Commentary: पुलवामा, पठानकोठ, उरी आतंकी हमलों और विंग कमांडर अभिनंदन की हालत का ज़िम्मेदार कौन?

जम्मु-कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी को पैरा-मिल्ट्री यानी सीआरपीएफ के जवानों पर एक बड़ा आतंकी हमला हुआ था. ठीक इसी तरह से जम्मु-कश्मीर के उरी 2016 के अंत में और पठानकोट में 2015 के अंत में भी आतंकी हमले हुए थे. हर आतंकी हमले के बाद सरकार ने ये जानकारी सार्वजनिक की है कि उसके पास हमला होने से जुड़ी खुफिया जानकारी पहले से थी. बावजूद इनके आख़िर ये हमले हुए कैसे और सरकार इन्हें रोकने में विफल क्यों रही?

देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकरा अजीत डोभाल आख़िर पहले मिलने वाली ऐसी ख़ुफिया जानकारियों का करते क्या हैं और ऐसा क्यों होता है कि ऐसी जानकारी रहने के बावजूद पहले तो भारत के जवानों की जानें जाती हैं और फिर सर्जिकल स्ट्राइक की नौबत आती है? अगर हम इन हFमलों को ख़ुफिया जानकारी के आधार पर रोक लें तो हमें सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करनी पड़ेगी, ना ही जंग के हालात बनेंगे.

इस सबके बीच भारतीय मीडिया पर गंभीर सवाल उठते है. जो मीडिया पिछली सरकारों के समय आतंकी हमलों के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराती थी. प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री से लेकर गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग करता थी. वही, मीडिया नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल में चुप क्यों है? मीडिया ने मोदी सरकार की सुरक्षा नीति पर एक भी सवाल नहीं उठाया. अगर विषम परिस्थितियों में सीधे प्रधानमंत्री पर सवाल उठाना मुश्किल है तो कम से कम हम ऐसा चार आतंकी हमलों की पहले से जानकारी होने के बावजूद इन्हें न रोक पाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की कार्यशैली पर तो सवाल उठा ही सकते हैं.

हम ये पूछ सकते हैं कि जो व्यक्ति इतने अहम पद पर बैठकर पहले से जानकारी होने के बावजूद चार आतंकी हमले नहीं रोक पाया, क्या गारंटी है कि अगली बार जानकारी होने पर वो पांचवां हमला रोक लेगा. क्या इतने बड़े और सिलसिलेवार आतंकी हमलों के बाद भी असफल रहने वाले व्यक्ति को पद पर बने रहने का अधिकार है? क्या पांच सालों तक इस पद पर असफल रहे व्यक्ति से बेहतर विकल्प 130 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले भारत के पास मौजूद नहीं है?

वहीं, जब विपक्ष सरकार की आतंकी हमले रोकने में नाकाम रहने की बात करता है, तो मीडिया सरकार का प्रवक्ता बन जाती है और विपक्ष को आतंकवाद पर राजनीति न करने की नसीहत देता है. लेकिन यही मीडिया भारतीय वायु-सेना की पाकिस्तान में हुई एयर-स्ट्राइक का क्रेडिट सरकार को दे देती है. जैसे सेना कुछ कर ही नहीं रही. टीवी चैनलों पर स्लोगन चलता है “मोदी है तो मुमकिन है.” ये नारा प्रधानमंत्री मोदी ने दिया है जिसे टीवी चैनलों ने धड़ल्ले से चलाया. बीजेपी ने भी पाकिस्तान में एयर-स्ट्राइक का पूरा श्रेय मोदी को दिया और उसका इस्तेमाल लोकसभा चुनाव प्रचार में किया जा रहा है. यही हाल पिछले सर्जिकल स्ट्राइक के बाद हुआ था जिसका इस्तेमाल यूपी समेत 2017 के पांच राज्यों के चुनावों के दौरान किया गया.

यूपी के नतीज़ों से साफ था कि इससे बीजेपी को भारी फायदा हुआ है क्योंकि वहां बीजेपी गठबंधन को 325 सीटें मिली थीं. ऐसे में एक तरफ तो विपक्ष और सवाल उठाने वालों को ये कह कर चुप कराया जा रहा है कि सेना पर राजनीति मत हो. लेकिन यही नियम देश की एक और राजनीतिक पार्टी यानी बीजेपी, उसके नेता और नरेंद्र मोदी पर लागू नहीं होता. वो जब सेना के पराक्रम को वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें इस पर राजनीति करने से क्यों नहीं रोका जाता? अभी कर्नाटक के पूर्व सीएम रहे बीजेपी नेता येदियुरप्पा का बयान ही देख लीजिए जिनका मानना है कि अगर एयर स्ट्राइक हुई तो बीजेपी को कर्नाटक में 22 सीटों को फायदा होगा. क्या देश की सेना बीजेपी को वोट दिलाने के लिए है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि मोदी के हाथों में देश सुरक्षित है. मंगलवार सुबह हुए एयर-स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान में हंगामेदार हालात बने हुए थे. जिस दिन पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में भारत की निंदा हो रही थी, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान भारत के खिलाफ कारवाई की योजना बना रहे थे उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी राजस्थान के चुरू में एक चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे और एयर-स्ट्राइक का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे थे. वो दिल्ली के एक मंदिर में गीता का उद्घाटन करने भी गये.

बुधवार को पाकिस्तान में परमाणु हथियारों पर कंट्रोल रखने वाली राष्ट्रीय कमांड प्राधिकरण की मीटिंग हुई. पाकिस्तान की संसद का संयुक्त सत्र भारत के खिलाफ बैठा. लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री हालात पर योजना बनाने और नज़र बनाए रखने की बजाये खेलो इंडिया ऐप लांच कर रहे थे और आज जब पूरा देश भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन को वापस लाए जाने का इंतज़ार कर रहे है और इससे जुड़ी सरकारी नीति पर नज़र बनाए हुए है तो पीएम अपनी पार्टी बीजेपी के लिए अपना बूथ सबसे मज़बूत कार्यक्रम करने में व्यस्त हैं.

मोदी सरकार की अदूरदर्शिता और रणनीतिक नाकामी बुधवार को सामने आई. मंगलवार के भारतीय हमले के बाद पाकिस्तान हाई अलर्ट पर था. इस सबके बावजूद बुधवार को भारत ने पाकिस्तान की हवाई सीमा में विंग कमांडर अभिनंदन को भेज दिया. पाकिस्तान ने ना सिर्फ भारतीय विमान को गिराया, बल्कि अभिनंदन को गिरफ्तार भी कर लिया. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान अब शांति की बात कर रहे हैं.

भारतीय जहाज गिराने को पाकिस्तान न सिर्फ दुनिया में अपनी सैन्य शक्ति के रूप में प्रचारित कर रहा है, बल्कि दुनिया के सामने भारत से शांति की बात कर गेंद भारत के पाले में डाल चुका है. इमरान खान फ्रंट फुट पर आकर युद्ध जैसे हालात पर बयान दे रहे हैं, वही प्रधानमंत्री मोदी फिलहाल तो बैकफुट पर हैं और देश से ज़्यादा बीजेपी के प्रचार और आम चुनाव के अभियान में मशगूल हैं.

एक अच्छी पत्रकारिता सरकार और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से सवाल करती है, लेकिन भारतीय मीडिया पाकिस्तान में हुई एयरस्ट्राइक और उसके बाद के हालात के मामले में इस पैमाने पर खरा साबित नहीं हुआ. मीडिया सूत्रों के हवाले से पाकिस्तान में भारतीय एयर-स्ट्राइक में 300 आतंकी मारे जाने का दावा करता रहा. मीडिया ने पत्रकारिता के मूल्य सिद्धांत तथ्यों की जांच को साइड पर कर युद्दोन्माद फैलाया.

ये सवाल ज्यादातर टीवी चैनलों ने नहीं पूछा कि विदेश सचिव विजय गोखले ने मारे गए आतंकियों की संख्या क्यों नहीं बताई. न्यूज चैनलों ने अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी रॉयटर्स, विश्वसनीय न्यूज चैनल बीबीसी की बालकोट से ग्राउड रिपोर्ट को खास तवज्जो नहीं दी. जिन रिपोर्टों से साफ हो रहा है कि भारतीय एयर-स्ट्राइक में पाकिस्तान में कोई ज्यादा नुकसान नहीं हुआ, जैसे कि दावा किया जा रहा था कि पाकिस्तान के 300 आतंकी मारे गए.

हमले के बाद मीडिया ने संयम से काम नहीं लिया. टीवी चैनलों पर पाकिस्तान को नेस्तानबूद करने की बातें हुईं. भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध की बातें ऐसे की जा रही थी, जैसे युद्द बच्चों का कोई खेल हो. लेकिन सरकार की जिम्मेदारी तय करने की बात नहीं हुई. पत्रकार से शांति की बात करने की उम्मीद की जाती है, लेकिन एक भारतीय न्यूज़ चैनल के एंकर ने पाकिस्तान को तबाह करने की कोशिश में हद कर दी.

देखें उसकी बानगी

पाकिस्तानी मीडिया भी कुछ कम नहीं था. पाकिस्तानी मीडिया में युद्ध के सपोर्ट करने वाले गीत चलाए जा रहे थे. बुधवार को पाकिस्तानी मीडिया ने पत्रकारिता के सिद्धातों का कत्ल करते हुए, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए. भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों का मीडिया युद्दोन्माद फैलाने में बिजी है. दोनों ही सरकार और सत्ता से कड़े सवाल करने के बजाए अपने सेंट्रल एसी वाले ऑफिसों में बैठकर ख़ून के बदले ख़ून की मांग कर रहे हैं.

भारत के एक ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर आप एक बार सोचिएगा कि देश सरकार तो छोड़िए डोभाल से भी सवाल नहीं करता और उन लोगों को सवालों में फांसने लगा है जिनका फर्ज सवाल करना है. ऐसे में ये सोचने वाली बात है कि हम कैसे देश भक्त हैं. अगर जवानों से देश का प्यार सच्चा है तो सरकार जवाब दे कि पहले से जानकारी होने के बावजूद तीनों (पठानकोट, उरी और पुलवामा) आतंकी हमले क्यों हुए?

दो बार हुए सर्जिकल स्ट्राइक की पहले तो ज़रूरत क्यों पड़ी क्योंकि हम अगर आतंकी हमलों को रोक लेते तो सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करनी पड़ती और अगर सर्जिकल स्ट्राइक हुआ तो उसका राजनीतिक प्रचार के लिए इस्तेमाल क्यों किया गया? विंग कमांडर अभिनंदन वर्दमान पाकिस्तान के कब्ज़े में कैसे गए और इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? अगर हम सर्जिकल स्ट्राइक का नगाड़ा नहीं पीटते तो क्या अभिनंदन को पाकिस्तान गिरफ्तार कर पाता? कितने आतंकी हमलों के बाद डोभाल इस्तीफा देंगे?

एक ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर ऐसे अनगिनत सवाल करिए क्योंकि युद्ध का उन्माद राजनीतिक पार्टियां फैला रही हैं जिससे उन्हें चुनाव में फायदा होगा और बाकियों का नुकसान होगा. आप सवाल करिए. वो आपको जितने ज़ोर से देशद्रोही बुलाए आप उससे ज़ोरदार सावल करिए. सवाल उतने बदसूरत नहीं होते जितना बदसूरत युद्ध होता है.

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