉफियां लाता है. खिलौने लाता है. वर्दी उतारकर अपने बच्चों को सीने से लगा लेता है. उनके साथ खेलता है. बातें करता है. अच्छी बातें सीखाता है. उन्हें नागरिक बनना सीखा रहा है.

“मेरे पिता का एक ही सपना था, आप कुछ बनें या न बनें एक अच्छा नागरिक ज़रूर बनें.” यह आपके बेटे अभिषेक ने कहा है. सुनने वालों को यकीन नहीं हुआ कि अपने प्यारे पिता को खोकर भी एक बेटा इतनी तार्किक बात कह रहा है. ऐसा लगता है कि आख़िरी बार के लिए आप उस भीड़ से यही कहने गए थे, जिसने आपकी बात नहीं सुनी. वो बात आपके सीने में अटकी रही और अभिषेक के ज़रिए बाहर आ गई. अभिषेक ने कहा कि “मॉब लिंचिंग की संस्कृति से कुछ हासिल नहीं होने वाला है. कहीं ऐसा दिन न आ जाए कि हम भारत में एक दूसरे को मार रहे हैं. कहां पाकिस्तान, कहां चीन कहां कोई और, किसी की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी कुछ करने के लिए. आज मेरे पिताजी की मौत हुई है, कल पता चला कोई आईजी (इंस्पेक्टर जनरल) को ये लोग मार दिया फिर किसी मंत्री को मार दिया. क्या मॉब लिंचिंग कल्चर ऐसे चलना चाहिए?”

सुबोध कुमार सिंह जी, आप जिस पुलिस विभाग के हैं, उसके बारे में आप भी जानते ही होंगे. उस पुलिस के बड़े अफ़सर की बुज़दिली नज़र आ रही थी, जब वे किसी संगठन का नाम लेने से बच रहे थे. उनकी वर्दी किसी कमज़ोर को फंसा देने या दो लाठी मार कर कुछ भी उगलवा लेने के ही काम आती रही है. ऐसी पुलिस के पास सिर्फ वर्दी ही बची होती है. ईमान और ग़ैरत नहीं होती. जो धौंस होती है वो पुलिस की अपनी नहीं होती, उनके आका की दी हुई होती है. आपकी हत्या के तीन दिन हो गए और वो पुलिस 27 नामज़द आरोपियों में से मात्र तीन को ही पकड़ पाई है. यूपी पुलिस को अपने थानों के बाहर एक नोटिस टांग देना चाहिए. वर्दी से तो हम पुलिस हैं, ईमान से हम पुलिस नहीं हैं.

हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था ने इस पुलिस की रचना की है. वह कहां निर्दोष है. उसने पुलिस की हर ख़राबी को स्वीकार किया है. उसमें वह शामिल रही है. अच्छे अफ़सरों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. अपने विभाग में विस्थापित की तरह जीते हैं. इस पुलिस व्यवस्था में रहते हुए आप परिवार में बिल्कुल अलग दिखते हैं. अब मैं समझ रहा हूं कि उसी पुलिस के कुछ लोग घरों में लौट कर सुबोध कुमार सिंह की तरह भी होते हैं.

फिर भी मुझे आपकी पुलिस से कोई उम्मीद नहीं है. आपके अफ़सरों से कोई उम्मीद नहीं है. अफसरों का ईमान भले न बचा रहे, ईश्वर उनकी शान बचाए रखे. वर्ना उनके पास जीने के लिए कोई मकसद नहीं होगा. आपके साथी दारोगा जल्दी भूल जाएंगे. कोई बहाना ढूंढ कर तीर्थ यात्रा पर निकल जाएंगे ताकि उनका सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहे. ड्यूटी पर भी रहेंगे तो वे लोग आपके हत्यारों को पकड़ना छोड़ उस प्रेस रिलीज़ के अमल में लग गए होंगे जिसमें लिखा था कि गोकशी में शामिल लोगों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए. मुख्यमंत्री के यहां से जारी बयान में यह तो लिखा नहीं था कि सुबोध कुमार सिंह के हत्यारों को 24 घंटों में पकड़ कर हाज़िर किया जाए. वे भी समझा लेंगे कि ये तो होता ही है पुलिस की नौकरी में.

जाने दीजिए. आपका विभाग अपनी सोच लेगा. मगर हम आपके बारे में सोच रहे हैं. अफसोस कि हम एक अच्छे पिता को उसकी हत्या के बाद जान सके हैं. आप भारत के पिताओं में अपवाद हैं. भारत के ज़्यादातर पिता विचारों की जड़ताओं और संकीर्णताओं के पोषक हैं. वे सिर्फ अपने नियंत्रण में रहने वाला बेटा बनाते हैं. आप अभिषेक को नागरिक बनाना चाहते थे. वह नागरिक ही बना है. अपने प्यारे पिता को खोकर भी वह संविधान के दायरे में बात कर रहा है. पुलिस की नौकरी ने जितना सम्मान नहीं दिया होगा उससे कहीं ज़्यादा अभिषेक ने आपका मान बढ़ाया है. अभिषेक की बातों ने आपको घर-घर में ज़िंदा कर दिया है.

मैं दुआ करता हूं कि अभिषेक कानून की पढ़ाई पूरी करे. अपने संघर्षों से वकालत की दुनिया में ऊंचा मकाम हासिल करे. तमाम तरह की संकीर्णताओं और जड़ताओं से बचा रहे. जिस तरह का संतुलित और तार्कित नौजवान है, मैं चाहूंगा कि एक दिन वह जज भी बने. आपने भारत को एक अच्छा नागरिक दिया है. सुबोध कुमार सिंह आपको मैं सलाम करता हूं.

रवीश कुमार

चुनाव अधिकारी निलंबित

मध्यप्रदेश- बीजेपी नेता के होटल में ईवीएम और वीवीपैट मशीन लेकर जाने के आरोप में दो चुनाव अधिकारी निलंबित

मध्यप्रदेश में दो चुनाव अधिकारी निलंबित

मध्य प्रदेश में चुनाव आयोग ने अपने दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया है. इन अधिकारियों पर आरोप है कि चुनाव आयोग के नियमों के विरुद्ध वो ईवीएम और वीवीपैट मशीन को एक होटल में लेकर गए थे, जिससे ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की सुरक्षा से समझौता हुआ. मामला मध्य प्रदेश में चुनाव से एक दिन पहले 27 नवंबर का बताया जा रहा है. गौर करने वाली बात ये है कि होटल का मालिक एक बीजेपी सदस्य है.

चुनाव अधिकारी निलंबित

निलंबित हुए अधिकारियों में एक सेक्टर ऑफिसर और शाजापुर मेडिकल स्टाफ का एक सदस्य शामिल है. चुनाव आयोग ने मामले पर अपना बयान देते हुए प्रेस नोट जारी किया. इसके अनुसार ईवीएम और वीवीपैट को शुजालपुर स्थित राजमहल होटल तक पहुंचाने में एक रिजर्व माइक्रो ऑफिसर और एक सुरक्षा अधिकारी भी शामिल था.

बता दें कि चारों अधिकारियों का होटल का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था. इस दौरान अधिकारियों पर नशे में होने का भी आरोप है.

चुनाव आयोग के अनुसार इंजीनियर्स ने ईवीएम और वीवीपैट का निरक्षण किया है. उनसे किसी भी तरह की छेड़छाड़ी नहीं की गई थी. निलंबित अधिकारियों के नाम सेक्टर ऑफिसर सोहन लाल बजाज और मेडिकल स्टाफ सदस्य रईस मंसूरी है.

बता दें कि चुनाव अधिकारी निलंबित होने के बाद सोशल मीडिया पर लोग बीजेपी पर चुनाव में धांधली का आरोप भी लगा रहे हैं. लोगों का आरोप है कि इस बार बीजेपी चुनाव में धांधली की कोशिश करते हुए रंगे हाथों पकड़ी गई है. हालांकि आधिकारिक बयानों में अभी तक बीजेपी का कोई जिक्र नहीं है.

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जानिये, लोग क्यों फैलाते हैं फेक न्यूज, सामने आई यह बड़ी वजह

सोशल मीडिया धीरे-धीरे फेक न्यूज (Fake News) का अड्डा बनता जा रहा है. लोग किसी भी झूठ को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं जो देखते ही देखते वायरल हो जाता है. कुछ लोग इस झूठ को सच मानकर भरोसा भी कर लेते हैं. लंबे समय से चला आ रहा यह ट्रेंड पिछले कुछ सालों में तेज हुआ है. फेक न्यूज (Fake News) और सोशल मीडिया पर फैले झूठ को रोकने के लिए दुनियाभर में काम किया जा रहा है. भारत में भी सरकार इस बारे में कानून लाने की योजना बना रही है.

Fake news

बीबीसी ने फेक न्यूज को लेकर एक बड़ी रिसर्च की है. बीबीसी की यह रिसर्च बीबीसी के Beyond Fake News प्रोजेक्ट के तहत की गई जो ग़लत सूचनाओं के ख़िलाफ़ एक अंतरराष्ट्रीय पहल है. इस रिसर्च में सामने आया कि लोग ‘राष्ट्र निर्माण’ की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाली फ़ेक न्यूज़ को शेयर कर रहे हैं.

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इस रिसर्च में पता चला कि हमारे देश में लोग उस तरह के संदेशों को शेयर करने में झिझक महसूस करते हैं जो उनके मुताबिक़ हिंसा पैदा कर सकते हैं. लेकिन यही लोग राष्ट्रवादी संदेशों को शेयर करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं. भारत के अलावा कीनिया और नाइजीरिया में भी फ़ेक न्यूज़ फैलाने के पीछे लोगों की ‘फ़र्ज़ की भावना’ सामने आई, लेकिन इन दोनों देशों में राष्ट्र निर्माण की भावना की बजाय ब्रेकिंग न्यूज़ को साझा करने की भावना ज़्यादा होती है ताकि कहीं अगर वो ख़बर सच हुई तो वह उनके नेटवर्क के लोगों को प्रभावित कर सकती है.

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मुख्यधारा की मीडिया पर भरोसा नहीं करते लोग

फे़क न्यूज़ के फैलाव में मुख्यधारा के मीडिया को भी ज़िम्मेदार पाया गया है. रिसर्च के मुताबिक़, इस समस्या से निबटने में मीडिया इसलिए बहुत कारगर नहीं हो पा रहा है क्योंकि उसकी अपनी ही साख बहुत मज़बूत नहीं है, लोग मानते है कि राजनीतिक और व्यावसायिक हितों के दबाव में मीडिया ‘बिक गया’ है.

यह स्टोरी बीबीसी की एक खबर पर आधारित है. बीबीसी की यह खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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‘नोटबंदी से देश के किसानों को हुआ नुकसान’

नोटबंदी से जुड़ी बहस उसके लागू होने के दो साल बाद भी जारी है और एक तबके का अभी भी मानना है कि ये एतिहासिक फैसला था, वहीं एक और तबका मानता है कि ये एतिहासिक भूल थी. ऐसे में ये बड़ी नई जानकारी सामने आई है कि किसानों पर इसका बुरा पड़ा है. कृषि मंत्रालय ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति के सामने ये बात खुद मानी है. हालांकि, जब यह खबर छपी तो कृषि मंत्री ने फ़ौरन इसका खंडन कर दिया.

नोटबंदी से हताशा के हालात पैदा हो गए
नोटबंदी के बाद नगदी की कमी की वजह से ग्रामीण भारत में हताशा के हालात पैदा हो गए. ये बात कृषि मंत्रालय ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति को सौंपे एक बैकग्राउंड नोट में मानी है. नोट के मुताबिक बहुत सारे किसान बीज और खाद नहीं खरीद सके. 2016 में रबी की फसल पर इसका बुरा असर पड़ा जिससे इस क्षेत्र को खासा नुकसान हुआ.

बुधवार को यह खबर अखबारों में छपी तो राहुल गांधी ने ट्वीट किया, “नोटबंदी ने करोड़ों किसानों का जीवन नष्ट कर दिया है. अब उनके पास बीज-खाद खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा भी नहीं है लेकिन आज भी मोदी जी हमारे किसानों के दुर्भाग्य का मज़ाक उड़ाते हैं अब उनका कृषि मंत्रालय भी कहता है नोटबंदी से टूटी किसानों की कमर.”

टिप्पणियां वित्तीय मामलों की संसदीय समिति के सदस्य पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा, लेकिन नोटबंदी के नतीजों की बात की. इसके बाद कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने यह ख़बर ख़ारिज करते हुए ट्वीट किया, “कुछ मीडिया चैनलों और समाचार पत्रों द्वारा यह ख़बर चलाई जा रही है कि कृषि विभाग ने यह माना है कि किसानों पर नोटबंदी का बुरा असर पड़ा था और किसान कैश की क़िल्लत के कारण बीज नहीं ख़रीद पाए थे. यह वास्तविक तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है.”

क्या थी नोटबंदी
भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया में नोटबंदी कहा गया, की घोषणा 8 नवम्बर 2016 को रात आठ बजे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक राष्ट्र को किये गए संबोधन के द्वारा की गयी। यह संबोधन टीवी के द्वारा किया गया. इस घोषणा में 8 नवम्बर की आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का ऐलान किया गया. इसका उद्देश्य केवल काले धन पर नियंत्रण ही नहीं बल्कि जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था. लेकिन इससे ऐसा कुछ नहीं हुआ और सरकार ने मामले में पाला बदलकर इसे पूरी तरह से डिजिटल इकॉनमी का मामला बना दिया. आपको बता दें कि इससे देशों को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है.

मनोज तिवारी

सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन के मौके पर हंगामा, मनोज तिवारी पर हाथापाई का आरोप

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज सिग्नेचर ब्रिज (Signature Bridge) का उद्घाटन किया. उद्घाटन मौके से पहले दिल्ली से बीजेपी सांसद मनोज तिवारी (Manoj Tiwari) ने मौके पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया. इस दौरान पुलिस और वहां मौजूद लोगों से उनकी झड़प हो गई. एएनआई के एक वीडियो में दिख रहा है कि मनोज तिवारी पुलिसवालों की तरफ मुक्का चला रहे हैं.

उद्घाटन के मौके पर अपने प्रशंसकों के साथ पहुंचे मनोज तिवारी ने हंगामा कर दिया. इस दौरान मनोज वाजपेयी भी पुलिस से भिड़ गए. उन्होंने कहा कि मैंने सिग्नेचर ब्रिज का काम दोबारा शुरू कराया था और अब केजरीवाल इसका उद्घाटन कर रहे हैं.

मनोज तिवारी ने कहा कि इलाके के सांसद होने के नाते मैं सिग्नेचर ब्रिज (Signature Bridge) पर आया हूं. बता दें कि जहां पर उद्घाटन है वहां से सांसद मनोज तिवारी हैं. मनोज तिवारी ने कहा कि मुझे उद्घाटन समारोह में आमंत्रित किया गया था. मैं यहां से सांसद हूं, तो समस्या क्या है? क्या मैं एक अपराधी हूं? उन्होंने कहा कि यहां अरविंद केजरीवाल का स्वागत करने के लिए हूं.

वहीं दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इस पूरे मामले पर टिप्पणी की है. उन्होंने ट्वीट किया, ‘सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन से मायूस कुछ खिसियानी बिल्लियां खम्बा नोंच रही हैं। इन्होंने सुपारी उठा रखी थी कि केजरीवाल सरकार के इस कार्यकाल में सिग्नेचर ब्रिज को पूरा नहीं होने देंगे।’

सिग्नेचर ब्रिज के बारे में कुछ बातें-

दिल्ली में सिग्नेचर ब्रिज (Signature Bridge) का काम पूरा हो गया है. 2004 में मंजूर हुआ यह यह ब्रिज लगभग 14 साल बाद बनकर तैयार हुआ है. इस ब्रिज को दिल्ली में 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार किया जाना था, लेकिन यह अब जाकर तैयार हुआ है. यह ब्रिज दिल्ली के वज़ीराबाद से गाज़ियाबाद की ओर जाने वाले लोगों के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा.

आम आदमी पार्टी ने सिग्नेचर ब्रिज के नाम पर शेयर की नीदरलैंड के ब्रिज की फोटो

अभी तक लगने वाले ट्रैफिक जाम से लोगों को राहत मिलेगी. 2004 में जब इस ब्रिज का प्रस्ताव आया था, तब इसकी लागत सिर्फ 464 करोड़ रुपये थी, जो बाद में लगातार बढ़ती चली गई. केजरीवाल सरकार ने इसके लिए 2017 में 100 करोड़ रुपये आवंटित किए थे और इसे मार्च 2018 तक बन तैयार होना था. लेकिन तकनीकी व दूसरे कारणों से इसमे समय लग गया.

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नेहरू मेमोरियल

अर्नब गोस्वामी बने नेहरू मेमोरियल में सदस्य, उपाध्यक्ष के पद पर अब भी बने हुए हैं एमजे अकबर

मोदी सरकार ने नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय (NMML) में पत्रकार अर्णब गोस्वामी, पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर, भाजपा सांसद विनय सहस्रबुद्धे और पत्रकार एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के अध्यक्ष राम बहादुर राय को बतौर सदस्य नियुक्त किया है. नेहरू मेमोरियल में इनकी नियुक्ति उन चार पूर्व सदस्यों की जगह की गई है, जिन्होंने तीन मूर्ति एस्टेट में सभी प्रधानमंत्रियों के लिए एक म्यूजियम बनाने का विरोध किया था.

नेहरू मेमोरियल

नवनियुक्त सदस्य

चौंका देने वाली बात यह है कि यौन उत्पीड़न से घिरे पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर अब तक NMML की कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष बने हुए हैं. बता दें कि यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद एमजे अकबर को मंत्री परिषद से इस्तीफा देना पड़ा था.

नेहरू मेमोरियल से इन सदस्यों को हटाया

सरकार ने 29 अक्टूबर को अर्थशास्त्री नितिन देसाई, प्रोफेसर उदयन मिश्रा और पूर्व नौकरशाह बी.पी. सिंह को NMML के सदस्य पद से हटा दिया था. एक अन्य सदस्य प्रताप भानु मेहता ने शक्ति सिन्हा को NMML का निदेशक नियुक्त करने के मुद्दे पर साल 2016 में इस्तीफा दे दिया था. बता दें कि प्रताप भानु मेहता, बीपी सिंह और उदयन मिश्रा ने तीन मूर्ति एस्टेट में सभी प्रधानमंत्रियों के लिए संग्रहालय बनाने के निर्णय का खुला विरोध किया था.

निदेशक ने कहा- नेहरू मेमोरियल में नई नियुक्तियां बड़ी योजना का हिस्सा

नेहरू मेमोरियल

नेहरू मेमोरियल का दृश्य

नये नियुक्त किए गए सदस्यों का कार्यकाल 25 अप्रैल 2020 तक है. NMML के निदेशक शक्ति सिन्हा ने इस घटना पर बताया, ‘‘उनके कार्यकाल खत्म नहीं हुए हैं. उनकी जगह अन्य लोगों की नियुक्ति की गई है”. इन नियुक्तियों की वजह पूछे जाने पर सिन्हा ने कहा कि वे NMML को एक शोध केंद्र के तौर पर विकसित करने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेंगे. उन्होंने कहा, ‘‘यह NMML को शोध का केंद्र बनाने की बड़ी योजना का हिस्सा है. राम बहादुर राय पिछले 50 साल से भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते रहे हैं. वह कुछ प्रधानमंत्रियों को व्यक्तिगत तौर पर जानते थे”.

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सिन्हा ने कहा, ‘‘जयशंकर हमें एक अंतदृष्टि प्रदान करेंगे कि शीर्ष स्तर पर फैसले कैसे किए जाते हैं. वरिष्ठ पत्रकार और अपने शुरुआती दिनों में शोधार्थी होने के नाते गोस्वामी भारतीय राजनीतिक इतिहास पर शोध एवं सूचना का डेटाबेस तैयार करने की हमारी योजना में खासा योगदान करेंगे.”

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राफेल

राफेल डील पर बोले HAL चेयरमैन, कहा- सौदा रद्द होने की हमें जानकारी नहीं

राफेल डील पर मचा घमासान शांत नहीं हो रहा है. एक तरफ जहां कांग्रेस लगातार इस सौदे में भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है, वहीं अब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के चेयरमैन ने कहा कि है उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि सरकार ने पिछला कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया है. बता दें कि सरकार ने नए कॉन्ट्रैक्ट से HAL को हटा दिया है. कांग्रेस का आरोप है कि HAL को हटाकर इस सौदे में अनिल अंबानी को लाया गया है.

राफेल डील

HAL के चेयरमैन आर माधवन

HAL के चेयरमैन आर माधवन ने कहा, ‘हमें पिछले सौदे को रद्द किए जाने की जानकारी नहीं थी. हम राफेल पर टिप्पणी नहीं करना चाहते, क्योंकि अब हम इस सौदे का हिस्सा नहीं हैं’.

क्या है राफेल डील मामला

राफेल डील

कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में फ्रांस की लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनी दसॉल्ट एविएशन के साथ 125 राफेल विमानों का सौदा किया था. जिसमें से 108 विमानों का निर्माण लाइसेंस्ड प्रोडक्शन के तहत HAL द्वारा किया जाना था और 18 विमानों का निर्माण फ्रांस में कर उसे भारत लाने की योजना थी.

क्या राफेल सौदे से खुश हो कर मोदी सरकार को 32 जगुआर लड़ाकू विमान फ्री में देगा फ्रांस?

हालांकि यह सौदा आगे नहीं बढ़ा. इसके बाद नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने वर्ष 2015 में फ्रांस की सरकार के साथ दूसरा सौदा कर लिया, जिसमें 125 के बजाय सिर्फ 36 राफेल विमानों की खरीद की गई और इन सबका निर्माण फ्रांस में ही कर उसे भारत लाया जाएगा. इसकी अनुमानित कीमत 54 अरब डॉलर है. हालांकि, सरकार इनकी कीमत की जानकारी नहीं दे रही है.

इसी बात से सारा विवाद जुड़ा हुआ है. कांग्रेस का कहना है कि अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए नया सौदा किया गया है. मोदी सरकार पर आरोप है कि सरकार ने राफेल डील से सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को हटाकर यह सौदा अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को दिलाने में मदद की है. कांग्रेस सरकार के समय हुई राफेल डील के मुताबिक, HAL को 108 एयरक्राफ्ट का निर्माण करना था, जिसे मोदी सरकार ने अपने नए समझौते से बाहर कर दिया.

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उबर ड्राइवर

जानिये कैसे नाइजीरिया में यात्रियों से दोगुना किराया वसूल रहे हैं उबर ड्राइवर

कैब सर्विस देने वाली कंपनी उबर कई बार विवादों में फंस चुकी है. अब एक नया विवाद शुरू होता दिख रहा है. नाइजीरिया के सबसे बड़े शहर लागोस में कुछ उबर ड्राइवर यात्रियों से ज्यादा किराया लेने के लिए फेक जीपीएस ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं.

उबर ड्राइवर

qz.com की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यहां उबर ड्राइवर Lockito नाम की ऐप यूज कर रहे हैं. इस जियोफेंसिंग बेस्ड ऐप के सहारे फेक जीपीएस रूट सेट किया जा सकता है. यहां उबर ड्राइवर इस ऐप का यूज कर यात्रियों से ज्यादा किराया वसूल रहे हैं. कई बार यह किराया दोगुना से भी ज्यादा होता है.

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इस रिपोर्ट के मुताबिक, एक ड्राइवर ने बताया कि इस ऐप से फेक जीपीएस सेट किया जाता है, जबकि फोन में असली जीपीएस सेट रहता है. उबर ऐप इन दोनों में सही का पता नहीं लगा पाती और यह दोनों ऐप के रूट के हिसाब से किराया कैलकुलेट करती है. इससे कुल किराया काफी ज्यादा रहता है.

कुछ ड्राइवर Lockito की मदद से ट्रिप शुरू होने से पहले ही पिकअप और ड्रॉप ऑफ लोकेशन सेट कर देते हैं. जब ट्रिप शुरू होती है तो रियल जीपीएस चलना शुरू होता है, लेकिन ट्रिप खत्म-खत्म होते-होते दोनों जीपीएस (असली और नकली) के हिसाब से किराया कैलकुलेट होता है. इस हिसाब से यात्रियों को थोड़ी दूर के लिए ज्यादा किराया देना पड़ रहा है.

कंपनी को भी ड्राइवरों के इस फ्रॉड का पता है. उबर नाइजीरिया के प्रवक्ता ने बताया कि यह उबर की गाइडलाइंस का उल्लंघन है और कंपनी ऐसा करने वाले ड्राइवरों पर नजर बनाए हुए है.

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नक्सलियों के हमले में बाल-बाल बचे दूरदर्शन के पत्रकार धीरज कुमार ने क्या कहा

क्या आपको पता है ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ के अंदर 2 IIT, 5 IIM और 6 ISRO समाए हुए हैं!

नक्सली हमला

DD के कैमरामैन की हत्या के बाद नक्सलियों ने लिखी मीडिया के नाम चिट्ठी

छत्तीगढ़ के दंतेवाड़ा में 30 अक्टूबर नक्सली हमले में दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू और 3 सुरक्षाकर्मियों की जान चली गई थी. दूरदर्शन की टीम छत्तीसगढ़ में हो रहे विधानसभा चुनाव को कवर करने गई थी. नक्सलियों ने इस हमले के बाद एक चिट्ठी जारी की है. इस चिट्ठी में नक्सलियों ने लिखा कि, ‘पत्रकारों को सुरक्षा बलों के साथ नक्सली इलाकों में यात्रा नहीं करनी चाहिए.’ उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उन्हें यह नहीं मालूम था कि सुरक्षाकर्मियों के साथ मीडिया के लोग भी हैं.’ चेतावनी देते हुए कहा नक्सलियों ने कहा कि उनकी पत्रकारों से कोई दुश्मनी नहीं है. वे उनके दोस्त हैं.

नक्सलियों ने अपने पत्र में लिखा कि जबरदस्ती फायरिंग में अच्युतानंद साहू का मरना दुख की बात है. हम जानबूझकर पत्रकारों को नहीं मारेंगे. पत्र में यह भी कहा गया कि अच्युतानंद घात लगाकर बैठे थे और हमारा मीडिया को निशाना बनाने का कोई लक्ष्य नहीं है.

नक्सलियों के हमले में कैमरामैन की मौत- युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे और सावधानियां

वहीं दंतेवाड़ा के एसपी ने नक्सलियों के इस स्पष्टीकरण पर सवाल उठाए हैं. एसपी अभिषेक पल्लव ने कहा, ‘उन्होंने कैमरा क्यों छीना था? क्योंकि इसमें मीडिया पर हमले के शुरुआती मिनटों के रिकॉर्डेड सबूत थे.’ उन्होंने कहा कि शहीद हुए कैमरामैन के शरीर पर गोलियों के कई निशान भी मिले और सिर पर फ्रैक्चर भी था. इससे पता चलता था कि यह गलती से नहीं हुआ.

नक्सली हमला : बाल-बाल बचे दूरदर्शन के पत्रकार धीरज कुमार ने क्या कहा

नक्सली हमले में अपने साथी को खो चुके दूरदर्शन के पत्रकार धीरज कुमार को आज का मंजर उम्र भर डराता रहेगा. धीरज इसे अपना दूसरा जन्म मान रहे हैं. राज्य के धुर नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के अरनपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत नीलावाया गांव में दिल्ली से आए तीन मीडियाकर्मी समाचार कवरेज के लिए जा रहे थे. जब मीडियाकर्मी गांव के करीब थे तभी नक्सलियों ने गोलीबारी कर दी, जिसमें कैमरामैन अच्युतानंद साहू की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई.

दूरदर्शन के पत्रकार और इस घटना के गवाह धीरज कुमार बिहार के बेगुसराय के निवासी हैं. 37 वर्षीय कुमार ने बताया कि राज्य में हो रहे विधानसभा चुनाव में रिपोर्टिंग के लिए आई उनकी टीम पिछले दो दिनों से दंतेवाड़ा क्षेत्र में है. उन्हें जानकारी मिली थी कि गांव में 20 साल में पहली बार मतदान होगा. यह समाचार वह लोगों तक पहुंचाना चाहते थे. उन्होंने बताया कि वे लोग करीब साढे 10 बजे नीलावाया गांव के करीब थे तभी नक्सलियों ने गोलीबारी शुरू कर दी. इस घटना में साहू को गोली लगी और वह वहीं गिर गए.

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कांग्रेस नेता दिव्या स्पंदना ने पीएम मोदी पर किया आपत्तिजनक ट्वीट, हो रही आलोचना

दिव्या स्पंदना

कांग्रेस नेता दिव्या स्पंदना ने पीएम मोदी पर किया आपत्तिजनक ट्वीट, हो रही आलोचना

कांग्रेस पार्टी की सोशल मीडिया सेल की प्रमुख दिव्या स्पंदना एक बार फिर अपने ट्वीट के चलते विवादों में फंसती दिख रही हैं. दिव्या ने गुरुवार को पीएम मोदी की स्टैचू ऑफ यूनिटी के साथ एक फोटो शेयर की. इस फोटो में पीएम मोदी सरदार पटेल की मूर्ति के पैर के पास खड़े हैं. इस फोटो के साथ दिव्या ने लिखा, ‘Is that bird dropping?’ इस ट्वीट को लेकर उनकी आलोचना हो रही है. इस ट्वीट को आप नीचे देख सकते हैं-

बीजेपी ने भी उनके इस ट्वीट का रिप्लाई किया है. बीजेपी के इस ट्वीट को आप नीचे देख सकते हैं-

राम्या के इस ट्वीट की आलोचना हो रही है. इस ट्वीट के बाद दिव्या ने एक और ट्वीट किया. इसमें उन्होंने लिखा कि मेरे विचार मेरे हैं. मुझे किसी को क्लेरिफिकेशन देने की जरूरत नहीं है.

कई वरिष्ठ पत्रकारों ने दिव्या के इस ट्वीट पर सवाल उठाए हैं. देखिये कुछ ट्वीट्स-

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी इस पर ट्वीट किया है. राजदीप ने लिखा कि यह सेल्फ गोल क्यों है. राजनीतिक विमर्श का स्तर पहले ही गिरा हुआ है.

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने भी दिव्या के इस ट्वीट पर सवाल उठाए हैं.

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