‘नोटबंदी से देश के किसानों को हुआ नुकसान’

नोटबंदी से जुड़ी बहस उसके लागू होने के दो साल बाद भी जारी है और एक तबके का अभी भी मानना है कि ये एतिहासिक फैसला था, वहीं एक और तबका मानता है कि ये एतिहासिक भूल थी. ऐसे में ये बड़ी नई जानकारी सामने आई है कि किसानों पर इसका बुरा पड़ा है. कृषि मंत्रालय ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति के सामने ये बात खुद मानी है. हालांकि, जब यह खबर छपी तो कृषि मंत्री ने फ़ौरन इसका खंडन कर दिया.

नोटबंदी से हताशा के हालात पैदा हो गए
नोटबंदी के बाद नगदी की कमी की वजह से ग्रामीण भारत में हताशा के हालात पैदा हो गए. ये बात कृषि मंत्रालय ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति को सौंपे एक बैकग्राउंड नोट में मानी है. नोट के मुताबिक बहुत सारे किसान बीज और खाद नहीं खरीद सके. 2016 में रबी की फसल पर इसका बुरा असर पड़ा जिससे इस क्षेत्र को खासा नुकसान हुआ.

बुधवार को यह खबर अखबारों में छपी तो राहुल गांधी ने ट्वीट किया, “नोटबंदी ने करोड़ों किसानों का जीवन नष्ट कर दिया है. अब उनके पास बीज-खाद खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा भी नहीं है लेकिन आज भी मोदी जी हमारे किसानों के दुर्भाग्य का मज़ाक उड़ाते हैं अब उनका कृषि मंत्रालय भी कहता है नोटबंदी से टूटी किसानों की कमर.”

टिप्पणियां वित्तीय मामलों की संसदीय समिति के सदस्य पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा, लेकिन नोटबंदी के नतीजों की बात की. इसके बाद कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने यह ख़बर ख़ारिज करते हुए ट्वीट किया, “कुछ मीडिया चैनलों और समाचार पत्रों द्वारा यह ख़बर चलाई जा रही है कि कृषि विभाग ने यह माना है कि किसानों पर नोटबंदी का बुरा असर पड़ा था और किसान कैश की क़िल्लत के कारण बीज नहीं ख़रीद पाए थे. यह वास्तविक तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है.”

क्या थी नोटबंदी
भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया में नोटबंदी कहा गया, की घोषणा 8 नवम्बर 2016 को रात आठ बजे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक राष्ट्र को किये गए संबोधन के द्वारा की गयी। यह संबोधन टीवी के द्वारा किया गया. इस घोषणा में 8 नवम्बर की आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का ऐलान किया गया. इसका उद्देश्य केवल काले धन पर नियंत्रण ही नहीं बल्कि जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था. लेकिन इससे ऐसा कुछ नहीं हुआ और सरकार ने मामले में पाला बदलकर इसे पूरी तरह से डिजिटल इकॉनमी का मामला बना दिया. आपको बता दें कि इससे देशों को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है.

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