चुनाव अधिकारी निलंबित

मध्यप्रदेश- बीजेपी नेता के होटल में ईवीएम और वीवीपैट मशीन लेकर जाने के आरोप में दो चुनाव अधिकारी निलंबित

मध्यप्रदेश में दो चुनाव अधिकारी निलंबित

मध्य प्रदेश में चुनाव आयोग ने अपने दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया है. इन अधिकारियों पर आरोप है कि चुनाव आयोग के नियमों के विरुद्ध वो ईवीएम और वीवीपैट मशीन को एक होटल में लेकर गए थे, जिससे ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की सुरक्षा से समझौता हुआ. मामला मध्य प्रदेश में चुनाव से एक दिन पहले 27 नवंबर का बताया जा रहा है. गौर करने वाली बात ये है कि होटल का मालिक एक बीजेपी सदस्य है.

चुनाव अधिकारी निलंबित

निलंबित हुए अधिकारियों में एक सेक्टर ऑफिसर और शाजापुर मेडिकल स्टाफ का एक सदस्य शामिल है. चुनाव आयोग ने मामले पर अपना बयान देते हुए प्रेस नोट जारी किया. इसके अनुसार ईवीएम और वीवीपैट को शुजालपुर स्थित राजमहल होटल तक पहुंचाने में एक रिजर्व माइक्रो ऑफिसर और एक सुरक्षा अधिकारी भी शामिल था.

बता दें कि चारों अधिकारियों का होटल का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था. इस दौरान अधिकारियों पर नशे में होने का भी आरोप है.

चुनाव आयोग के अनुसार इंजीनियर्स ने ईवीएम और वीवीपैट का निरक्षण किया है. उनसे किसी भी तरह की छेड़छाड़ी नहीं की गई थी. निलंबित अधिकारियों के नाम सेक्टर ऑफिसर सोहन लाल बजाज और मेडिकल स्टाफ सदस्य रईस मंसूरी है.

बता दें कि चुनाव अधिकारी निलंबित होने के बाद सोशल मीडिया पर लोग बीजेपी पर चुनाव में धांधली का आरोप भी लगा रहे हैं. लोगों का आरोप है कि इस बार बीजेपी चुनाव में धांधली की कोशिश करते हुए रंगे हाथों पकड़ी गई है. हालांकि आधिकारिक बयानों में अभी तक बीजेपी का कोई जिक्र नहीं है.

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जानिये, लोग क्यों फैलाते हैं फेक न्यूज, सामने आई यह बड़ी वजह

सोशल मीडिया धीरे-धीरे फेक न्यूज (Fake News) का अड्डा बनता जा रहा है. लोग किसी भी झूठ को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं जो देखते ही देखते वायरल हो जाता है. कुछ लोग इस झूठ को सच मानकर भरोसा भी कर लेते हैं. लंबे समय से चला आ रहा यह ट्रेंड पिछले कुछ सालों में तेज हुआ है. फेक न्यूज (Fake News) और सोशल मीडिया पर फैले झूठ को रोकने के लिए दुनियाभर में काम किया जा रहा है. भारत में भी सरकार इस बारे में कानून लाने की योजना बना रही है.

Fake news

बीबीसी ने फेक न्यूज को लेकर एक बड़ी रिसर्च की है. बीबीसी की यह रिसर्च बीबीसी के Beyond Fake News प्रोजेक्ट के तहत की गई जो ग़लत सूचनाओं के ख़िलाफ़ एक अंतरराष्ट्रीय पहल है. इस रिसर्च में सामने आया कि लोग ‘राष्ट्र निर्माण’ की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाली फ़ेक न्यूज़ को शेयर कर रहे हैं.

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इस रिसर्च में पता चला कि हमारे देश में लोग उस तरह के संदेशों को शेयर करने में झिझक महसूस करते हैं जो उनके मुताबिक़ हिंसा पैदा कर सकते हैं. लेकिन यही लोग राष्ट्रवादी संदेशों को शेयर करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं. भारत के अलावा कीनिया और नाइजीरिया में भी फ़ेक न्यूज़ फैलाने के पीछे लोगों की ‘फ़र्ज़ की भावना’ सामने आई, लेकिन इन दोनों देशों में राष्ट्र निर्माण की भावना की बजाय ब्रेकिंग न्यूज़ को साझा करने की भावना ज़्यादा होती है ताकि कहीं अगर वो ख़बर सच हुई तो वह उनके नेटवर्क के लोगों को प्रभावित कर सकती है.

Fake news

मुख्यधारा की मीडिया पर भरोसा नहीं करते लोग

फे़क न्यूज़ के फैलाव में मुख्यधारा के मीडिया को भी ज़िम्मेदार पाया गया है. रिसर्च के मुताबिक़, इस समस्या से निबटने में मीडिया इसलिए बहुत कारगर नहीं हो पा रहा है क्योंकि उसकी अपनी ही साख बहुत मज़बूत नहीं है, लोग मानते है कि राजनीतिक और व्यावसायिक हितों के दबाव में मीडिया ‘बिक गया’ है.

यह स्टोरी बीबीसी की एक खबर पर आधारित है. बीबीसी की यह खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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‘नोटबंदी से देश के किसानों को हुआ नुकसान’

नोटबंदी से जुड़ी बहस उसके लागू होने के दो साल बाद भी जारी है और एक तबके का अभी भी मानना है कि ये एतिहासिक फैसला था, वहीं एक और तबका मानता है कि ये एतिहासिक भूल थी. ऐसे में ये बड़ी नई जानकारी सामने आई है कि किसानों पर इसका बुरा पड़ा है. कृषि मंत्रालय ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति के सामने ये बात खुद मानी है. हालांकि, जब यह खबर छपी तो कृषि मंत्री ने फ़ौरन इसका खंडन कर दिया.

नोटबंदी से हताशा के हालात पैदा हो गए
नोटबंदी के बाद नगदी की कमी की वजह से ग्रामीण भारत में हताशा के हालात पैदा हो गए. ये बात कृषि मंत्रालय ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति को सौंपे एक बैकग्राउंड नोट में मानी है. नोट के मुताबिक बहुत सारे किसान बीज और खाद नहीं खरीद सके. 2016 में रबी की फसल पर इसका बुरा असर पड़ा जिससे इस क्षेत्र को खासा नुकसान हुआ.

बुधवार को यह खबर अखबारों में छपी तो राहुल गांधी ने ट्वीट किया, “नोटबंदी ने करोड़ों किसानों का जीवन नष्ट कर दिया है. अब उनके पास बीज-खाद खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा भी नहीं है लेकिन आज भी मोदी जी हमारे किसानों के दुर्भाग्य का मज़ाक उड़ाते हैं अब उनका कृषि मंत्रालय भी कहता है नोटबंदी से टूटी किसानों की कमर.”

टिप्पणियां वित्तीय मामलों की संसदीय समिति के सदस्य पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा, लेकिन नोटबंदी के नतीजों की बात की. इसके बाद कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने यह ख़बर ख़ारिज करते हुए ट्वीट किया, “कुछ मीडिया चैनलों और समाचार पत्रों द्वारा यह ख़बर चलाई जा रही है कि कृषि विभाग ने यह माना है कि किसानों पर नोटबंदी का बुरा असर पड़ा था और किसान कैश की क़िल्लत के कारण बीज नहीं ख़रीद पाए थे. यह वास्तविक तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है.”

क्या थी नोटबंदी
भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया में नोटबंदी कहा गया, की घोषणा 8 नवम्बर 2016 को रात आठ बजे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक राष्ट्र को किये गए संबोधन के द्वारा की गयी। यह संबोधन टीवी के द्वारा किया गया. इस घोषणा में 8 नवम्बर की आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का ऐलान किया गया. इसका उद्देश्य केवल काले धन पर नियंत्रण ही नहीं बल्कि जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था. लेकिन इससे ऐसा कुछ नहीं हुआ और सरकार ने मामले में पाला बदलकर इसे पूरी तरह से डिजिटल इकॉनमी का मामला बना दिया. आपको बता दें कि इससे देशों को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है.

मनोज तिवारी

सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन के मौके पर हंगामा, मनोज तिवारी पर हाथापाई का आरोप

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज सिग्नेचर ब्रिज (Signature Bridge) का उद्घाटन किया. उद्घाटन मौके से पहले दिल्ली से बीजेपी सांसद मनोज तिवारी (Manoj Tiwari) ने मौके पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया. इस दौरान पुलिस और वहां मौजूद लोगों से उनकी झड़प हो गई. एएनआई के एक वीडियो में दिख रहा है कि मनोज तिवारी पुलिसवालों की तरफ मुक्का चला रहे हैं.

उद्घाटन के मौके पर अपने प्रशंसकों के साथ पहुंचे मनोज तिवारी ने हंगामा कर दिया. इस दौरान मनोज वाजपेयी भी पुलिस से भिड़ गए. उन्होंने कहा कि मैंने सिग्नेचर ब्रिज का काम दोबारा शुरू कराया था और अब केजरीवाल इसका उद्घाटन कर रहे हैं.

मनोज तिवारी ने कहा कि इलाके के सांसद होने के नाते मैं सिग्नेचर ब्रिज (Signature Bridge) पर आया हूं. बता दें कि जहां पर उद्घाटन है वहां से सांसद मनोज तिवारी हैं. मनोज तिवारी ने कहा कि मुझे उद्घाटन समारोह में आमंत्रित किया गया था. मैं यहां से सांसद हूं, तो समस्या क्या है? क्या मैं एक अपराधी हूं? उन्होंने कहा कि यहां अरविंद केजरीवाल का स्वागत करने के लिए हूं.

वहीं दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इस पूरे मामले पर टिप्पणी की है. उन्होंने ट्वीट किया, ‘सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन से मायूस कुछ खिसियानी बिल्लियां खम्बा नोंच रही हैं। इन्होंने सुपारी उठा रखी थी कि केजरीवाल सरकार के इस कार्यकाल में सिग्नेचर ब्रिज को पूरा नहीं होने देंगे।’

सिग्नेचर ब्रिज के बारे में कुछ बातें-

दिल्ली में सिग्नेचर ब्रिज (Signature Bridge) का काम पूरा हो गया है. 2004 में मंजूर हुआ यह यह ब्रिज लगभग 14 साल बाद बनकर तैयार हुआ है. इस ब्रिज को दिल्ली में 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार किया जाना था, लेकिन यह अब जाकर तैयार हुआ है. यह ब्रिज दिल्ली के वज़ीराबाद से गाज़ियाबाद की ओर जाने वाले लोगों के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा.

आम आदमी पार्टी ने सिग्नेचर ब्रिज के नाम पर शेयर की नीदरलैंड के ब्रिज की फोटो

अभी तक लगने वाले ट्रैफिक जाम से लोगों को राहत मिलेगी. 2004 में जब इस ब्रिज का प्रस्ताव आया था, तब इसकी लागत सिर्फ 464 करोड़ रुपये थी, जो बाद में लगातार बढ़ती चली गई. केजरीवाल सरकार ने इसके लिए 2017 में 100 करोड़ रुपये आवंटित किए थे और इसे मार्च 2018 तक बन तैयार होना था. लेकिन तकनीकी व दूसरे कारणों से इसमे समय लग गया.

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नेहरू मेमोरियल

अर्नब गोस्वामी बने नेहरू मेमोरियल में सदस्य, उपाध्यक्ष के पद पर अब भी बने हुए हैं एमजे अकबर

मोदी सरकार ने नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय (NMML) में पत्रकार अर्णब गोस्वामी, पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर, भाजपा सांसद विनय सहस्रबुद्धे और पत्रकार एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के अध्यक्ष राम बहादुर राय को बतौर सदस्य नियुक्त किया है. नेहरू मेमोरियल में इनकी नियुक्ति उन चार पूर्व सदस्यों की जगह की गई है, जिन्होंने तीन मूर्ति एस्टेट में सभी प्रधानमंत्रियों के लिए एक म्यूजियम बनाने का विरोध किया था.

नेहरू मेमोरियल

नवनियुक्त सदस्य

चौंका देने वाली बात यह है कि यौन उत्पीड़न से घिरे पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर अब तक NMML की कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष बने हुए हैं. बता दें कि यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद एमजे अकबर को मंत्री परिषद से इस्तीफा देना पड़ा था.

नेहरू मेमोरियल से इन सदस्यों को हटाया

सरकार ने 29 अक्टूबर को अर्थशास्त्री नितिन देसाई, प्रोफेसर उदयन मिश्रा और पूर्व नौकरशाह बी.पी. सिंह को NMML के सदस्य पद से हटा दिया था. एक अन्य सदस्य प्रताप भानु मेहता ने शक्ति सिन्हा को NMML का निदेशक नियुक्त करने के मुद्दे पर साल 2016 में इस्तीफा दे दिया था. बता दें कि प्रताप भानु मेहता, बीपी सिंह और उदयन मिश्रा ने तीन मूर्ति एस्टेट में सभी प्रधानमंत्रियों के लिए संग्रहालय बनाने के निर्णय का खुला विरोध किया था.

निदेशक ने कहा- नेहरू मेमोरियल में नई नियुक्तियां बड़ी योजना का हिस्सा

नेहरू मेमोरियल

नेहरू मेमोरियल का दृश्य

नये नियुक्त किए गए सदस्यों का कार्यकाल 25 अप्रैल 2020 तक है. NMML के निदेशक शक्ति सिन्हा ने इस घटना पर बताया, ‘‘उनके कार्यकाल खत्म नहीं हुए हैं. उनकी जगह अन्य लोगों की नियुक्ति की गई है”. इन नियुक्तियों की वजह पूछे जाने पर सिन्हा ने कहा कि वे NMML को एक शोध केंद्र के तौर पर विकसित करने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेंगे. उन्होंने कहा, ‘‘यह NMML को शोध का केंद्र बनाने की बड़ी योजना का हिस्सा है. राम बहादुर राय पिछले 50 साल से भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते रहे हैं. वह कुछ प्रधानमंत्रियों को व्यक्तिगत तौर पर जानते थे”.

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सिन्हा ने कहा, ‘‘जयशंकर हमें एक अंतदृष्टि प्रदान करेंगे कि शीर्ष स्तर पर फैसले कैसे किए जाते हैं. वरिष्ठ पत्रकार और अपने शुरुआती दिनों में शोधार्थी होने के नाते गोस्वामी भारतीय राजनीतिक इतिहास पर शोध एवं सूचना का डेटाबेस तैयार करने की हमारी योजना में खासा योगदान करेंगे.”

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राफेल

राफेल डील पर बोले HAL चेयरमैन, कहा- सौदा रद्द होने की हमें जानकारी नहीं

राफेल डील पर मचा घमासान शांत नहीं हो रहा है. एक तरफ जहां कांग्रेस लगातार इस सौदे में भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है, वहीं अब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के चेयरमैन ने कहा कि है उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि सरकार ने पिछला कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया है. बता दें कि सरकार ने नए कॉन्ट्रैक्ट से HAL को हटा दिया है. कांग्रेस का आरोप है कि HAL को हटाकर इस सौदे में अनिल अंबानी को लाया गया है.

राफेल डील

HAL के चेयरमैन आर माधवन

HAL के चेयरमैन आर माधवन ने कहा, ‘हमें पिछले सौदे को रद्द किए जाने की जानकारी नहीं थी. हम राफेल पर टिप्पणी नहीं करना चाहते, क्योंकि अब हम इस सौदे का हिस्सा नहीं हैं’.

क्या है राफेल डील मामला

राफेल डील

कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में फ्रांस की लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनी दसॉल्ट एविएशन के साथ 125 राफेल विमानों का सौदा किया था. जिसमें से 108 विमानों का निर्माण लाइसेंस्ड प्रोडक्शन के तहत HAL द्वारा किया जाना था और 18 विमानों का निर्माण फ्रांस में कर उसे भारत लाने की योजना थी.

क्या राफेल सौदे से खुश हो कर मोदी सरकार को 32 जगुआर लड़ाकू विमान फ्री में देगा फ्रांस?

हालांकि यह सौदा आगे नहीं बढ़ा. इसके बाद नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने वर्ष 2015 में फ्रांस की सरकार के साथ दूसरा सौदा कर लिया, जिसमें 125 के बजाय सिर्फ 36 राफेल विमानों की खरीद की गई और इन सबका निर्माण फ्रांस में ही कर उसे भारत लाया जाएगा. इसकी अनुमानित कीमत 54 अरब डॉलर है. हालांकि, सरकार इनकी कीमत की जानकारी नहीं दे रही है.

इसी बात से सारा विवाद जुड़ा हुआ है. कांग्रेस का कहना है कि अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए नया सौदा किया गया है. मोदी सरकार पर आरोप है कि सरकार ने राफेल डील से सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को हटाकर यह सौदा अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को दिलाने में मदद की है. कांग्रेस सरकार के समय हुई राफेल डील के मुताबिक, HAL को 108 एयरक्राफ्ट का निर्माण करना था, जिसे मोदी सरकार ने अपने नए समझौते से बाहर कर दिया.

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उबर ड्राइवर

जानिये कैसे नाइजीरिया में यात्रियों से दोगुना किराया वसूल रहे हैं उबर ड्राइवर

कैब सर्विस देने वाली कंपनी उबर कई बार विवादों में फंस चुकी है. अब एक नया विवाद शुरू होता दिख रहा है. नाइजीरिया के सबसे बड़े शहर लागोस में कुछ उबर ड्राइवर यात्रियों से ज्यादा किराया लेने के लिए फेक जीपीएस ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं.

उबर ड्राइवर

qz.com की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यहां उबर ड्राइवर Lockito नाम की ऐप यूज कर रहे हैं. इस जियोफेंसिंग बेस्ड ऐप के सहारे फेक जीपीएस रूट सेट किया जा सकता है. यहां उबर ड्राइवर इस ऐप का यूज कर यात्रियों से ज्यादा किराया वसूल रहे हैं. कई बार यह किराया दोगुना से भी ज्यादा होता है.

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इस रिपोर्ट के मुताबिक, एक ड्राइवर ने बताया कि इस ऐप से फेक जीपीएस सेट किया जाता है, जबकि फोन में असली जीपीएस सेट रहता है. उबर ऐप इन दोनों में सही का पता नहीं लगा पाती और यह दोनों ऐप के रूट के हिसाब से किराया कैलकुलेट करती है. इससे कुल किराया काफी ज्यादा रहता है.

कुछ ड्राइवर Lockito की मदद से ट्रिप शुरू होने से पहले ही पिकअप और ड्रॉप ऑफ लोकेशन सेट कर देते हैं. जब ट्रिप शुरू होती है तो रियल जीपीएस चलना शुरू होता है, लेकिन ट्रिप खत्म-खत्म होते-होते दोनों जीपीएस (असली और नकली) के हिसाब से किराया कैलकुलेट होता है. इस हिसाब से यात्रियों को थोड़ी दूर के लिए ज्यादा किराया देना पड़ रहा है.

कंपनी को भी ड्राइवरों के इस फ्रॉड का पता है. उबर नाइजीरिया के प्रवक्ता ने बताया कि यह उबर की गाइडलाइंस का उल्लंघन है और कंपनी ऐसा करने वाले ड्राइवरों पर नजर बनाए हुए है.

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नक्सलियों के हमले में बाल-बाल बचे दूरदर्शन के पत्रकार धीरज कुमार ने क्या कहा

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नक्सली हमला

DD के कैमरामैन की हत्या के बाद नक्सलियों ने लिखी मीडिया के नाम चिट्ठी

छत्तीगढ़ के दंतेवाड़ा में 30 अक्टूबर नक्सली हमले में दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू और 3 सुरक्षाकर्मियों की जान चली गई थी. दूरदर्शन की टीम छत्तीसगढ़ में हो रहे विधानसभा चुनाव को कवर करने गई थी. नक्सलियों ने इस हमले के बाद एक चिट्ठी जारी की है. इस चिट्ठी में नक्सलियों ने लिखा कि, ‘पत्रकारों को सुरक्षा बलों के साथ नक्सली इलाकों में यात्रा नहीं करनी चाहिए.’ उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उन्हें यह नहीं मालूम था कि सुरक्षाकर्मियों के साथ मीडिया के लोग भी हैं.’ चेतावनी देते हुए कहा नक्सलियों ने कहा कि उनकी पत्रकारों से कोई दुश्मनी नहीं है. वे उनके दोस्त हैं.

नक्सलियों ने अपने पत्र में लिखा कि जबरदस्ती फायरिंग में अच्युतानंद साहू का मरना दुख की बात है. हम जानबूझकर पत्रकारों को नहीं मारेंगे. पत्र में यह भी कहा गया कि अच्युतानंद घात लगाकर बैठे थे और हमारा मीडिया को निशाना बनाने का कोई लक्ष्य नहीं है.

नक्सलियों के हमले में कैमरामैन की मौत- युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे और सावधानियां

वहीं दंतेवाड़ा के एसपी ने नक्सलियों के इस स्पष्टीकरण पर सवाल उठाए हैं. एसपी अभिषेक पल्लव ने कहा, ‘उन्होंने कैमरा क्यों छीना था? क्योंकि इसमें मीडिया पर हमले के शुरुआती मिनटों के रिकॉर्डेड सबूत थे.’ उन्होंने कहा कि शहीद हुए कैमरामैन के शरीर पर गोलियों के कई निशान भी मिले और सिर पर फ्रैक्चर भी था. इससे पता चलता था कि यह गलती से नहीं हुआ.

नक्सली हमला : बाल-बाल बचे दूरदर्शन के पत्रकार धीरज कुमार ने क्या कहा

नक्सली हमले में अपने साथी को खो चुके दूरदर्शन के पत्रकार धीरज कुमार को आज का मंजर उम्र भर डराता रहेगा. धीरज इसे अपना दूसरा जन्म मान रहे हैं. राज्य के धुर नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के अरनपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत नीलावाया गांव में दिल्ली से आए तीन मीडियाकर्मी समाचार कवरेज के लिए जा रहे थे. जब मीडियाकर्मी गांव के करीब थे तभी नक्सलियों ने गोलीबारी कर दी, जिसमें कैमरामैन अच्युतानंद साहू की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई.

दूरदर्शन के पत्रकार और इस घटना के गवाह धीरज कुमार बिहार के बेगुसराय के निवासी हैं. 37 वर्षीय कुमार ने बताया कि राज्य में हो रहे विधानसभा चुनाव में रिपोर्टिंग के लिए आई उनकी टीम पिछले दो दिनों से दंतेवाड़ा क्षेत्र में है. उन्हें जानकारी मिली थी कि गांव में 20 साल में पहली बार मतदान होगा. यह समाचार वह लोगों तक पहुंचाना चाहते थे. उन्होंने बताया कि वे लोग करीब साढे 10 बजे नीलावाया गांव के करीब थे तभी नक्सलियों ने गोलीबारी शुरू कर दी. इस घटना में साहू को गोली लगी और वह वहीं गिर गए.

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कांग्रेस नेता दिव्या स्पंदना ने पीएम मोदी पर किया आपत्तिजनक ट्वीट, हो रही आलोचना

जाने क्यों अयोध्या पर कांग्रेस लाई थी अध्यादेश, बीजेपी ने किया था विरोध

इन दिनों भारतीय राजनीति में राम मंदिर को लेकर चर्चा उफान पर है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही राम मंदिर मामले की सुनवाई को टालकर अगले वर्ष कर दिया है. इससे बीजेपी सरकार के अंदर और राम मंदिर बनाने के पक्षकार सरकार से अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं. मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अभी तक राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाने के मामले पर कोई फैसला नहीं किया है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए.

राम मंदिर मामले

अगर मोदी सरकार राम मंदिर पर अध्यादेश लाती है तो यह पहली बार नहीं होगा. इससे पहले कांग्रेस सरकार के समय में 1993 में राम मंदिर को लेकर अध्यादेश लाया जा चुका है. दिलचस्प बात यह है कि आज राम मंदिर मामले के लिए आवाज बुलंद करने वाली बीजेपी ने उस समय इस अध्यादेश का विरोध किया था.

राम मंदिर मामले को लेकर कांग्रेस लाई थी अध्यादेश

राम मंदिर मामले

नरसिम्हा राव

आजतक की एक खबर के मुताबिक, दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जनवरी 1993 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार अध्यादेश लेकर आई थी. इसके तहत विवादित परिसर की कुछ जमीन का सरकार अधिग्रहण करने वाली थी. इसे तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से मंजूरी लेकर उस समय के गृहमंत्री एसबी च्वहाण ने लोकसभा में रखा. लोकसभा से पास होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया. आजतक के मुताबिक, बिल पेश करते समय तत्कालीन गृहमंत्री चव्हाण ने कहा था, “देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना को बनाए रखना जरूरी है.” यही तर्क आज बीजेपी और आरएसएस दे रही है, जिसने उस समय इस अध्यादेश का विरोध किया था.

बीजेपी ने किया अध्यादेश का विरोध

हालांकि अयोध्या अधिनियम से राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ नहीं हो पाया. बीजेपी ने नरसिम्हा राव सरकार के इस कदम का पुरजोर विरोध किया था. बीजेपी के तत्कालीन उपाध्यक्ष एसएस भंडारी ने इस कानून को पक्षपातपूर्ण, तुच्छ और प्रतिकूल बताते हुए खारिज कर दिया था. बीजेपी के साथ मुस्लिम संगठनों ने भी इस कानून का विरोध किया था.

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उस समय नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि के साथ इसके चारों तरफ 60.70 एकड़ भूमि अधिग्रहित की थी. सरकार यहां एक राम मंदिर, एक मस्जिद, लाइब्रेरी, म्यूजियम और दूसरी सुविधाएं बनाना चाहती थी.

सुप्रीम कोर्ट ने लगाया था स्टे

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या एक्ट 1994 की व्याख्या की थी. सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के आधार पर विवादित जगह के जमीन संबंधी मालिकाना हक (टाइटल सूट) से संबधित कानून पर स्टे लगा दिया था. कोर्ट ने कहा था कि जब तक इसका निपटारा किसी कोर्ट में नहीं हो जाता तब तक इसे लागू नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित जमीन पर एक राम मंदिर, एक मस्जिद एक लाइब्रेरी और दूसरी सुविधाओं का इंतजाम करने की बात का समर्थन किया था लेकिन यह भी कहा था कि यह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं है. इस तरह अयोध्या एक्ट व्यर्थ हो गया.

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मीडिया

DD कैमरामैन की मौत पर पुण्य प्रसून की प्रतिक्रिया- आज मीडियाकर्मी की मौत को भुला दिया गया कल मीडिया को भुला देंगे

दूरदर्शन के कैमरामैन अच्यूतानंद साहू की मौत की खबर मंगलवार को सुबह ही मिली। सोशल मीडिया पर किसी ने जानकारी दी थी। जैसे ही जानकारी मिली तुरंत और जानकारी पाने की इच्छा हुई। टीवी खोल न्यूज चैनलों को देखने लगा। पर देश के राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में कहीं भी खबर चल नहीं रही थी। घंटे भर बाद तीन राष्ट्रीय चैनलों ने अपने संवाददाता से फोन-इन कर जानकारी ली और सामान्यत तमाम रिपोर्टर जो फोन के जरिए जानकारी दे रहे थे वह रायपुर में थे। तो उनके पास भी उतनी ही जानकारी थी जो सोशल मीडिया में रेंग रही थी।

बाकी तमाम हिन्दी-अग्रेंजी के न्यूज चैनलों में सिर्फ टिकर यानी स्क्रीन के नीचे चलने वाली पट्टी पर ही ये जानकारी चल रही थी कि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने डीडी के एक कैमरामैन को मार दिया है। कुछ जगहों पर दो जवान के साथ कैमरामैन के भी शहीद होने की खबर पट्टी के तौर पर ही चल रही थी। हालांकि, इस भीड़ में कुछ संवेदनशीलता दूरदर्शन ने अपने कैमरामैन-पत्रकार के प्रति दिखाई और दोपहर में करीब 12-1 के बीच कैमरामैन के बारे में पूरी जानकारी बताई। कैमरामैन ने दंतेवाडा में रिपोर्टिंग के वक्त जो सेल्फी आदिवासी इलाके में ली या कहें आदिवासी बच्चों के साथ ली, उसे शेयर किया गया। और हर सेल्फी में जिस तरह कैमरामैन अच्यूतानंद साहू के चेहरे पर एक खास तरह की बाल-चमक थी, वह बरबस शहरी मिजाज में जीने वाली पत्रकारों से उन्हें अलग भी कर रही थी।

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अच्युतानंद खुद आदिवासी इलाके के रहने वाले थे। पर तमाम न्यूज चैनलों के बाद जो जानकारी निकल कर आयी वह सिर्फ इतनी ही थी कि डीडी के कैमरामैन अच्युतानंद की मौत नक्सली हमले में हो गई है। छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित इलाके में चुनाव की रिपोर्टिंग करते हुए उनकी मौत हो गई। दंतेवाडा इलाके में नक्सलियो ने सुरक्षाकर्मियों की टोली पर घात लगाकर हमला किया। हमले की जद में कैमरामैन भी आये और अस्पताल पहुंचने से पहले उनकी मौत हो गई। कैमरामैन की मौत की इतनी जानकारी के बाद आज सुबह जब मैंने छत्तीसगढ से निकलने वाले अखबारों को नेट पर देखा तो कैमरामैन की मौत अखबार के पन्नों में कुछ इस तरह गुम दिखायी दी कि जब तक खबर खोजने की इच्छा ना हो तब तक वह खबर आपको दिखायी नहीं देगी। वैसे दो अखबारों ने प्रमुखता से छापा जरुर पर वह सारे सवाल जो किसी पत्रकार की रिपोर्टिग के वक्त हत्या के बाद उभरने चाहिये वह भी गायब मिले।

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और ये सोचने पर मै भी विवश हुआ कि आखिर वह कौन से हालात हैं, जब पत्रकार या मीडिया ही अपने ही प्रोफेशन के कर्मचारी की मौत पर इतना संवेदनहीन हो चला है। या फिर पत्रकारिता की दुनिया या मीडिया का मर्म ही बदल चुका है। और इसे कई खांचो में बांट कर समझने की जरुरत है। क्योंकि पहली सोच तो यही कहती है कि अगर किसी राष्ट्रीय निजी न्यूज चैनल का कोई कैमरामैन इस तरह नक्सली हमले में मारा जाता तो वह चैनल हंगामा खड़ा कर देता। इतना शोर होता कि राज्य के सीएम से लेकर देश के गृहमंत्री तक को बयान देना पड़ता। प्रधानमंत्री भी ट्वीट करते। और सूचना प्रसारण मंत्री भी रिपोर्टिग के वक्त के नियम कायदे की बात करते।

यानी देश जान जाता कि एक कैमरामैन की मौत नक्सली इलाके में रिपोर्टिग करते हुये हुई। और हो सकता है कि राज्य में विधानसभा चुनाव चल रहे है तो रमन सरकार की असफलता के तौर पर विपक्ष इसे राजनीतिक मुद्दा बनाता। वैसे कुछ पत्रकार जो निजी न्यूज चैनलों में काम करते है वह ये भी महसूस करते है कि हो सकता है इस तरह रिपोर्टिग करते हुये कैमरामैन की मौत की खबर को उभारा ही नहीं जाता। क्योंकि इससे सरकार के सामने कुछ मुश्किले खडी हो जाती और हो सकता है कि नक्सल प्रभावित इलाके में सुरक्षा से लैस हुये बगैर जाने को लेकर कैमरामैन को ही कटघरे में खडा कर दिया जाता और मौत आई गई हो जाती।

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लेकिन इन तमाम परिस्थितियो के बीच क्या ये सच नहीं है कि मीडिया जिस तरह असल खबरों को लेकर संवेदनहीन हो चला है या फिर जिस तरह मीडिया सिर्फ सत्ता की चापलुसी से जुडी खबरों में जा खोया है और ग्राउंड रिपोटिंग ही बंद हो चुकी है यानी किसी आम नागरिक के क्या दर्द है। जमीनी हालात और सरकारी एलान के बीच कितनी चौडी खाई है। जिन मुश्किल हालातों के बीच देश का एक आम नागरिक खास तौर से ग्रामीण क्षेत्र में जी रहा है, उससे दूर सकारात्मक होकर मीडिया सरकारी चकाचौंध में अगर खोया हुआ है तो फिर उसकी अपनी मौत जिस दिन होगी वह भी ना ता खबर बनेगी और ना ही उस तरफ ध्यान जायेगा। क्या ऐसे हालात बन नहीं रहे है? ये सवाल हमारा खुद से है। क्योंकि किसी भी खबर को रिपोर्ट करते वक्त कोई भी पत्रकार और अगर न्यूज चैनल का हो तो कोई भी कैमरामैन जिस मनोस्थिति से गुजरता है वही उसकी जिन्दगी का सच होता है। ये संभव ही नहीं है कि दंतेवाड़ा में जाकर वहां के सामाजिक-आर्थिक हालातो से पत्रकार अपनी रिपोर्ट को ना जोड़े।

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सहायक कैमरामैन मोर मुकुट शर्मा

मारे गये कैमरामैन अच्यूतानंद साहू की मौत से पहले ली गई सेल्फी बताती है कि वह सुरक्षाकर्मियों के बीच सेल्फी नहीं ले रहा था बल्कि ग्रामीण जीवन के बीच हंसते-मुसकुराते बच्चों के बीच सेल्फी ले रहा था । घास-फूस की झोपडियों के बीच अपने होने के एहसास को जी रहा था। यानी दिल्ली में रहते हुये भी कहीं ना कहीं कोई भी पत्रकार जब ग्रामीण इलाकों में पहुंचता है तो उसके अपने जीवन के एहसास जागते है और शायद दिल्ली सरीखे जीवन को लेकर उसके भीतर कश्मकश चली है। और पत्रकारों के यही वह हालात है जो सरकार की नीतियों को लेकर क्रिटिकल होते हैं। क्योंकि एक तरफ रेशमी नगर दिल्ली के एलानों के बीच उसे बार बार क्रंकीट की वह खुरदुरी जमीन दिखायी देती है जो सत्ता की नाक तले देश की त्रासदी होती है पर दिल्ली हमेशा उस तरफ से आंखें मूंद लेती हैं। और न्यूज चैनलों में तो कैमरामैन कितना संवेदनशील हो जाता है ये मैने पांच बरस पहले इसी छत्तीसगढ और महाराष्ट्र-तेलगाना की सीमा पर रिपोर्टिंग करते हुये देखा। जब रात के दस बजे हमे हमारे सोर्स ने कहा कि नक्सल प्रभावित इलाको को समझना है तो रात में सफर करें। और तमाम खतरो के बीच मेरे साथ गये आजतक के कैमरामैन संजय चौधरी मेरे पीछे लग गये कि हम रात में जरुर चलेंगे। और समूची रात महाराष्ट्र के चन्द्रपर से निकल कर तेलंगाना होते हुये हम उस जगह पर पहुंचे जहां दो सौ मीटर के दायरे में तीन राज्यों की सीमा [ तेलगाना-उडीसा-छत्तीसगढ़ ] लगती थी। और कंघे पर बंदूक लटकाये नक्सलियों की आवाजाही एक राज्य से दूसरे राज्य में कितनी आसान है और सुरक्षाकर्मियों का अपने राज्य की सीमा को पार करना कितना मुश्किल है, ये सब सुबह चार से पांच बजे के बीज हमने आंखों से देखा। रिपोर्ट फाइल की ।

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और वापस दिल्ली लौटते वक्त कैमरामैन संजय चौधरी का कहना था ये सब दिल्ली को कहां दिखायी देता है। प्रसून जी आप ऐसा जगहो पर ही रिपोर्टिंग करने जाइये तो मुझे साथ लीजिये। दिल्ली में तो कोई काम होता नहीं है। हो सकता है डीडी के कैमरामैन अच्यूतानंद साहू के जहन में भी रिपोर्टिग को लेकर कोई ऐसी ही सोच रही हो। लेकिन इस सोच से इतर अब का संकट दूसरा है। क्योंकि न्यूज चैनलों का दायरा दिल्ली या महानगर या फिर प्रधानमंत्री खुद या उनकी नीतियों के एलान वाले इलाके से आगे जाती नहीं है। और मीडिया जिस तरह अपनी रिपोर्ट के आसरे ही देश से जिस तरह कट चुका है उसमें वाकई ये सवाल है कि आखिर एक पत्रकार-कैमरामैन की मौत कैसे खबर बन सकती है। जबतक उसपर सत्ता सरकार मंत्री की नजर ना जाये। और नजर जानी चाहिये इसके लिये मीडिया में रीढ बची नहीं या फिर सत्ता के मुनाफे के माडल में मीडिया की ये रिपोर्टिग फिट बैठती नहीं है।

दरअसल संकट इतना भर नहीं है कि आज डीडी के कैमरा मैन अच्यूतानंद साहू की मौत की खबर कही दिखायी नहीं दी। संकट तो ये है कि न्यूज चैनलो पर रेगतें भर भी सरोकार से दूर हो चले है। मुनाफे के दायरे में या सत्ता से डर के दायरे में जिस तरह न्यूज चैनलो पर खबरो को परोसा जा रहा है उसमें शुरु में आप एक दो दिन और फिर हफ्ते भर और उसके बाद महीनो भर न्यूज चैनल नहीं देखेगें तो भी आप खुद को देश से जुडे हुये ही पायेगें। या फिर कोई खबर आप तक नहीं पहुंची ऐसा आप महसूस ही नहीं कर पायेंगे। तो अगला सवाल मीडियाकर्मियों या मीडिया संस्थानों को चलाने वालो के जहन में आना तो चाहिये कि वह एक ऐसे इक्नामिक माडल को अपना रहे है या अपना चुके हैं जिसमें खबरो को परोस कर अपने प्रोडक्ट को जनता से जोडना या जनता को अपने प्रोडक्ट से जोडने का बच ही नहीं रहा है। यानी सकारात्मक खबरों का मतलब रेशमी नगर दिल्ली की वाहवाही कैसे हो सकती है।

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जब देश के हालात बद से बदतर हो चले हैं तब मीडिया मनोरंजन कर कितने दिन टिक पायेगा। खबरो की छौक लगाकर कुछ दिन नागरिको को ठगा तो जा सकता है लेकिन ठगने के आगे का सवाल तो लोकतंत्र के उस खतरे का भी है जिसका चौथा स्तम्भ मीडिया को कहने में हमे गुरेज नहीं होता। और अगर मीडिया ही खुद को मुनाफे के के लिये ध्वस्त करने पर आमादा है तो फिर सत्ता को ही समझना होगा कि सत्ता के लिये उसका राजनीतिक प्रयोग [ सारे मीडिया उसका गुणगान करें ] आने वाले वक्त में सत्ता की जरुरत उसकी महत्ता को भी नागरिको के जहन से मिटा देगा। यानी धीरे धीरे तमाम संस्थान। फिर गांव। उसके बाद आम नागरिक। फिर चौथा स्तम्भ मायने नहीं रखेगा तो एक वक्त के बाद चुनाव भी बेमानी हो जायेंगे। सचेत रहिये। संवेदनशील रहिये। धीरे धीरे आप भी मर रहे हैं।

(नोट- पुण्य प्रसून वाजपेयी के ये विचार उनके फेसबुक पेज से लिए गए हैं.)

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