जाने क्यों अयोध्या पर कांग्रेस लाई थी अध्यादेश, बीजेपी ने किया था विरोध

इन दिनों भारतीय राजनीति में राम मंदिर को लेकर चर्चा उफान पर है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही राम मंदिर मामले की सुनवाई को टालकर अगले वर्ष कर दिया है. इससे बीजेपी सरकार के अंदर और राम मंदिर बनाने के पक्षकार सरकार से अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं. मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अभी तक राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाने के मामले पर कोई फैसला नहीं किया है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए.

राम मंदिर मामले

अगर मोदी सरकार राम मंदिर पर अध्यादेश लाती है तो यह पहली बार नहीं होगा. इससे पहले कांग्रेस सरकार के समय में 1993 में राम मंदिर को लेकर अध्यादेश लाया जा चुका है. दिलचस्प बात यह है कि आज राम मंदिर मामले के लिए आवाज बुलंद करने वाली बीजेपी ने उस समय इस अध्यादेश का विरोध किया था.

राम मंदिर मामले को लेकर कांग्रेस लाई थी अध्यादेश

राम मंदिर मामले

नरसिम्हा राव

आजतक की एक खबर के मुताबिक, दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जनवरी 1993 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार अध्यादेश लेकर आई थी. इसके तहत विवादित परिसर की कुछ जमीन का सरकार अधिग्रहण करने वाली थी. इसे तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से मंजूरी लेकर उस समय के गृहमंत्री एसबी च्वहाण ने लोकसभा में रखा. लोकसभा से पास होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया. आजतक के मुताबिक, बिल पेश करते समय तत्कालीन गृहमंत्री चव्हाण ने कहा था, “देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना को बनाए रखना जरूरी है.” यही तर्क आज बीजेपी और आरएसएस दे रही है, जिसने उस समय इस अध्यादेश का विरोध किया था.

बीजेपी ने किया अध्यादेश का विरोध

हालांकि अयोध्या अधिनियम से राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ नहीं हो पाया. बीजेपी ने नरसिम्हा राव सरकार के इस कदम का पुरजोर विरोध किया था. बीजेपी के तत्कालीन उपाध्यक्ष एसएस भंडारी ने इस कानून को पक्षपातपूर्ण, तुच्छ और प्रतिकूल बताते हुए खारिज कर दिया था. बीजेपी के साथ मुस्लिम संगठनों ने भी इस कानून का विरोध किया था.

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उस समय नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि के साथ इसके चारों तरफ 60.70 एकड़ भूमि अधिग्रहित की थी. सरकार यहां एक राम मंदिर, एक मस्जिद, लाइब्रेरी, म्यूजियम और दूसरी सुविधाएं बनाना चाहती थी.

सुप्रीम कोर्ट ने लगाया था स्टे

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या एक्ट 1994 की व्याख्या की थी. सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के आधार पर विवादित जगह के जमीन संबंधी मालिकाना हक (टाइटल सूट) से संबधित कानून पर स्टे लगा दिया था. कोर्ट ने कहा था कि जब तक इसका निपटारा किसी कोर्ट में नहीं हो जाता तब तक इसे लागू नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित जमीन पर एक राम मंदिर, एक मस्जिद एक लाइब्रेरी और दूसरी सुविधाओं का इंतजाम करने की बात का समर्थन किया था लेकिन यह भी कहा था कि यह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं है. इस तरह अयोध्या एक्ट व्यर्थ हो गया.

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