नक्सलियों के हमले में कैमरामैन की मौत- युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे और सावधानियां

क्या हैं युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे और किन सावधानियों की है जरूरत?

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हमले में दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू की मौत हो गई है. इस हमने में दो पुलिसकर्मी भी शहीद हो गए. दूरदर्शन ने छत्तीसगढ़ में चुनाव की कवरेज के लिए एक कैमरा टीम तैनात की थी. इस टीम में कैमरामैन अच्युतानंद साहू, रिपोर्टर धीरज कुमार और सहायक मोरमुक्त शर्मा शामिल थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमला उस वक्त हुआ जब दिल्ली दूरदर्शन की एक टीम जंगल के भीतर सुरक्षा बलों के साथ उनकी गतिविधियों का कवरेज करने के लिए पहुंची थी. नक्सलियों ने इस इलाके में चुनाव बहिष्कार की अपील की है. वे पत्रकारों समेत तमाम राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को अपना निशाना बना रहे हैं.

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युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे

सूचना एवं प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने इस घटना पर दुख जताया है. उन्होंने कहा कि हम उन सभी मी़डियाकर्मियों को सलाम करते हैं जो ऐसी खतरनाक परिस्थिति में भी वहां कवरेज के लिए गए. उनकी बहादुरी को हमारा सलाम है.

प्रसार भारती ने इस हमले की निंदा की है और मृतकों के प्रति संवेदना जाहिर की है.

इस घटना के बाद युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं. साथ ही ऐसे क्षेत्रों में पत्रकारों का क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, इस पर नये सिरे से सोचने की जरूरत है. युद्ध क्षेत्र में रिपोर्टिंग के खतरे क्या हैं और  इस दौरान क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, इसे लेकर वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने एक लेख लिखा है. उनका लेख गांव कनेक्शन पर पब्लिश हुआ है. जोशी अपने लेख में लिखते हैं-

‘किसी मीडियाकर्मी का बस्तर के अंदरूनी इलाकों में पुलिस और सुरक्षा बलों के आसपास होना आत्मघाती ही कहा जाएगा. मीडिया की गाड़ी भी किसी पुलिस थाने के आगे दिखना पत्रकार के लिये ख़तरा है. चूंकि माओवादियों के मुख़बिरों का नेटवर्क इतना घना है कि आपकी गाड़ी का नंबर उनके पास पहुंचते देर नहीं लगती. एम्बुश लगाना और बारूदी सुरंग का इस्तेमाल नक्सलियों का प्रमुख हथियार है और ग़लतफ़हमी में आप उनका निशाना बन सकते हैं. नक्सल इलाके में काम करने का मूल मंत्र यही है कि पुलिस और माओवादियों से बराबर और उचित दूरी बना कर रखी जाए.

2013 के विधानसभा चुनावों में पूरा दंतेवाड़ा करीब 1 लाख से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक बलों से भरा हुआ था. यह वही साल है जब मई में कांग्रेस के चुनाव प्रचार काफिले में माओवादियों ने जीरम घाटी में हमला किया था और 30 से अधिक कांग्रेस नेता मारे गए थे. इन नेताओं में महेंद्र करमा भी शामिल थे. बीजापुर के सारकेगुड़ा इलाके में चुनाव प्रचार कवर करते वक्त हमने प्रत्याशी की गाड़ी से काफी दूरी बनाकर रखी हुई थी.’

पूरा लेख आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं.

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